अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
बाहरी रोगमार्ग—इस प्रसंग में रक्त आदि धातुओं तथा त्वचा का नाम भी 'शाखा' है, यह बाह्य रोगमार्ग है। इस रोगमार्ग में आश्रित मष (मषक, मत्से, तिल आदि), व्यंग (झाई), गण्ड (घेचा), अलजी, अर्बुद आदि रोग और शरीर के बाह्यमार्ग में अर्श, गुल्म, ब्रण तथा शोथ आदि भी होते हैं ॥ ४४-४५ ॥
अन्तःकोष्ठो महास्रोत आमपक्वाशयाश्रयः। तत्स्थानाः ज्वरतीतीसारकासश्चासोदरज्वराः ॥ अन्तर्भागं च शोफाशौगुल्मबीसर्पविद्रधिः।
आभ्यन्तर रोगमार्ग—आभ्यन्तर (भीतरी) रोगमार्ग के पर्यायवाचक शब्द इस प्रकार हैं—अन्तः, कोष्ठ, महास्रोतस, आमाशय तथा पक्वाशय (इन दोनों के बीच में स्थित क्षुद्रान्त भी)। ये छर्दि (वमन), अतिसार, कास, श्वास, उदररोग तथा ज्वर आदि रोगों की उत्पत्ति के स्थान हैं। भीतरी शोथ, अर्श, गुल्म, विसर्प और विद्रधि का भी स्थान है। इसे आभ्यन्तर रोगमार्ग कहते हैं ॥ ४६ ॥
शिरोहृदयबस्त्यादिमर्माण्यस्त्यां च सन्ध्यः ॥ ४७ ॥
तन्निबद्धाः शिरान्त्यायुक्कण्डराद्याश्च मध्यमः। रोगमार्गः स्थितास्तत्र यक्षमपक्षवर्धारिताः ॥ ४८ ॥
मूध्ादिरोगाः सन्ध्यस्थित्रिकशूलग्रहादयः।
मध्यम रोगमार्ग—सिर, हृदय, बस्ति आदि मर्म और अस्थियों की सन्धियाँ एवं इनसे सम्बन्धित सिरा, स्नायु और कण्डराएँ आदि ये सभी 'मध्यम रोगमार्ग' हैं। इनमें होने वाले रोग राजयक्ष्मा, पक्षाघात, अर्दित (मुखप्रदेश का लकवा) आदि वातविकार, शिरोरोग, हृदयरोग आदि, सन्धिशूल, अस्थिशूल, त्रिकशूल तथा ग्रह (जकड़न) आदि रोग हैं ॥ ४७-४८ ॥
संसव्यासन्व्यहस्वापसादरुक्तोदभेदनम् ॥ ४९ ॥
सङ्गाङ्गभङ्गसङ्कोचवर्तहर्षणतर्पणम् । कम्पपारुष्यसौषिष्यशोघस्पन्दनवेष्टनम् ॥ ५० ॥
स्तम्भः कषायरस्ता वर्णः श्यावोऽरुणोऽपि वा। कर्माणि वायोः—
वातदोष के कर्म—स्रम (शरीर के किसी अंग का अपने स्थान से खिसक जाना), व्यास ( फैल जाना), व्यध (बिघने की जैसी पीड़ा का होना), स्वाप (अंग-विशेष का सुख हो जाना), साद (अवसाद), रुक् (पीड़ा), तोद (सूर्द चुभने की-सी पीड़ा), भेदन (फटने की-सी पीड़ा), संग (हकावट), अंगों का टूटना या टूटने की-सी पीड़ा का होना, संकोच (सिकुड़ जाना), वर्त (घूमना या ऐटना—आवर्त, परिवर्त, विवर्त आदि इसी के रूप हैं), हर्षण (रोमांच), तर्पण (तृषा या प्यास का लगना), कम्प (कैंपकैपी), पारुष्य (खुरदरापन), सौषिष्य (खोखलापन), शोष (सूखना), स्पन्दन (फड़कना), वेष्टन (लपेटना), स्तम्भ (जकड़ जाना), मुख में कसैलेपन का अनुभव होना और उस स्थान का वर्ण श्याव (काला) या अरुण वर्ण का हो जाना—ये सभी वातदोष के कर्म हैं ॥ ४९-५० ॥
—पित्तस्य दाहरागोष्मपाकिताः ॥ ५१ ॥
स्वेदः क्लेदः सूतिः कोथः सदनं मूर्च्छनं मदः। कटुकाम्लो रसो वर्णः पाण्डुरारुणवर्जितः ॥ ५२ ॥
पित्तदोष के कर्म—दाह, लालिमा, उष्णता का अनुभव, पकना या पकाना, स्वेद (पसीना), क्लेद (सड़न), स्राव, कोथ (दुर्गन्धित सड़न), सदन (अवसाद), मूर्च्छा, मद (नशा की स्थिति), मुख में कटु तथा अम्ल रस का अनुभव होना तथा पित्तदोष से युक्त स्थान का वर्ण पाण्डु तथा अरुण से रहित अतएव अन्य वर्णों वाला होना—ये लक्षण होते हैं ॥ ५१-५२ ॥
श्लेष्मणः स्नेहकाठिन्यकण्डूशीतत्वगौरवम्। बन्धोपलेपस्तैमित्यशोफापकल्पतिनिद्रताः ॥ ५३ ॥
वर्णः श्वेतो रसो स्वादुलवणो चिरकारिता।
कफदोष के कर्म—स्निग्धता (चिकनापन), कठोरता, खजुली का होना, हाथ-पैरों में शीत का अनुभव होना, भारीपन, बन्ध (स्रोतों में हकावट), उपलेप (जीभ के ऊपर मैल की पत का जमनः),
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चिपचिपाहट्, सूजन, पाक का न होना, नींद का अधिक आना (यही कारण है कि कफप्रकृति के प्राणी अधिक मोते हैं; जैसे—भैंस), वर्ण सफेद, रस मधुर एवं नमकीन और किसी भी कार्य को देर से करना ॥५३॥
इत्यशेषामयव्यापि यदुक्तं दोषलक्षणम् ॥५४॥
दर्शनाचैरवहितस्तत्सम्भूगुपलक्षयेत् । व्याध्यवस्थाविभागजः पश्यन्त्रार्तन् प्रतिक्षणम् ॥५५॥
दोषलक्षण निर्वाचन का हेतु—यहाँ तक बात-पित्त-कफदोषों के लक्षण कहे गये हैं, जो उन-उन के सभी रोगों में पाये जाते हैं। शास्त्रनिर्देशानुसार रोगों की अवस्था के विभागों (भेदों) को जानने वाला चिकित्सक प्रतिक्षण देखता हुआ सावधान होकर उक्त दोषों का परीक्षण—दर्शन, स्पर्शन आदि विधियों से रोगी के शरीर में करे ॥५४-५५॥
अभ्यासात्प्राप्यते दृष्टिः कर्मसिद्धिप्रकाशिनी । रत्नाविदसदस्ज्जनं न शास्त्रादेव जायते ॥५६॥
चिकित्सा में अभ्यास का महत्त्व—चिकित्साविधि को तथा बात आदि दोषों के लक्षणों को बार-बार ध्यानपूर्वक देखने से चिकित्सा में सफलता दिलाने वाली दृष्टि प्राप्त की जा सकती है। इसी दृष्टि से कर्म (चिकित्सा) में सिद्धि मिलती है। यह वह दृष्टि है जिससे जीहरी देखते ही पहचान लेता है कि यह रत्न ठीक है या दोषयुक्त। यह ज्ञान केवल शास्त्र के अध्ययन से प्राप्त नहीं होता ॥५६॥
वक्तव्य—शास्त्रकार का यह पारम्परिक निर्देश चिकित्सक होने की इच्छा वाले व्यक्ति के लिए कहा गया है। महर्षि सुश्रुत का भी यही मत है—‘अधिगत’ ‘प्रवेष्टव्या’। (सु.सू. १०।३) अर्थात् बार-बार शास्त्रों तथा चिकित्सा-कर्मों का अभ्यास करने के बाद ही चिकित्सक को विशिखा (कर्मभूमि) में प्रवेश करना चाहिए। और भी देखें—‘उभयजो हि भिषग् राजाहं भवति’। (सु.सू. ३।४७) तथा ‘यस्तुभयजो मतिमान् स समर्थोऽर्थसाधने। आहवे कर्म निर्वाह् द्विचक्रः स्यन्दनो यथा’ ॥ (सु.सू. ३।५३) दोनों ही उद्धरणों के अर्थ स्पष्ट हैं। वे सभी लक्षण सुव्यय चिकित्सक के हैं।
दृष्टापचारजः कश्चित्कश्चिस्तूषपिपराधजः । तत्सङ्ग्राहवत्यन्तो व्याधिरिव त्रिधा स्मृतः ॥५७॥
रोगों के तीन भेद—रोगों के भेदों की चर्चा प्रस्तुत है—१. जो देखकर मिथ्या आहार-विहार के सेवन करने से होता है, वह प्रथम, २. जो पूर्वजन्म के अपराधों से होता है, वह दूसरा और ३. जो उक्त दोनों कारणों के संयोग से होता है, वह तीसरा भेद है ॥५७॥
यथानिदानं दोषोत्पत्तः कर्मजो हेतुभिर्विना । महारम्भोऽल्पके हेतावातङ्गो दोषकर्मजः ॥५८॥
रोगों का परिचय—प्रथम प्रकार के रोग को ‘दोषोत्पत्त’ (बात आदि दोषों से उत्पन्न) कहते हैं। यह रोग अपने निदान के अनुसार होता है। दूसरे प्रकार का रोग ‘कर्मज’ होता है। इसमें दोषज रोग की भांति कोई प्रत्यक्ष कारण नहीं होता। तीसरे प्रकार के रोग का नाम है—‘कर्मदोषज’। यह रोग थोड़ा-सा भी कारण होने पर बहुत कष्टदायक होता है ॥५८॥
विपक्षशीलनात्पूर्वः कर्मजः कर्मसङ्ख्यात् । गच्छत्युभयजन्मा तु दोषकर्मक्षयात्म्यम् ॥५९॥
त्रिविध रोग-चिकित्सा—प्रथम ‘दोषोत्पत्त रोग’ विपक्षशीलन से अर्थात् जिन आहार-विहारों का सेवन करने से रोग की उत्पत्ति हुई हो, उनके विपरीत पदार्थों का सेवन करने से तथा तदनुरूप चिकित्सा करने से शान्त हो जाता है। दूसरा ‘कर्मज रोग’ कर्मों के क्षीण हो जाने पर शान्त हो जाता है और तीसरा ‘कर्मदोषज रोग’ दोष तथा कर्म का क्षय होने पर शान्त हो जाता है ॥५९॥
वक्तव्य—शास्त्रानुकूल विधिवत् चिकित्सा करने से भी जो रोगी रोगमूक्त न हो रहा हो, उस समय उक्त दृष्टिकोण को ध्यान में रखना चाहिए और रोगी के परिजनों को भी समझाना चाहिए कि इसके ठीक न होने में यह प्रधान कारण है।
द्विधा स्वपरतन्त्रत्वाद्ब्याधयोऽल्प्याः पुनर्द्विधा ।
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रोगों के दो भेद—स्वतन्त्र तथा परतन्त्र भेद से रोग पुनः दो प्रकार के होते हैं। इनमें परतन्त्र रोग भी दो प्रकार के होते हैं।
पूर्वजाः पूर्वरूपाख्या, जाताः पश्चादुपद्रवाः ॥ ६० ॥
रोगभेदों के नाम—परतन्त्र रोग के दो भेद—१. पूर्वज और २. पश्चात्जात। पूर्वरूपों को ही पूर्वज रोग कहते हैं और जो रोग के अन्त में उत्पन्न होते हैं, उन्हें 'उपद्रव' (पश्चात्जात) नाम से कहा जाता है। ॥ ६० ॥
यथास्वजन्मोपशयाः स्वतन्त्राः स्पष्टलक्षणयाः ।
स्वतन्त्र रोग—स्वतन्त्र रोग वे हैं, जो अपने-अपने निदानोक्त कारणों से पैदा होते हैं और तदनुकूल चिकित्सा करने पर शान्त हो जाते हैं। इस प्रकार के रोगों के लक्षण भी स्पष्ट होते हैं।
विपरीतास्ततोऽन्ये तु—
परतन्त्र रोग—परतन्त्र रोग स्वतन्त्र कहे जाने वाले रोगों से विपरीत होते हैं।
—विद्यादेवं मलानपि ॥ ६१ ॥
मलों का विचार—इसी प्रकार प्रत्येक रोग में विकारों को पैदा करने वाले मलों (दोषों) को भी समझ लेना चाहिए ॥ ६१ ॥
तांलक्षयेदबहिर्तो विकुर्वाणान् प्रतिज्वरम् ।
दोषों का विचार—इसी प्रकार दोषों का भी स्वतन्त्र-परतन्त्र भेद से 'प्रतिज्वरम्' अर्थात् प्रत्येक रोग में सावधानी से विचार करने का प्रयत्न करना चाहिए।
बक्तव्य—जिसे महर्षि वामभट ने स्वतन्त्र तथा परतन्त्र की संज्ञा दे रखी है, उसे भगवान् पुनर्वसु ने च.वि. ६।११ में अनुबन्ध (प्रधान) तथा परतन्त्र रोग को अनुबन्ध (अप्रधान) कहा है। देखा जाता है कि कहीं कोई दोष प्रधान होता है और दूसरा अप्रधान। यह रोग की प्रकृति के अनुसार सर्वत्र होता रहता है। यथा—'न रोगोऽप्येकदोषजः'।
तेषां प्रधानप्रशमे प्रशमोऽशाम्यतस्तथा ॥ ६२ ॥
पश्चाच्चिकित्सेतूर्णं वा बलबन्तमुपद्रवम् ।
चिकित्सा-सूत्र—इनमें प्रधान दोष अथवा प्रधान रोग की शान्ति हो जाने पर अप्रधान (गौण) की शान्ति स्वयं ही हो जाती है। यदि किसी कारण दोष या रोग की शान्ति न हुई हो तो उसकी शीघ्र चिकित्सा करे अथवा कोई बलवान् उपद्रव (रोगोत्तरकालीन रोग) की भी चिकित्सा करे ॥ ६२ ॥
व्याधिकिल्पशरीरस्य पीडाकरतरो हि सः ॥ ६३ ॥
उपद्रवचिकित्सा-निर्देश—प्रधान रोग के अन्त में जो रोग उत्पन्न होता है, उसे 'उपद्रव' कहते हैं। यह 'उपद्रव' प्रधान रोग से पीड़ित हुए शरीर वाले रोगी को और भी अधिक पीड़ित कर देता है ॥ ६३ ॥
बक्तव्य—उपद्रवों एवं उपसर्गों के परिचय के लिए देखें—च.चि. २१।४० तथा सु.सू. ३५।१८।
विकारनामाकुशलो न जिह्वीयात् कदाचन । न हि सर्वविकाराणां नामतोऽस्ति ध्रुवा स्थितिः ॥
रोगनामनिर्धारण-विचार—वर्तमान रोग को किस नाम से कहा जाय, इस विषय में अनजान चिकित्सक को लज्जित नहीं होना चाहिए। क्योंकि सभी रोगों का नाम-निर्धारण करना तत्त्वकार के लिए सम्भव नहीं है ॥ ६४ ॥
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सूत्रस्थानम्
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बक्तव्य—ऐसे अवसरों पर त्रिदोष-सिद्धान्त को आधार मानकर चिकित्सा करनी चाहिए।
स एव कुपितो दोषः समुत्थानविशेषतः। स्थानान्तराणि च प्राप्य विकारान् कुरुते बहुम् ॥ ६५ ॥
दोषों का रोगकर्तृत्व—वही दोष ( वात आदि में से कोई एक ) निदान ( कारण ) भेद से तथा शरीर के अलग-अलग अवयवों में आश्रित होकर अनेक प्रकार के रोगों को उत्पन्न कर देता है ॥ ६५ ॥
तस्माद्विकारप्रकृतीरधिष्ठानान्तराणि च। बुद्ध्वा हेतुविशेषांश्च शीघ्रं कुर्यादुपक्रमम् ॥ ६६ ॥
चिकित्साविधि-निर्देश—इसलिए रोग की प्रकृति ( वात आदि मूल कारण ), स्थान-विशेषों तथा विशेष कारणों ( आहार-विहार ) आदि को भलीभाँति समझकर तदनुसार शीघ्र चिकित्सा करनी चाहिए ॥ ६६ ॥
बक्तव्य—यहाँ दिये गये ६४ से ६६ तक के ये तीन पद्य अविकलरूप से च.सू. १८।४४-४६ से लिये गये हैं। इसके आगे ४७वें श्लोक में भगवान् पुनर्वसु ने कहा है—जो चिकित्सक रोग के मूल कारणों को समझकर बुद्धिपूर्वक तथा शास्त्र द्वारा निर्दिष्ट विधि से चिकित्सा करता है, वह कभी असफल नहीं होता है। वास्तव में इन निर्देशों का स्मरण चिकित्साकाल में अवश्य कर लेना चाहिए। 'विकारनामाऽकुशलो' ( ऊपर श्लोक ६४ ) का युक्तिसंगत समाधान करते हुए भगवान् पुनर्वसु कहते हैं—'तत्र व्याधयोऽपरिसङ्क्षेया भवन्ति, अतिबहुलात्; दोषास्तु खलु परिसङ्क्षेया भवन्ति, अनतिबहुलात्'। ( च.वि. ६।५ ) अतएव सभी रोगों का नाम-निर्धारण करना सम्भव नहीं है। अतः दोषानुसार तथा लक्षणानुसार चिकित्सा करने से अवश्य स्वास्थ्यलाभ होता है।
दूष्यं देशं बलं कालमनलं प्रकृतिं वयः। सत्त्वं सात्त्व्यं तथाऽऽहारमवस्थाश्च पृथग्विद्याः ॥ ६७ ॥
सूक्ष्मसूक्ष्माः समीक्ष्यैषां दोषौषधनिरूपणे। यो वर्तते चिकित्सायां न स स्वस्वति जातुचित् ॥
दूष्य आदि ज्ञान-निर्देश—जो चिकित्सक रस-रक्त आदि धातुओं तथा मल-मूत्र आदि दूष्यों, अनूप, जांगल आदि देशों और आमाशय, पक्वाशय आदि शरीर सम्बन्धी देशों, रोगबल तथा रोगी का बल, शीत, उष्ण आदि काल, लंघन, बमन, विरेचन तथा रक्तमोक्षण आदि का काल, मन्द, तीक्ष्ण, विषम आदि अनल ( अग्नि ) की स्थिति, वात आदि प्रकृति, बाल, यौवन आदि वयस, सत्त्व ( मनसु ), सात्त्व्य ( अनुकूलता ) तथा आहार और अनेक प्रकार की सूक्ष्म-से-सूक्ष्म अवस्थाओं का समुचित विचार कर दोषों के अनुसार औषध का प्रयोग करता है, वह चिकित्सक कभी भी चिकित्सा-कार्य में चूकता नहीं है ॥ ६७-६८ ॥
गुर्वल्पव्याधिसंस्थानं सत्त्वेहेबलाबलात्। दृश्यतेऽप्यन्यथाकारं तस्मिन्नभवितो भवेत् ॥ ६९ ॥
रोग की गुरुता-लघुता का विचार—कभी-कभी रोगी के सत्त्व ( मनसु ) तथा शरीर के सबल अथवा निर्बल होने के कारण गुरु अथवा लघु रोग के लक्षण विपरीत ( उल्टे-पुल्टे ) दिखलायी पड़ जाते हैं। ऐसी स्थिति में चिकित्सक को सावधान रहना चाहिए ॥ ६९ ॥
गुरुं लघुमिति व्याधिं कल्पयन्तु भिषग्बुवः। अल्पदोषाकलनया पथ्ये विप्रतिपद्यते ॥ ७० ॥
भिषग्बुव की निन्दा—भिषग्बुव ( जो भिषक् न होते हुए भी अपने को भिषक् कहा करता है, वह चिकित्सक ) गुरु रोग को लघु समझकर अर्थात् इसमें अधिक दोष नहीं है, अतः वह चिकित्सा करते समय भूल कर बैठता है ॥ ७० ॥
बक्तव्य—उक्त ६९ तथा ७० श्लोकों के विषय को समझने के लिए आप च.वि. ७।५-७ पद्यों का आशय समझने का प्रयत्न करें। वहाँ यह स्पष्ट शब्दों में कहा है कि उक्त प्रकार की भूल मूर्ख चिकित्सक ही कर सकता है, न कि विद्वान् चिकित्सक।
ततोऽल्पमल्पवीर्यं वा गुरुव्याघौ प्रयोजितम्। उदीर्येतत्रां रोगान् संशोधनमयोगतः ॥ ७१ ॥
शोधनं त्वतियोगेन विपरीतं विपर्यये। क्षिणुयान्न मलानेव केवलं वपुरस्यति ॥ ७२ ॥
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भूल का दुष्परिणाम —उक्त चिकित्सकीय प्रमाद से गुरु (महान्) रोग में थोड़ी मात्रा में अथवा अल्पशक्तिशाली दी गयी संशोधन औषधि पूर्णरूप से संशोधन नहीं करा सकती अथवा अल्पमात्रा में संशोधन करने के कारण रोग को और अधिक बढ़ा देती है। इसके विपरीत लघु लक्षणों वाले रोग में अधिक मात्रा में उग्र बीर्य वाली संशोधन (वमन-विरचनकारक) औषधि का प्रयोग करा देने के कारण उसका अतियोग हो जाता है। इससे न केवल कफ एवं पुरीष आदि मलों का ही क्षय नहीं होता, अपितु ये औषधियाँ रोगों के शरीर को भी क्षीण कर देती हैं ॥७१-७२॥
अतोऽभियुक्तः सततं सर्वमालोच्य सर्वथा । तथा युञ्जीत भैषज्यमारोग्याय यथा ध्रुवम् ॥७३॥
चिकित्सक का कर्तव्य —अतः चिकित्सा-कर्म में लगे हुए चिकित्सक को चाहिए कि वह पूर्वापर (आगे-पीछे) का भलीभाँति विचार कर औषध (विशेषकर संशोधन औषध) का प्रयोग उस प्रकार करें, जिससे औषधप्रयोग लाभदायक हो ॥७३॥
वक्तव्य —इस विषय पर चरक के विचार इस प्रकार हैं—‘ज्ञानबुद्धिप्रदीपेन यो नाऽविशति योगिवत्। आतुरस्यान्तरात्मानं न स रोगान् चिकित्सति’ ॥ (च.वि. ४।१२) अर्थात् जो चिकित्सक अपने शास्त्रीय ज्ञान से प्रज्वलित बुद्धि रूपी दीपक को लेकर योगी की भाँति रोगी के अन्तरात्मा में प्रवेश नहीं कर जाता वह रोगी के रोगों की चिकित्सा नहीं कर सकता। यह सत्य है।
वक्ष्यन्तेऽतःपरं दोषा बुद्धिभयविभेदतः ।
दोषभेदों का वर्णन —अब इसके आगे बात आदि दोषों के वृद्धि तथा क्षय भेदों का सहारा लेकर वर्णन किया जायेगा।
पृथक् त्रीन् विद्धि—
दोषवृद्धि के तीन भेद —१. वातवृद्ध, २. पित्तवृद्ध तथा ३. कफवृद्ध।
—संसर्गस्त्रिधा, तत्र तु तात्रव ॥७४॥
संसर्ग के तीन भेद —१. वातपित्तवृद्ध, २. वातकफवृद्ध तथा ३. पित्तकफवृद्ध। इस प्रकार संसर्ग के तीन भेद कहे गये हैं। इस संसर्ग में नौ दोषभेदों को अपने प्रमाण से अधिक समझें ॥७४॥
त्रोनेव समया वृद्ध्या षडेकस्यातिशायने ।
संसर्ग के छः भेद —एक दोष की अधिक वृद्धि के छः भेद—१. वातवृद्ध पित्तवृद्धतर, २. पित्तवृद्ध वातवृद्धतर, ३. वातवृद्ध कफवृद्धतर, ४. कफवृद्ध वातवृद्धतर, ५. पित्तवृद्ध कफवृद्धतर, ६. कफवृद्ध पित्तवृद्धतर। उक्त संसर्ग ३ तथा ६ भेदों को मिला देने से ये ९ भेद हो जाते हैं।
त्रयोदश समस्तेषु—
समस्त दोषवृद्धि के १३ भेद —इनके भेदों में दो-दो दोषों की वृद्धि तथा १-१ की अतिवृद्धि होने पर ६ भेद, तुल्यवृद्धि तथा तर-तम भेद से ६ और १ भेद के जोड़ने से ये १३ भेद होते हैं, जिन्हें आगे कहा जायेगा। उनका क्रम यह है।
—षड् दृष्टेकातिशयेन तु ॥७५॥
१३ भेदों के उदाहरण —इस दृष्टि से दो दोषों के अतिशय से तीन भेद और एक दोष के अतिशय से भी तीन भेद होते हैं, इस प्रकार ६ भेद हुए—१. कफवृद्ध, वात-पित्त अधिक वृद्ध; २. पित्तवृद्ध, वात-कफ अधिक वृद्ध; ३. वातवृद्ध, पित्त-कफ अधिक वृद्ध; ४. पित्त-कफवृद्ध, वात अधिक वृद्ध; ५. वात-कफवृद्ध, पित्त अधिक वृद्ध; ६. वात-पित्तवृद्ध, कफ अधिक वृद्ध ॥७५॥
एकं तुल्याधिकेः—
दोषभेदीयाध्यायः १२ ]
सूत्रस्थानम्
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एक भेद का निर्देश—१. वातवृद्ध, पित्तवृद्ध, कफवृद्ध।
वक्तव्य—उक्त तरह भेद सन्निपातज विकारों में देखे जाते हैं।
—षट् च तारतम्यविकल्पनात्।
पुनः छः भेद—दोषों के तर-तम भेदों के विकल्प से पुनः छः भेद होते हैं। यथा—१. वातवृद्ध, पित्तवृद्धतर, कफवृद्धतम। २. वातवृद्ध, कफवृद्धतर, पित्तवृद्धतम। ३. पित्तवृद्ध, कफवृद्धतर, वातवृद्धतम। ४. पित्तवृद्ध, वातवृद्धतर, कफवृद्धतम। ५. कफवृद्ध, वातवृद्धतर, पित्तवृद्धतम। ६. कफवृद्ध, पित्तवृद्धतर, वातवृद्धतम।
पञ्चविंशतिमित्येवं वृद्धैः—
वृद्धदोषों का योग—इस प्रकार ऊपर कही गयी विधि से वृद्ध ( बढे हुए ) दोषभेदों की २५ संख्या होती है।
—क्षीणैश्च तावतः ॥ ७६ ॥
क्षीणदोषों का योग—इस प्रकार ऊपर कही गयी विधि से क्षीण ( घटे हुए ) दोषभेदों की संख्या भी २५ होती है ॥ ७६ ॥
वक्तव्य—ऊपर दिये गये दोषभेदों में 'वृद्ध' शब्द के स्थान पर 'क्षीण' शब्द को जोड़ देने से आप स्वयं क्षीण दोषभेदों का आकलन कर लेंगे। अतः ग्रन्थवृद्धि के भय से यहाँ क्षीण भेदों को नहीं दिया गया। इस प्रकार यहाँ तक कुल मिलाकर ५० दोषभेदों का वर्णन कर दिया गया है।
एकैकवृद्धिसमताक्षयैः षट् ते—
वृद्धि-सम-क्षयभेद से छः—एक-एक दोषों के वृद्धि, सम तथा क्षय भेद से निम्नलिखित ६ भेद होते हैं। यथा—१. वातवृद्ध, पित्तसम, कफक्षीण; २. पित्तवृद्ध, वातसम, कफक्षीण; ३. कफवृद्ध, पित्तसम, वातक्षीण; ४. कफवृद्ध, वातसम, पित्तक्षीण; ५. वातवृद्ध, कफसम, पित्तक्षीण; ६. पित्तवृद्ध, कफसम, वातक्षीण।
—पुनश्च षट्। एकक्षयद्वन्द्ववृद्ध्या सविपर्ययाऽपि ते ॥ ७७ ॥
क्षय-वृद्धिभेद से पुनः छः भेद—एक दोष का क्षय तथा दो दोषों की वृद्धि जहाँ विपर्यय गति से देखी जाती है, वहाँ ये छः भेद इस प्रकार होते हैं—१. वातक्षीण, पित्त-कफवृद्ध; २. पित्तक्षीण, वात-कफवृद्ध; ३. कफक्षीण, वात-पित्तवृद्ध। १. वात-पित्तक्षीण, कफवृद्ध; २. वात-कफक्षीण, पित्तवृद्ध; ३. पित्त-कफक्षीण, वातवृद्ध ॥ ७७ ॥
भेदा द्विषष्टिर्निर्दिष्टाः—
बासठ दोषभेद—यहाँ तक ५० + ६ + ६ = ६२ भेदों की उक्त प्रकार से गणना कर दी गयी है।
—त्रिषष्ठः स्वास्थ्यकारणम्।
तिरसठबाँ भेद—तिरसठबाँ भेद स्वास्थ्य का कारण माना गया है। वह इस प्रकार है—वातपित्त-कफसम।
वक्तव्य—यहाँ तक जो दोषभेद गिनाये गये हैं, उनमें ६२ भेद तो वे हैं जो रोगों की उत्पत्ति के कारण होते हैं और ६३वाँ भेद वह है, जो मानव को नीरोग अथवा स्वस्थ बनाये रखने में कारण होता है। यहाँ कुल मिलाकर दो प्रकार के दोषभेद कहे गये हैं—विषम दोषभेद ६२ और सम दोषभेद १; इस प्रकार इनकी संख्या ६३ होती है। अर्थात् आयुर्वेदशास्त्र का मूल उद्देश्य है—'धातुसाम्य्यक्रिया चोक्ता तत्रत्यास्य प्रयोजनम्'। वात आदि दोषों को समान स्थिति में बनाये रखना। इसी को प्रकारान्तर से इस प्रकार कहा
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अष्टाङ्गहृदये
गया है—‘समदोषः समाश्रिश्च समधातुमलङ्क्रियः । प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ इत्यभिधीयते’ ॥ अष्टांगहृदय-सूत्रस्थान १।२० में कहा गया है—‘रोगस्तु दोषवैषम्यं दोषसाम्यमरोगता’ । दोषभेदों का वर्णन देखें—च.सू. १७४१ से ४४ तक ।
संसारग्राहसहधिरादिभित्तयेषां दोषांस्तु क्षयसमताविवृद्धिभेदैः । आनन्त्यं तरतमयोगतश्च यातान् जानीयादवहितमानसो यथास्वम् ॥ ७८ ॥
इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूत्रश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां प्रथमे सूत्रस्थाने दोषभेदीयो नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
दोषों के अनन्त भेद—उपर्युक्त दोषभेदों का रस-रक्त आदि धातुओं तथा पुरीष आदि मलों के साथ संसर्ग हो जाने से और उनके क्षय, समता एवं वृद्धि के भेदों से, तर-तम के संयोगों से उत्क्त वात आदि दोषों के असंख्य भेद हो सकते हैं। चिकित्सक का कर्तव्य है कि उन भेदों-उपभेदों को भी सावधान होकर ठीक प्रकार से समझने का प्रयत्न करे ॥ ७८ ॥
वक्तव्य—यहाँ जिस प्रकार दोषों के भेदों की चर्चा की गयी है, इसी प्रकार अष्टांगहृदय-सूत्रस्थान के १०वें अध्याय में मधुर आदि रसों के विविध संयोगों की चर्चा की गयी है। उसे भी चिकित्सा की दृष्टि से देखें। रसभेदों की संख्या भी इसी प्रकार अनगिनत हो सकती है।
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में दोषभेदीय नामक बारहवाँ अध्याय समाप्त ॥ १२ ॥
त्रयोदशोऽध्यायः
अथातो दोषोपक्रमणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ।
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।
अब यहाँ से हम दोषोपक्रमणीय नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। जैसा कि आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।
उपक्रम—उपक्रमण का अर्थ है—चिकित्सा। इसके पहले अध्याय में विकारयुक्त अर्थात् घटे-बढ़े हुए वात आदि दोषों, रस आदि धातुओं तथा पुरीष आदि मलों की शीघ्र चिकित्सा करनी चाहिए, कहा गया है। अतः उनकी चिकित्सा करने के दृष्टिकोण से प्रस्तुत अध्याय का यहाँ उपक्रम किया जा रहा है। अथवा उक्त विषय को हम इस प्रकार भी कह सकते हैं—लक्षणस्कन्ध का वर्णन करने के बाद अब यह औषधस्कन्ध प्रस्तुत है।
संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—च.चि. ३०; सु.उ. ६४ तथा अ.सं.सू. २१ एवं २३ में देखें।
वातस्योपक्रमः स्नेहः स्वेदः संशोधनं मृदु। स्वादुमूललवणोष्णानि भोज्यान्मध्यङ्गमर्दनम् ॥ १ ॥
वेष्टनं त्रासनं सेको मद्यं पैंष्टिकगौडिकम्। स्निग्धोष्णा बस्तयो बस्तिनियमः सुखशीलता ॥ २ ॥
दीपनैः पाचनैः सिद्धाः स्नेहाश्रानेकयोनयः। विशेषान्मेद्यपिशिरसतैलानुवासनम् ॥ ३ ॥
वातदोष-चिकित्सा—स्नेह-प्रयोग (पान), स्वेदन (पसीना लाने के उपाय), हलका संशोधन (वमन, विरेचन आदि), मधुर, अम्ल, लवण रस तथा उष्ण भोजनों का प्रयोग, अभ्यंग (उबटन), मर्दन (मूट्टी, चम्पी, दबाना आदि), वेष्टन (पट्टी आदि से बाँधना), त्रासन (डराना-धमकाना), संक, मद्य का सेवन, उसमें भी पीठी और गुड़ से निर्मित मद्य का सेवन, स्निग्ध तथा उष्ण बस्तियों का नियमानुसार सेवन करना, सुखपूर्वक समय बिताना (व्यर्थ की दौड़-धूप से वातदोष बढ़ जाता है, अतः आराम करना), अग्निवर्धक तथा पाचनकारक द्रव्यों द्वारा तैयार किये गये अनेक प्रकार के स्नेहों का सेवन करना, विशेष रूप से सूअर, भैंसा आदि मेदस्वी प्राणियों के मांस तथा मांसरस का सेवन अथवा वातहर तैलों (नारायण तैल, एरण्ड तैल आदि) की अनुवासन बस्ति का प्रयोग करें ॥ १-३ ॥
पित्तस्य सर्पिषः पानं स्वादुशीतैर्विरेचनम्। स्वादुतिक्तकषायणि भोजनान्मौषधानि च ॥ ४ ॥
सुगन्धिशीतहृद्यानां गन्धानामुपसेवनम्। कण्ठे गुणानां हाराणां मणीनामुरसा धृतिः ॥ ५ ॥
कपूरचन्दनोशीरैरनुलेपः क्षणे क्षणे। प्रदोषश्चन्द्रमाः सौधं हारि गीतं हिमोऽनिलः ॥ ६ ॥
अयन्त्रणसुखं मित्रं पुत्रः सन्दिग्धमृधवाक्। छन्दानुवर्तिनो दाराः प्रियाः शीलविभूषिताः ॥ ७ ॥
शीताम्बुधारगर्भाणि गृहाण्युद्यानदीर्घिकाः। सुतीर्थविपुलस्वच्छसलिलाशयसेकते ॥ ८ ॥
साम्भोजजलतीरान्ते कायमाने द्रुमाकुले। सौम्या भावाः पयः सर्पिविरेकश्च विशेषतः ॥ ९ ॥
पित्तदोष-चिकित्सा—घृतपान, मधुर तथा शीतवीर्य द्रव्यों द्वारा विरेचन कराना, मधुर, तिक्त तथा कषाय रस-प्रधान भोजनों एवं औषधों का प्रयोग, सुगन्धित, शीतल तथा हृदय को प्रिय लगने वाले गन्धों का समीप से सेवन करना, गले में कण्ठियों, हारों तथा मणियों को (हृदय में) धारण करें। कपूर, चन्दन, खस का बार-बार अनुलेप लगायें। वास्तव में ये लेप सूख जाने पर कष्टकारक होते हैं, अतः सूखे हुए लेप को हटाकर तब ताजा लेप उन-उन अवयवों पर लगायें। प्रदोष (सायंकाल) का समय, चन्द्रमा, सौध (चूना पुता हुआ भवन—यह कुछ दिन शीतल रहता है) में निवास, मनोहर गीत, शीतल वायु, अयन्त्रणसुखमित्र
१८६
अष्टाङ्गहृदये
(ऐसा मित्र जो मनचाहा सुख दे सके), मधुर तथा तोतली बोली बोलने वाला पुत्र, मन के अनुरूप व्यवहार करने वाली, प्रिय, सुशील तथा सुशोभित स्त्रियाँ, शीतल जल की धाराओं वाले फुहारों से युक्त घर, बगीचे, बावड़ियाँ, सुन्दर घाट वाले, विस्तृत, साफ-सुथरे जल वाले जलाशय के समीप बालू से बने हुए ऊँचे स्थान पर बैठना, खिले हुए कमलों से युक्त तालाब के तट पर जहाँ घास-फूस का घर बनाया गया हो और जो चारों ओर हरे-भरे पेड़ों से घिरा हुआ हो ऐसे स्थानों पर निवास करना, सभी मन को प्रसन्न करने वाले भावों (रहन-सहन की व्यवस्था) से युक्त स्थान पर विहार करना; विशेष करके दूध तथा ची का सेवन करना और विरेचन करना—ये पित्तदोष की चिकित्सा है ॥ ४-१ ॥
वक्तव्य —अयन्त्रणसुखं मित्रम्—मित्र का पास में रहना सुखद होता है और उसकी बात को मानना यन्त्रणा जैसा कष्ट नहीं देती। कायमानम्—अन्यत्र इसका अर्थ है—शरीर के बराबर और यहाँ 'तृणादिरचिता-गारम्'। प्रदोषः—यह समय चन्द्रमा के न रहने पर भी सुखद एवं शीतल होता है।
॥लेख्मणो विधिना युक्तं तीक्ष्णं वमनरेचनम्। अत्रं हृक्षालपतीक्ष्णोष्णं कटुतिक्तकपायकम् ॥ १० ॥
दीर्घकालस्थितं मद्यं रतिप्रोतिः प्रजागरः। अनेकरूपो व्यायामश्चिन्ता रूक्षं विमर्दनम् ॥ ११ ॥
विशेषाद्भ्रमनं यूषः शोर्डं मेदोन्मसोपधम्। धूमोपवासगण्डूषा निःसुखत्वं सुखाय च ॥ १२ ॥
कफदोष-चिकित्सा —इसमें विधिपूर्वक तीक्ष्ण वमन तथा विरेचन का प्रयोग करें। आहार—रूक्ष, मात्रा में थोड़ा, तीक्ष्ण (मरिच आदि द्रव्य), उष्णवीर्य वाले पदार्थ; कटु, तिक्त, कपाय रस से युक्त पदार्थों का सेवन करें; पुराना मद्य, स्त्री-सहवास में प्रीति, रात में अधिक जागना, विविध प्रकार का व्यायाम (परिश्रम वाले कार्य), चिन्तन (फिकर) करना, रूक्ष पदार्थों (सोठ आदि) को शरीर पर मलना, विशेष करके इसमें वमन कराना, दालों का यूष (रस), मधु, मेदोनाशक चिकित्सा, धूमपान, उपवास, गण्डूष धारण करना तथा सुखसाधनों का त्याग करना—ये सब सुखद होते हैं ॥ १०-१२ ॥
वक्तव्य —महर्षि वाग्भट के उक्त विवेचन का मूल आधार च.सू. २०।१२ से १९ तक है, इन्हें देखें। विशेष रूप से वातज विकारों में बस्तिप्रयोग, पित्तज विकारों में विरेचन और कफज विकारों में वमन-प्रयोग चिकित्सा के मूल आधार हैं। 'उपक्रम' का अर्थ है—चिकित्सा। देखें—मैदनी-कोष।
उपक्रमः पुण्यदोषान् योऽयमुद्दिश्य कीर्तितः। संसर्गसन्निपातेषु तं यथास्वं विकल्पयेत् ॥ १३ ॥
विषयोपसंहार —यहाँ जो यह वात आदि दोषों की चिकित्सा का निर्देश किया गया है, इसे संसर्गज (ब्रह्मज) रोगों तथा सन्निपातज रोगों में दोषानुसार देखकर प्रयोग करना चाहिए ॥ १३ ॥
ग्रीष्मः प्रायो महत्पित्ते वासन्तः कफमाष्टते। महतो योगवाहिल्वातु, कफपित्ते तु शारदः ॥ १४ ॥
चिकित्सा-निर्देश —वातज एवं पित्तज रोगों में प्रायः ग्रीष्म-ऋतुचर्या में कहे गये आहार-विहारों का सेवन, कफज तथा वातज रोगों में वसन्त-ऋतुचर्या का सेवन करें। क्योंकि वात या वायु योगवाही होता है अर्थात् वह उष्णकाल में उष्ण और शीतकाल में शीत हो जाता है। कफज और पित्तज रोगों में शरद-ऋतुचर्या में कहे गये पदार्थों का सेवन करें ॥ १४ ॥
चय एव जयेदोषं कुपितं त्वविरोधयन्। सर्वकोपे बल्योपासं शेषदोषाविरोधतः ॥ १५ ॥
चिकित्सा का समय —जब दोषों का संचय होता है, उसी समय उनको शान्त कर देना चाहिए। यदि उस समय कोई दोष कुपित हुआ हो तो संचित दोष को शान्त करते समय उसके साथ विरोध न करते हुए कुपित दोष की भी चिकित्सा कर लेनी चाहिए। यदि सब दोष कुपित हुए हों तो उनमें जो बलवान् दोष हो उसकी पहले शान्त करनी चाहिए, किन्तु ध्यान रहे कि शेष दोषों के साथ उस चिकित्साक्रम का विरोध नहीं होना चाहिए ॥ १५ ॥
प्रयोगः शमयेद्वचाधिमेकं योऽन्यमुदीरयेत्। नाऽसौ विशुद्धः शुद्धस्तु शमयेद्यो न कोपयेत् ॥ १६ ॥
दोषोपक्रमणीयाध्यायः १३ ]
सूत्रस्थानम्
१८७
शुद्ध प्रयोग का परिचय—जो औषध-प्रयोग (चिकित्सा) एक रोग अथवा एक दोष को शान्त करता है और दूसरे रोग या दोष को उन्माड देता है, वह प्रयोग विशुद्ध (उत्तम) नहीं कहा जा सकता है। शुद्ध प्रयोग तो वह है जो एक रोग या दोष को शान्त तो कर दे, किन्तु दूसरे रोग को न उन्माडे ॥ १६ ॥
बक्तव्य—इस दृष्टि से प्रचलित चिकित्सा-पद्धतियों की ओर देखिये, क्या इतना उदार सिद्धान्त किसी अन्य पद्धति का है? आयुर्वेद के अतिरिक्त अन्य पद्धतियों तो रोग के तात्कालिक लाभ तक ही मात्र अपना कर्तव्य समझती हैं, अस्तु।
व्यायामादूषणस्तैक्षण्यादहिताचरणादपि। कोष्ठाच्छाखास्थिमर्माणि द्रुतत्वान्मास्तस्य च ॥ दोषा यान्ति—
दोषों का स्थानान्तर गमन—व्यायाम अथवा शारीरिक श्रम करने से, जठराग्नि की तीक्ष्णता से, अहित-कर आहार-विहार करने से तथा वातदोष के शीघ्रगामी होने से उक्त वात आदि दोष कोष्ठ (नामक आभ्यन्तर रोगमार्ग में) से शाखा (नामक बाह्य रोगमार्ग) में अथवा अस्थि (मध्यम रोगमार्ग) में पहुँच जाते हैं ॥ १७ ॥
—तथा तैश्चः स्रोतोमुखविशोधनात्। वृद्ध्याऽभिष्यन्दान्त्याकात्कोष्ठं बायोश्च निग्रहात् ॥ १८ ॥
दोषों का कोष्ठगमन—और स्रोतों के मुखों की शुद्धि हो जाने से, उनकी वृद्धि होने से, अभिष्यन्द होने से, पाक होने से अथवा वातदोष के निग्रह (अवरोध) से बाह्य तथा मध्यम रोगमार्ग से कोष्ठ की परिधि में दोष पहुँच जाते हैं ॥ १८ ॥
तत्रस्थाश्च विलम्बेन् भूयो हेतुप्रतीक्षिणः।
पुनः रोगोत्पादन—जब तक दोष कोष्ठप्रदेश में रहते हैं कोई रोग-विशेष को उत्पन्न नहीं करते, किन्तु वे पुनः विकारोत्पादक हेतुओं (निदानों) की प्रतीक्षा करते रहते हैं। अपने अनुरूप कारणों को पाकर वे रोगोत्पत्ति कर देते हैं।
ते कालादिबलं लब्ध्वा कुष्यन्त्याश्रयेष्वपि ॥ १९ ॥
अन्य स्थानों में दोषप्रकोप—वे वात आदि दोष काल, देश, अपथ्य आहार-विहार द्वारा बल (शक्ति) पाकर अतएव प्रबल होकर दूसरे-दूसरे दोषों के आशयों में जाकर भी कुपित होकर रोगों को उत्पन्न कर देते हैं ॥ १९ ॥
तत्रान्यस्थानसंस्थेषु तदीयामबलेषु तु। कुर्याच्चिकित्साम्—
चिकित्सा-निर्देश—इस स्थिति में यदि दूसरे दोष के आशय में स्थित दोष यदि दुर्बल हो तो उस स्थान में स्थित दोष सम्बन्धी चिकित्सा करनी चाहिए। यदि दोष बलवान् हो तो पहले उसी दोष की चिकित्सा करनी चाहिए।
—स्वामेव बलेनान्याभिभाषिषु ॥ २० ॥
आगन्तु शमयेद्वोषं स्थानिनं प्रतिकृत्य वा।
यदि वह दोष अपनी शक्ति से निर्दिष्ट स्थान (आशय) वाले दोष को दबाकर स्थित हो तो उस (बलवान्) दोष की चिकित्सा करे। अथवा स्थानीय मूल दोष की चिकित्सा करके तब आगन्तुज (दूसरे स्थान से आये हुए) दोष की चिकित्सा करनी चाहिए ॥ २० ॥
प्रायस्तिर्यगता दोषाः क्लेशयन्त्यातुरांश्चिरम् ॥ २१ ॥
कुर्यान्न तेषु त्वरया देहाग्निबलवित् क्रियाम्।
तिर्यगता दोष-चिकित्सा—प्रायः तिर्यक् (तिरछे अर्थात् मध्यम रोग) मार्गों में गये हुए दोष चिरकाल तक रोगियों को कष्ट देते रहते हैं, अतः शरीरबल एवं अग्निबल को जानने वाला चिकित्सक शीघ्रता से इनकी चिकित्सा न करे अर्थात् धीरे-धीरे इनकी चिकित्सा करे ॥ २१ ॥
१८८
अष्टाङ्गहृदये
शमयेत्तान् प्रयोगेण सुखं वा कोष्ठमानयेत् ॥ २२ ॥
ज्ञात्वा कोष्ठप्रपन्नाश्च यथासन्नं विनिर्हरेत्।
चिकित्सा-विधि —तिर्यगत दोषों के लंघन या पाचन आदि विधियों से अथवा स्नेहन तथा स्वेदन विधियों से सरलता से उन दोषों को कोष्ठ की ओर ले आये और जब वे दोष कोष्ठ में आ जाते हैं, तो उन्हें विरेचन विधि से बाहर निकालने का प्रयास करे ॥ २२ ॥
स्रोतोरोधबलघ्रंशगौरवानिलमुद्भताः ॥ २३ ॥
आलस्यापत्तिनिष्ठीवमलसङ्काहचिकलमाः । लिङ्गं मलानां सामानां, निरामाणां विपर्ययः ॥
साम-निराम दोषों के लक्षण —स्रोतों में ह्कावट, शारीरिक बल का क्षीण होना, शरीर में भारीपन, वातदोष का प्रतिलोम होना, आलस्य (शक्ति रहने पर भी काम करने की इच्छा का न होना), भोजन का न पचना, बार-बार थूक का आना, पुरीष आदि मलों के निकलने में ह्कावट, अरुचि और वलम (मुस्ती) —ये लक्षण आमदोषयुक्त वात आदि दोषों के होते हैं और इनके विपरीत लक्षण निरामदोषों के होते हैं ॥ २३-२४ ॥
ऊष्णोऽल्पबलत्वेन धातुमाद्यमपाचितम्। दुष्टामाशयगतं रसमामं प्रचक्षते ॥ २५ ॥
आम का वर्णन —ऊष्मा (अग्नि) का बल घट जाने से जिस रसधातु का भलीभाँति पाक नहीं हो पाता और जो आमाशय में वात आदि दोषों से दूषित हो जाता है, उस रस को 'आम' कहते हैं ॥ २५ ॥
वक्तव्य —इस विषय को विस्तृत रूप से समझने के लिए सुश्रुत-उत्तरतन्त्र अध्याय ५६ का सम्पूर्ण अवलोकन करें।
अन्ये दोषेभ्य एवाति दुष्टेभ्योऽन्योऽन्यमूर्च्छनात्। कोद्रवेभ्यो विषस्येव वदन्त्यामस्य सम्भवम् ॥
आम-सम्बन्धी मतान्तर —कुछ आचार्यों का मत है कि अत्यन्त दुष्ट वात आदि दोषों का आपस में मिश्रण होने से उस प्रकार 'आम' की उत्पत्ति हो जाती है, जैसे कोद्रों नामक धान्य में से विष की ॥ २६ ॥
आमेन तेन सम्युक्ता दोषा दूष्याश्च दूषिताः । सामा इत्युपदिश्यन्ते ये च रोगास्तदुद्भवाः ॥ २७ ॥
सामदोष एवं सामरोग —उक्त 'आम' से युक्त वात आदि दोष एवं रस आदि सातों धातु दूषित होने पर 'साम' अर्थात् आमदोषयुक्त कहे जाते हैं। उन दोषों तथा दूष्यों के सम्पर्क से उत्पन्न होने वाले ज्वर आदि रोग भी 'साम' कहे जाते हैं। यथा—आमज्वर, आमातिसार आदि ॥ २७ ॥
सर्वदेहप्रविसृतान् सामान् दोषान् न निर्हरेत्। लीनान् धातुष्वनुकिल्लिष्टान् फलादामाद्व्रसानिव ॥
आश्रयस्य हि नाशाय ते स्युर्दुर्निर्हरत्वतः ।
सामदोषों की चिकित्सा —सम्पूर्ण शरीर में फैले हुए सामदोषों को निकालने का प्रयत्न न करें, क्योंकि वे दोष रस आदि धातुओं में विलीन (मिले-जुले) रहते हैं और बाहर निकलने के लिए उन्मुख नहीं होते, ऐसी स्थिति में उन्हें न निकाले और वे दोष भी उस प्रकार नहीं निकल पाते, जैसे कच्चे फूल में से रस नहीं निकलता। ऐसी स्थिति में यदि उन दोषों को निकालने का प्रयास किया जायेगा तो वे आश्रय (उस-उस शरीरावयव) के ही विनाशक हो सकते हैं ॥ २८ ॥
पाचनैर्दीपनैः स्नेहेस्तात् स्वेदैश्च परिष्कृतान् ॥ २९ ॥
शोधयेच्छोधनैः काले यथासन्नं यथाबलम्।
दोषनिर्हरण-विधि —अतः उन आमदोषों को निकालने के लिए उन्हें पाचन, दीपन, स्नेहन एवं स्वेदन प्रयोगों के द्वारा परिष्कृत (शोधन योग्य) करके शोधन योग्य काल (ऋतु) में यथासन्न (जिस ओर से आकर दोष हके हों) और यथाबल (रोग तथा रोगी की शक्ति के अनुसार) शोधनविधियों से उनका शोधन करें ॥ २९ ॥
दोषोपक्रमणीयाध्यायः १३ ]
सूत्रस्थानम्
१८९
हन्त्याशु युक्ते वक्त्रेण द्रव्यमाभाशयान्मलां ॥ ३० ॥ प्राणेन चोर्ध्वजन्मृतान् पक्वाधानादुदेन च ।
आसन्न दोष का निर्हरण—इस स्थिति में प्रयोग किया गया शोधनकारक औषधद्रव्य आभाशय में स्थित दोषों ( मलों ) को वमन विधि से मुख द्वारा निकाल देता है। नासिका के छिद्रों द्वारा जन्म के ऊपरी भाग में स्थित विकारों को निकाल देता है। पक्वाशयगत मलों को शोधन औषध गुदमार्ग से निकाल देता है ॥ ३० ॥
बक्तव्य—तात्पर्य यह है कि मुख द्वारा प्रयुक्त औषधद्रव्य वमन द्वारा, नासिका द्वारा प्रयुक्त रेचकनस्य नासिका के छिद्रों द्वारा दोष-निर्हरण करता है और निरुत्पन्नवस्ति द्वारा दिये गये औषधद्रव्य पक्वाशयस्थित दोषों को गुदमार्ग से निकाल देते हैं। यही तात्पर्य 'यथासन्न' शब्द का है।
उत्किल्लष्टानध ऊर्ध्वं वा न चामान् वहतः स्वयम् ॥ ३१ ॥ धारयेदौषधैर्दोषान् विधृतास्ते हि रोगवाः ।
दोषनिर्हरण-निर्देश—बाहर निकलने के लिए ऊपर तथा नीचे से प्रवृत्त अथवा गुदमार्ग से स्वयमेव बहते हुए आमदोषों को स्तम्भन औषधों का प्रयोग करके न रोकें, क्योंकि रोके गये वे आमदोष अनेक प्रकार के रोगों को उत्पन्न कर देते हैं ॥ ३१ ॥
प्रवृत्तान् प्रागतं दोषानुपेक्षेत हित्ताशिनः ॥ ३२ ॥ विबद्धान् पाचनेस्तैस्तैः पाचयेन्निरहरेत वा ।
दोषनिर्हरण-विवेक—अतएव हित भोजन करने वाले रोगी के स्वयं प्रवृत्त हुए दोषों की पहले उपेक्षा करें अर्थात् उन्हें प्रवृत्त होने ( निकल जाने ) दें और जो आमदोष शरीर में रके हुए हों, उन्हें उचित पाचनकारक औषधद्रव्यों से पचायें अथवा उनको निकालने का प्रयत्न न करें। उक्त ३१ तथा ३२वें पद्य में प्रयुक्त 'दोष' शब्द का अर्थ—मल है ॥ ३२ ॥
श्रावणे कार्तिके चैत्रे मासि साधारणे क्रमात् ॥ ३३ ॥ ग्रीष्मवर्षाहिमचितान् वाय्वादीनाशु निरहरेत् ।
शोधन का काल—श्रावण, कार्तिक, चैत्र ये मास साधारण ( सम-शीतोष्ण ) होते हैं, अतएव इन मासों में व्रम से ग्रीष्म, वर्षा, हिम ( हेमन्त ) ऋतु में संचित वात, पित्त तथा कफ दोषों को शीघ्र शोधन द्रव्यों के प्रयोगों से निकाल डालें ॥ ३३ ॥
अत्युष्णवर्षशीता हि ग्रीष्मवर्षाहिमागमाः ॥ ३४ ॥ सन्धौ साधारणे तेषां दुष्टान् दोषान् विशोधयेत् ।
सहेतुक शोधन काल—उक्त कालों में शोधन कराने का कारण-निर्देश—ग्रीष्मकाल में गर्मी अधिक होती है, वर्षाकाल में वर्षा अधिक होती है और हेमन्त ऋतु में शीत अधिक पड़ता है, अतः ऋतुसन्धि में तथा उक्त साधारण काल में ग्रीष्म, वर्षा, हेमन्त ऋतुओं में दूषित हुए दोषों का शोधन करना चाहिए ॥ ३४ ॥
स्वस्थवृत्तमभिप्रेत्य, व्याधी व्याधिवशेन तु ॥ ३५ ॥
शोधन का दृष्टिकोण—उक्त दोषशोधन का निर्देश सामान्य रूप से स्वस्थ पुरुष के लिए कहा गया है, क्योंकि समय पर संचित दोषों का निर्हरण हो जाने से उसका स्वास्थ्य बना रहेगा। रुग्णावस्था में तो रोग की स्थिति के अनुसार दोषों का निर्हरण करना पड़ता है ॥ ३५ ॥
कृत्वा शीतोष्णवृष्टीनां प्रतीकारं यथायथम् । प्रयोजयेत्क्रियां प्राप्तां क्रियाकालं न हापयेत् ॥ ३६ ॥
शोधन की विशिष्ट विधि—रुग्णावस्था में शीत, उष्ण, वर्षा के कारण होने वाली बाधाओं का प्रतीकार करके यथोचित विधि से वमन-विरचन ( संशोधनों ) का प्रयोग कराना ही चाहिए। इसमें क्रियाकाल को हाथ से न जाने दें ॥ ३६ ॥
११०
अष्टाङ्गहृदये
युष्म्यादनन्तमन्त्रादौ मध्येऽन्ते कवलान्तरे । ग्रासे ग्रासे मुहुः सात्सं सामुद्रं निशि बीचधम् ॥ ३७ ॥
औषध-सेवन के १० काल—औषध का प्रयोग निम्नलिखित समयों में करें—१. अनन्त, इसमें केवल औषध का सेवन करें; जैसे—लंघन काल में। २. अन्न खाने से पहले अर्थात् औषध खाने के बाद भोजन करना। ३. अन्न (आहार) के बीच में, जैसे—भोजन के बीच-बीच में जल पिया जाता है। ४. अन्न के अन्त में। ५. कवल (कौर-ग्रास) के बीच में; यह दो प्रकार से होता है—१. कौर के बीच में डालकर अथवा २. दो कौरों के बीच में; जैसे—पहला कौर खाया फिर औषध, फिर दूसरा कौर। ६. प्रत्येक ग्रास के साथ। ७. मुहुः—द्वितीय में अनेक बार। ८. सात्सं—अन्न के साथ मिलाकर। ९. सामुद्र्यं—अन्न से सम्पुटित करके। १०. निशि—सोते समय ॥ ३७ ॥
वक्तव्य —सुश्रुत ने औषध-सेवन के दस कालों का वर्णन इस प्रकार किया है—‘अत ऊर्ध्वं दशौषध-कालान् वक्ष्यामः। तत्राभवन्तं प्राग्भवन्तमधोभक्तं मध्येभक्तमन्तराभक्तं सभक्तं सामुद्र्यं मुहुर्मूर्हृत्प्रियासान्तरं चेति दशौषधकालाः’ ॥ (मु.उ. ६४।६५) इसकी व्याख्या इसी क्रम में ८३ तक सुश्रुत में ही देखें। आचार्य शाङ्कधर ने औषध-सेवन के पाँच कालों का ही उल्लेख किया है। आचार्यों के अपने-अपने दृष्टिकोण हैं। देखें—शा.सं.पू.ख. २।२ से १२ तक और च.चि. ३०।२९७ से ३०३ तक।
कफोद्रेके गदेऽनन्तं बलिनो रोगरोगिणोः। अन्नादौ विगुणेषपाने, समाने मध्य इष्यते ॥ ३८ ॥
व्यानोऽन्ते प्रातराशयस्य, सायमाशयस्य तूत्तरे। ग्रासग्रासान्तयोः प्राणे प्रदुष्टे मातरिश्चभि ॥ ३९ ॥
मुहुर्मूर्हृत्विषच्छर्दिहिम्वातृष्ट्यासकासिषु। योज्यं सभोज्यं श्वेषज्यं भोज्यैश्चित्रैररोचके ॥ ४० ॥
कम्पाक्षेपकहिम्वासु सामुद्रं लघुभोजिनान्म्। ऊर्ध्वजत्रुविकारेषु स्वप्नकाले प्रशस्यते ॥ ४१ ॥
इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां
प्रथमे सूत्रस्थाने दोषोपक्रमणीयो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
रोगानुसार औषध-सेवनकाल —यहाँ रोगानुसार उक्त दस औषध-सेवनकालों का प्रयोग निर्देश किया जा रहा है—(१) अनन्त औषध का प्रयोग कफदोष का प्रकोप होने पर, बलवान् रोग में तथा बलवान् रोगी में किया जाता है। (२) अन्न के आदि में अपानवायु की गति विलोम होने पर औषध दी जाती है। (३) भोजन के मध्य में औषध का प्रयोग समानवायु की विकृति में किया जाता है। (४) भोजन के अन्त में औषध का प्रयोग दिन के भोजन के अन्त में व्यानवायु के विकृत होने पर और रात्रि के भोजन के अन्त में उदानवायु के विकृत होने पर किया जाता है। (५) ग्रास के अन्त में सेवन की गयी औषधि प्राणवायु की विकृति में दी जाती है। (६) ग्रास में मिलाकर दी गयी औषधि भी प्राणवायु की विकृति में लाभप्रद होती है। (७) बार-बार औषध-प्रयोग विषविकार, वमन, हिचकी, तृष्णा (प्यास का अधिक लगना), श्वास तथा कास रोगों में लाभप्रद होता है। (८) सभोज्यं (भोजन-पदार्थों में मिलाकर) किया गया औषध-प्रयोग अरोचक रोग में करना चाहिए, वे भोजन विविध प्रकार के तथा हर्षिकारक हों। (९) सामुद्र्य औषध-प्रयोग कम्परोग, आक्षेपक और हिम्वा (हिचकी) में करना चाहिए। इन रोगियों को लघु भोजन करने वाला होना चाहिए। (१०) निशि (सोते समय) में किया गया औषध-प्रयोग जत्रुअस्थि (Collar bone) के ऊपरी भाग में होने वाले कान, नाक आदि के रोगों में लाभप्रद होता है ॥ ३८-४१ ॥
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित
निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-मूत्रस्थान में
दोषोपक्रमणीय नामक तेरहवाँ अध्याय समाप्त ॥ १३ ॥
चतुर्दशोऽध्यायः
अथातो द्विविधोपक्रमणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ।
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ॥
अब यहाँ से हम द्विविध उपक्रमणीय नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। जैसा कि आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।
उपक्रम—दोषोपक्रमणीय अध्याय के बाद द्विविधोपक्रमणीय अध्याय का वर्णन करने में दोनों के बीच सामान्य तथा विशेष का सम्बन्ध है। पहले वाले अध्याय में सर्वसामान्य चिकित्सा का वर्णन किया गया था, अब इसमें दो प्रकार की चिकित्साओं का विशेष वर्णन किया जा रहा है।
संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—च.सू.२१, २२, २३; सु.सू. १५, सु.चि. १।११ से १३; सु.उ. ३९ श्लोक १०२-१०५; अ.सं.सू. २४ में देखें।
उपक्रमस्य हि द्वित्वाद्विधैवोपक्रमो मतः।
चिकित्सा के दो भेद—उपक्रम्य ( रोग ) दो प्रकार का होता है—१. साम और २. निराम। अतएव इन दोनों की चिकित्सा भी विधिभेद से दो प्रकार की होती है।
एकः सन्तर्पणस्तत्त्वं द्वितीयश्चापतर्पणः ॥ १ ॥
बृंहणो लङ्घनश्चेति तत्पर्यायावुदाहृतौ। बृंहणं यद्वहत्त्वाय लङ्घनं लाघवाय यत् ॥ २ ॥ देहस्य—
सन्तर्पण तथा अपतर्पण—उन दो चिकित्साओं का नाम है—१. सन्तर्पण और २. अपतर्पण। इन्हीं के पर्याय हैं—१. बृंहण और २. लंघन ( उपवास करना )। बृंहण-चिकित्सा उसे कहते हैं जिससे शरीर हृष्ट एवं पुष्ट हो जाय और लंघन उसे कहते हैं जिससे शरीर हल्का हो जाय ॥ १-२ ॥
—भवतः प्रायो भौमापमितरच्च ते।
तत्त्वों की प्रधानता—बृंहण-चिकित्सा में पृथिवी तत्त्व तथा जल तत्त्व की प्रधानता होती है और लंघन-चिकित्सा में शेष तीन तत्त्वों ( अग्नि, वायु एवं आकाश तत्त्व ) की प्रधानता होती है।
स्नेहंन रूक्षणं कर्म स्वेदनं स्तम्भनं च यत् ॥ ३ ॥
भूतानां तदपि द्वैध्याद्वितयं नातिवर्तते।
स्नेहन आदि का वर्णन—स्नेहन, रूक्षण, स्वेदन तथा स्तम्भन ये चारों कर्म भी सन्तर्पण तथा अपतर्पण भेद से दो प्रकार के होते हैं। क्योंकि पृथिवी आदि पाँच महाभूत भी सन्तर्पण तथा अपतर्पण भेद से दो प्रकार के होते हैं ॥ ३ ॥
शोधनं शमनं चेति द्विधा तत्रापि लङ्घनम् ॥ ४ ॥
प्रत्येक के दो भेद—सन्तर्पण का पर्याय बृंहण है और अपतर्पण का पर्याय लंघन है। यह लंघन भी शोधन एवं शमन भेद से दो प्रकार का कहा गया है ॥ ४ ॥
यदीरयेद्वहिर्दोषान् पञ्चधा शोधनं च तत्। निरुहो वमनं कायशिरोरेकोऽन्नविस्मृतिः ॥ ५ ॥
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अष्टाङ्गहृदये
शोधन कर्म एवं उसके भेद—शोधन-चिकित्सा वह है, जो शरीर स्थित दोषों ( मलों ) को बाहर निकाल देती है। यह शोधन-चिकित्सा पाँच प्रकार की होती है। जैसे—१. निरुह्णबस्ति, २. वमन, ३. विरेचन, ४. शिरोविरेचन ( नस्य ) तथा ५. रक्तव्राण ॥५॥
न शोधयति यद्दोषान् समाप्नोदीरयत्यपि। समीकरोति विषमान् शमनं तच्च सप्तधा ॥६॥ पाचनं दीपनं क्षुतुङ्घ्यायामातपमारुताः।
शमन के लक्षण एवं भेद—जो चिकित्सा बड़े हुए वात आदि दोषों का शोधन न करे, समदोषों की वृद्धि भी न करे और विषम दोषों को सम करे, उसे 'शमन-चिकित्सा' कहते हैं। यह सात प्रकार की होती है। यथा—१. पाचन ( आमदोषों को पचाने वाली ), २. दीपन ( जठराग्नि को प्रदीप्त करने वाली ), ३. क्षुतु ( भूखा रहना, उपवास या लंघन करना ), ४. तुङ्घ ( प्यासा रहना ), ५. व्यायाम ( किसी प्रकार का शारीरिक परिश्रम करना ), ६. आतप ( धूप में रहना या आग संकना ) तथा ७. मारुत ( शुद्ध वायु का सेवन करना ) ॥६॥
बृंहणं शमनं त्वेव वायोः पित्तानिलस्य च ॥७॥
बृंहण के लक्षण—बृंहण नामक जो शोधन-प्रकार है, वह लंघन से अधिक उपयोगी होता है, क्योंकि बृंहण द्रव्यों को भी शोधन कहते हैं। अतः वे द्रव्य, जो स्वतन्त्र वातदोष तथा पित्तयुक्त वातदोष का शमन करते हैं, वे बृंहण कहे जाते हैं ॥७॥
बृंहयेद्व्याधिर्नैषज्यमद्यस्त्रीशोकर्शितान्। भाराध्वोरःक्षतक्षीणरूक्षदुर्बलवातलान् ॥८॥ गर्भिणीसूतिकाबालवृद्धान् ग्रीष्मेऽपरानपि।
सन्तर्पण योग्य रोग-रोगी—ज्वर आदि रोगों से, मद्यपान करने से, अधिक स्त्री-सहवास करने से अथवा शोक से जो कृश हो गये हों उनकी; अधिक भार ढोने से, रास्ता चलने से अथवा उरःक्षत से जो क्षीण हो गये हों उनकी; रूक्ष शरीर वालों की, दुर्बलों की, वातरोगियों की, गर्भवती की, प्रसूता की, बालकों तथा वृद्धों की एवं ग्रीष्म ऋतु में सभी की बृंहण ( सन्तर्पण ) चिकित्सा करनी चाहिए ॥८॥
मांसक्षीरसितासर्पिर्मधुरस्निग्धबस्तिभिः ॥९॥ स्वप्नशय्यासुखाभ्यङ्गस्नाननिर्वृतिहर्षणिः।
सन्तर्पण-चिकित्सा के उपादान—मांस, दूध, मिर्ची, घी, मधुररस-प्रधान पदार्थ ( मुनक्का, किशमिश, बादाम, काजू, चिरौजी आदि ), मधुर एवं स्निग्ध पदार्थों द्वारा निर्मित बस्तियों का प्रयोग, सुबद शय्या में सुखपूर्वक सोना, अभ्यंग ( उबटन ), स्नान, निश्चिन्तता तथा प्रवक्ष रहना ॥९॥
मेहमादोषातिस्निग्धज्वरोहस्तम्भकुष्ठिनः ॥१०॥
विसर्पविद्रधिष्ठीहशिरःकण्ठाक्षिरोगिणः। स्थूलांश्च लङ्घ्येन्नित्यं शिशिरे त्वपरानपि ॥११॥ अपतर्पण योग्य रोग-रोगी—प्रमेह, आमदोष ( आमज्वर, आमातिसार तथा आमवात आदि ), अतिस्निग्ध, ज्वररोगी, ऊहस्तम्भ, कुष्ठरोगी, विसर्प, विद्रधि, ष्ठीहरोगी, शिरोरोगी, गल्गरोगी, नेत्ररोगी ( आमाभिष्यन्द ) तथा स्थूलता रोग से पीड़ितों की शिशिर ऋतु में और इस प्रकार के अन्य रोगियों की भी अपतर्पण चिकित्सा करनी चाहिए ॥१०-११॥
तत्र संशोधनेः स्थौल्यबलपित्तकफाधिकान्। आमदोषज्वरच्छर्दिरतीसारहृदामयैः ॥१२॥ विवन्धगौरवोद्गारहूलासादिभिरातुरान्। मध्यस्थौल्यवादिकान् प्रायः पूर्व पाचनदीपनैः ॥१३॥ एभिरेवामयैरातान् हीनस्थौल्यबलादिकान्। क्षुत्तुष्णानिग्रहैर्दौर्घस्वार्तान् मध्यबलैर्दृढान् ॥१४॥ समीरणातपायसैः किमुताल्पबलैरान्।
शोधन-शमन के योग्य रोग-रोगी—पहले पद्यों में शोधन तथा शमन भेद से दो प्रकार का लंघन ( हल्का करने का उपाय ) कहा गया है। यहाँ शोधन का विवेचन किया जा रहा है—संशोधन-चिकित्सा
द्विविधोपक्रमणीयाध्यायः १४ ]
सूत्रस्थानम्
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विधि से अधिक स्थूलता ( मोटापा ) से पीड़ित, अधिक बलवान्, अधिक पित्त तथा कफ वालों की चिकित्सा करनी चाहिए।
आमदोष, ज्वर, वमन, अतिसार, हृद्दोष, विबन्ध, भारीपन, उद्वार ( डकार ), जी मिचलाना आदि रोगों से पीड़ितों की तथा मध्यम कोटि की स्थूलता, मध्यमबल, मध्यम पित्त तथा कफ वाले रोगियों की पहले पाचन तथा दीपन नामक चिकित्साविधियों से चिकित्सा करें।
उक्त आमदोष आदि रोगों से पीड़ित किन्तु हीन कोटि की स्थूलता, बल आदि वालों की चिकित्सा भूख-प्यासनग्रह नामक अपतर्पणों से करें।
मध्यम कोटि के बल वाले उपर्युक्त आमदोष आदि रोगों से पीड़ित किन्तु बलवान् रोगियों की चिकित्सा वातसेवन, आतप ( धूप ) सेवन तथा व्यायाम आदि अपतर्पणों से करें।
अल्प बल वाले आमदोष आदि ऊपर कहे गये रोगों से पीड़ित अल्प बल वाले रोगियों की चिकित्सा वातसेवन, धूपसेवन तथा व्यायाम आदि अपतर्पणों से करें ॥ ११-१४ ॥
बक्तव्य —यहाँ सन्तर्पण तथा अपतर्पण विधियों से चिकित्सा का निर्देश किया गया है। इस प्रसंग में ऊपर कहे गये रोगों एवं रोगियों में से कुछ रोग-रोगी वे हैं जिन्हें शोधन नामक अपतर्पण और कुछ को शमन नामक अपतर्पण का प्रयोग करायी जाता है। चिकित्सा काल में इस ओर भी ध्यान देना चाहिए।
न बृंहयेल्लङ्घनीयान्—
सन्तर्पण का निषेध —लंघन ( अपतर्पण ) कराने के योग्य ( प्रमेहरोगी, आमदोष युक्त आदि ) रोगियों को बृंहण ( सन्तर्पण ) योगों का प्रयोग न करायें।
—बृंहांस्तु मृदु लङ्घयेत् ॥ १५ ॥
युक्त्या वा देशकालादिवल्लतस्तानुपाचरेत्।
अपतर्पण-निर्देश —जो व्यक्ति सन्तर्पण के योग्य हैं, उनको अपतर्पण ( लंघन ) दिया जा सकता है। अथवा उनकी देश, काल आदि ( सात्य्य ) का विचार करके चिकित्सा की जा सकती है ॥ १५ ॥
बक्तव्य —कब कहाँ क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, इस सम्बन्ध में भगवान् पुनर्वसु के निर्देशों पर ध्यान दें—ज.सि. २।२५-२७ अर्थात् जो शास्त्र में बतलाया गया है बुद्धिमान् चिकित्सक को वैसा ही करना है, किसी प्रकार का दुराग्रह नहीं करना चाहिए। अपितु उसे चाहिए कि स्वयं भी तर्क-वितर्क करके अपने कर्तव्य का निश्चय करे, क्योंकि देश, काल तथा रोग बल एवं रोगी के बल के अनुसार कभी ऐसी भी अवस्था आ जाती है, जिसमें अकार्य भी करना पड़ता है और कार्यविधि को भी छोड़ना पड़ जाता है। जैसे—छर्दि, हृद्दोष तथा गुल्मरोगों में वमन करना सामान्य रूप से निषिद्ध है, किन्तु जहाँ-जहाँ इनकी स्वतन्त्र चिकित्सा कही गयी है वहाँ परिस्थिति-विशेष में वमन कराने का विधान मिलता है। इसी प्रकार कुष्ठरोगी के लिए बस्तिकर्म निषिद्ध है, परन्तु अवस्था-विशेष में निरुहणबस्ति देने का विधान किया गया है।
बृंहिते स्याद्वलं पुष्टितस्त्याध्यामयसङ्घ्रयः ॥ १६ ॥
सन्तर्पण के लाभ —भलीभाँति सन्तर्पण-विधि के हो जाने पर शरीर बलवान् एवं पुष्ट हो जाता है और सन्तर्पण-विधि द्वारा साध्य रोगों का क्षय भी हो जाता है ॥ १६ ॥
विमलेन्द्रियता सर्गो मलानां लाघवं र्विचिः। क्षुत्तुसहोदयः शुद्धहृदयोद्वाकरकण्ठता ॥ १७ ॥ व्याधिमार्ववमुत्साहस्तन्नानाशश्च लङ्घिते।
अपतर्पण के लाभ —भलीभाँति अपतर्पण के हो जाने पर इन्द्रियों में निर्मलता, मल-मूत्र आदि का सुख से निकलना, शरीर में हलकापन, भोजन के प्रति रुचि का होना, भूख तथा प्यास का साथ-साथ
१३ अ० ह०
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अष्टाङ्गहृदय
लगना, हृदय, उद्गार ( डकार ) तथा कण्ठप्रदेश का शुद्ध होना, रोगों का घट जाना, उत्साह की वृद्धि एवं तन्त्र का नाश—ये लक्षण होते हैं ॥ १७ ॥
अनेपेक्षितमात्रादिसेविते कुरुतस्तु ते ॥ १८ ॥ अतिस्यौल्यातिकार्थ्यादीन्, वक्ष्यन्ते ते च सौषधाः ।
योग, अतियोग, हीनयोग—अनेपेक्षित ( जितनी आवश्यकता नहीं है उतने ) सन्तर्पणकारक द्रव्यों का सेवन करने से अतिस्यूलता ( मोटापा ) आदि रोग हो जाते हैं तथा अधिक अपतर्पणकारक द्रव्यों या विधियों का सेवन करने से अत्यन्त कुशता आदि रोग हो जाते हैं। आगे इन रोगों का चिकित्सा सहित वर्णन किया जायेगा ॥ १८ ॥
रूपं तैरेव च जेयमतिबृंहितलङ्घिते ॥ १९ ॥
उनके लक्षण—उक्त अतिस्यूलता तथा अतिकुशता आदि लक्षणों द्वारा क्रमशः यह जान लेना चाहिए कि अतिस्यूल में अतिसन्तर्पण तथा अतिकुश में अतिअपतर्पण हो गया है ॥ १९ ॥
अतिस्यौल्यापचीमेहज्वरोदरभगन्दरात् । काससन्त्यासकृच्छ्रामकृच्छ्रादीनतिदारुणान् ॥ २० ॥
अतिस्यूलता आदि रोग—अतिसन्तर्पण ( बुंहण ) के कारण होने वाले रोगों के नाम—अतिस्यूलता ( मोटापा ), अपची, प्रमेह, ज्वर, उदररोग, भगन्दर, कास, सन्त्यास, मूत्रकृच्छ्र, आमवात, कृच्छ्र आदि अत्यन्त कष्टदायक रोग हो जाते हैं ॥ २० ॥
तत्र मेदोऽनिलस्लेष्मनाशनं सर्वमिष्यते ।
चिकित्सा-सूत्र—उक्त स्यूलता आदि रोगों में मेदोधातु, वातदोष तथा कफदोष को नष्ट करने वाले आहार-विहारों तथा औषधों का प्रयोग करना चाहिए।
कुलत्यजूर्णश्यामाकथवमुद्गमधुदकम् ॥ २१ ॥
मस्तुदण्डाहारिष्टचित्ताशोधनजागरम् । मधुना त्रिफलां लिह्यादुद्गुभीमभयां घनम् ॥ २२ ॥
रसाञ्जनस्य महतः पञ्चमूलस्य गुग्गुलोः । शिलाजतुप्रयोगश्च सप्तिमन्यरसो हितः ॥ २३ ॥
विडङ्गं नागरं क्षारः काललोहरजो मधु । यवामलकचूर्णं च योगोऽतिस्यौल्यादोषजित् ॥ २४ ॥
विशेष चिकित्सा—खान-पान—कुलथी ( गहूत या धीत ), ज्वार, सार्वी, जौ, मूंग, मधु मिला हुआ जल, दही का पानी, मठा, आसव, अरिष्ट, चित्ता करना, शोधन ( वमन-विरचन ) और रात्रि में जागना—इनका सेवन करना चाहिए।
औषध-प्रयोग—त्रिफलाचूर्ण को, गुरुच का स्वरस, केवल हीरीतकी के चूर्ण को अथवा नागरमोथा के चूर्ण को मधु के साथ मिलाकर चाटना चाहिए।
रसाञ्जन ( रसवत ) का, बिल्वादि महापञ्चमूल ( बेल, अरणी, सोनापाठा, गम्भार, पाङ्गल ) का, शुद्ध गुग्गुल का अथवा शुद्ध शिल्पजीत का सेवन अरणी की छाल के क्वाथ ( काढ़ा ) के साथ बहुत समय तक करना चाहिए।
विडंगदि योग—वायविडंग, सोठ, जौबार अथवा कोई भी क्षार, कालायस भस्म, जौ का चूर्ण और आँवला का चूर्ण—इन सबको मधु के साथ मिलाकर सेवन करने से अतिस्यूलता का विनाश होता है ॥ २१-२४ ॥
व्योषकद्रवीराशिगुविडङ्गातिविषास्थिराः । हिङ्गुसौवर्चलाजाजीयवानीधात्यचित्रकाः ॥ २५ ॥
निशे बृहत्यौ हृपुषा पाठा मूलं च केम्बुकात् । एषां चूर्णं मधु घृतं तैलं च सद्रशांशकम् ॥
सक्तुभिः षोडशगुणैर्युक्तं पीतं निहन्ति तत् । अतिस्यौल्यादिकान् सर्वान् रोगानन्यांश्च तद्विधान् ॥
हृद्दोषकामलाधित्रवशसाकासगलग्रहान् । बुद्धिमेधास्मृतिकरं सन्नस्याग्रेष्ठं दीपनम् ॥ २८ ॥
व्योषादि योग-फलश्रुति—व्योष ( सोठ, मरिच, पीपल ), कट्बी ( कुटकी ), वरा ( हरड, बहेड़ा, आँवला ), सहजन के बीज, वायविडंग, अतीस, शाल्मणी, हींग, सोचरनमक, जीरा, अजवाइन, धनियां,
द्विविधोपक्रमणीयाध्यायः १४ ]
सूत्रस्थानम्
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चीता, हल्दी, दाहहल्दी की छाल, कण्टकारी, वनभण्टा, हपुषा, पाठा और करेम् की जड़—इन सब द्रव्यों का कपडछन किया हुआ समानभाग चूर्ण १ तोला; मधु, घृत तथा तिलतैल १-१ तोला और जी का सत् १६ तोला लेकर भलीभाँति मिलाकर जल में घोलकर प्रतिदिन पीना चाहिए। इसका सेवन अतिस्थूलता आदि रोगों तथा सन्तर्पण सेवन के कारण उत्पन्न होने वाले और इस प्रकार के अन्य रोगों को नष्ट करता है। हृद्दोग, कामला, श्वेतत्र, श्वास, कास तथा गल्यह ( देखें—च.सू. १८१२ ) रोगों को नष्ट करता है। बुद्धि, मेधा तथा स्मृतिवर्धक एवं मन्द अग्नि को प्रदीप्त करता है ॥ २५-२८ ॥
अतिकार्श्य भ्रमः कासस्तुष्णाधिक्यमरोचकः। स्नेहाग्निनिद्रादृक्श्रोत्रशुक्रौजःशुक्त्वरक्षयः ॥ बस्तिहृन्मूर्ध्निजङ्घोरुत्रिकपाश्चरुजा ज्वरः। प्रलापोर्ध्वानिलग्लानिच्छर्द्विपर्वास्थिभेदनम् ॥ वर्चोमूत्रग्रहाद्याश्च जायन्तेऽतिबिलङ्कृतात्।
कुशता आदि रोग—अधिक लंघन अथवा अधिक अपतर्पण करने से अधिक कुशता, भ्रम ( चक्करों ) का आना, कास, प्यास का अधिक लगना तथा भोजन के प्रति अरुचि का होना—ये लक्षण होते हैं। स्नेह, जठराग्नि, निद्रा, दुष्टि, श्रोत्र, शुक्र, ओजस, भूख तथा स्वर का क्षय हो जाता है। बस्ति ( मूत्राशय ), हृदय, मूर्धा, जंघा, ऊरु, त्रिक ( स्फिकसन्ध्याः पृष्ठवशास्थन्योः सन्धिस्तत् त्रिक मतम् ) तथा पसलियों में पीड़ा, ज्वर, प्रलाप, ऊपर की ओर को वातदोष का प्रकोप होना, ग्लानि ( हर्षक्षय ), वमन, पर्वा ( पोरों ) तथा अस्थियों में फटने की-सी पीड़ा का होना, मल एवं मूत्र की प्रवृत्ति में रुकावट आदि विकार अधिक लंघन करने से हो जाते हैं ॥ २९-३० ॥
काश्यमेव वरं स्थौल्यात् न हि स्थूलस्य भेषजम् ॥ ३१ ॥ बृंहणं लङ्घनं वाऽलमतिमेदोऽग्निवातजित्।
स्थूलता से कुशता श्रेष्ठ—स्थूल होने से कुश होना अच्छा है, क्योंकि स्थूलता की कोई सरल चिकित्सा नहीं है। क्योंकि स्थूलता रोग में मेदोधातु, जठराग्नि एवं वातदोष अधिक बढ़ जाते हैं, इनको घटाने ( कम करने ) के लिए न बृंहण-चिकित्सा ही समर्थ है और न लंघन ही समर्थ हैं ॥ ३१ ॥
बलव्य—चरक ने स्थौल्य के सम्बन्ध में विचार करते हुए कहा है—‘स्थौल्यकाश्यं वरं काश्यं समोप-करणो हितो’। ( च.सू. २१।१७ ) अर्थात् स्थूल पुरुष की सद्यःफलदायक कोई चिकित्सा नहीं है। देखें—यदि जठराग्नि और बढ़े हुए वातदोष की शान्ति के लिए हम सन्तर्पण द्रव्यों का प्रयोग करते हैं, तो इससे मेदोधातु अधिक बढ़ जायेगा। यदि हम अपतर्पण-चिकित्सा करते हैं तो यह मेदस्वी पुरुष उसे सहन नहीं कर सकता, अतएव कहा गया है—‘स्थूल होने की अपेक्षा कुश होना ही अच्छा है’। कुश रोगी को यथास्थिति में लाना सरल है, स्थूल को अपेक्षाकृत कुश करना कठिन होता है। यह अपने लिए तथा दूसरों के लिए बोझ होने के साथ-ही-साथ भूषार भी होता है। इसलिए चरक ने इसकी गणना ‘अष्टौ निन्दितौयाध्यायं’ में की है। तथापि इनकी चिकित्सा का वर्णन इसी के आगे किया जा रहा है।
मधुरस्निग्धसौहित्यैर्यत्सीस्थेन च नश्यति ॥ ३२ ॥ क्रशिमा स्थविमाऽत्यन्तविपरीतनिषेवर्णः।
कुशता-चिकित्सा—मधुर तथा घी-तेल से बने हुए आहारों को सदा भरपेट खाते रहने से तथा सुखमय जीवन बिताने से कुशता दूर हो जाती है।
स्थूलता-चिकित्सा—स्थूलता जिन कारणों से उत्पन्न हुई है, उनके सर्वथा विपरीत आहार-विहारों का चिरकाल तक सेवन करने से दूर की जा सकती है। इसी को आयुर्वेदशास्त्र ने ‘निदान-परिजन’ चिकित्सा भी कहा है ॥ ३२ ॥
योजयेद्वृंहणं तत्र सर्वं पानात्रभेषजम् ॥ ३३ ॥
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अष्टाङ्गहृदये
कृशता-चिकित्सा—इसमें पान ( पेय—दूध आदि ), अन्न ( आहार—स्निग्ध पदार्थ, खीर अथवा मांस आदि ) तथा भेषज ( असगन्ध आदि ) बृंहण पदार्थों का नियमित सेवन करे ॥ ३३ ॥
अचिन्तया हर्षणेन ध्रुवं सन्तर्पणेन च । स्वप्नप्रसङ्गान्नच कृशो वराह इव पुष्यति ॥ ३४ ॥
चिन्ता ( सोच-फिकर ) न करने से, प्रसन्न रहने से, सन्तर्पण पदार्थों का निरन्तर सेवन करते रहने से और अधिक सोने से कृश मनुष्य सूअर की भाँति मोटा हो जाता है ॥ ३४ ॥
न हि मांससमं किञ्चिदव्यदेहबृहत्त्वकृतं । मांसादमांसं मांसेन सम्भूतत्वाद्दिशेषतः ॥ ३५ ॥
मांस की महत्ता—बृंहण ( सन्तर्पण ) कारक द्रव्यों में मांस के समान ऐसा कोई द्रव्य नहीं है, जो शरीर को शीघ्र मोटा कर सके। उसमें भी कच्चा मांस को खाने वाले प्राणियों का अपना मांस भी मांस को खाने के कारण ही मोटा होता है, अतः इस प्रकार के प्राणियों का मांस और भी अधिक मांसवर्धक होता है ॥ ३५ ॥
गुरु चातर्पणं स्थूले विपरीतं हितं कृशे । यवगोधूममुभयोस्तद्योग्याहितकल्पनम् ॥ ३६ ॥
स्थूलता एवं कृशता की चिकित्सा—स्थूलता में गुरु ( देर में पचने वाले ) पदार्थों का आधा पेट भोजन करना हितकारक होता है और कृशता में लघु पदार्थों का सन्तर्पण ( भरपेट खाना ) लाभकर होता है। जो तथा गेहूँ के विविध पदार्थों की स्थूल एवं कृश के योग्य कल्पना करके दिये गये आहार दोनों के लिए लाभदायक होते हैं ॥ ३६ ॥
वक्तव्य—यद्यपि चाणक्य ने कहा है कि—‘मांसान्मांसं प्रवर्धते’। यह सत्य है, परन्तु निरामिषभोजी समाज भी स्वस्थ, हृष्ट-पुष्ट देखा जाता है और निरामिषभोजी आमिषभोजियों की अपेक्षा आध्यात्मिक दृष्टि से अधिक सुखी जीवन बिताते हैं।
भगवान् पुनर्वसु ने जो लंघन तथा बृंहण की परिभाषा दी है, वह अत्यन्त निष्प्रान्त है। देखें—‘यत् किञ्चिल्लाघवकरं देहे तल्लङ्घनं स्मृतम्। बृहत्वं यच्छरीरस्य जनयेत् तच्च लङ्घनम्’ ॥ ( व.सू. २२।१ ) अर्थात् जो आहार-विहार तथा औषधोपचार शरीर में हलकापन उत्पन्न करता है, उसे लंघन कहते हैं और जो गुरुता ( भारीपन ) पैदा करता है, उसे ‘बृंहण’ कहते हैं।
दोषगत्याऽतिरिच्यन्ते ग्राहिभेद्यादिभेदतः । उपक्रमं न ते द्वित्वाद्भिन्ना अपि गदा इव ॥ ३७ ॥
इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां प्रथमे सूत्रस्थाने द्विविधोपक्रमणीयं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
यद्यपि दोषों की गतिभेद के अनुसार ग्राही एवं भेदी आदि भेदों से चिकित्सा के भी अनेक भेद होते हैं और तदनुसार उनकी व्यवस्था भी की जाती है; फिर भी वे सभी चिकित्सा सम्बन्धी भेद सन्तर्पण एवं अपतर्पण के भीतर उसी प्रकार आ जाते हैं जैसे रोगों के अनेक भेद होने पर भी वे साम तथा निराम भेद से दो प्रकार के ही होते हैं ॥ ३७ ॥
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में द्विविधोपक्रमणीय नामक चौदहवाँ अध्याय समाप्त ॥ १४ ॥
पञ्चदशोऽध्यायः
अथातः शोधनादिगणसङ्ग्रहमध्यायं व्याख्यास्यामः ।
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।
अब हम यहाँ से शोधनादिगणसंग्रह नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। जैसा कि आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।
उपक्रम—द्विविधोपक्रमणीय नामक अध्याय का वर्णन करने के बाद अब यहाँ से शोधनादिगणसंग्रह नामक अध्याय का आरम्भ किया जा रहा है। इसके पूर्व अध्याय में अनेक प्रकार की चिकित्सा-विधियों का वर्णन सूत्र रूप में किया गया था। अब इस प्रकरण में शोधन आदि कर्म के उपयोगी औषधगणों के संग्रह की चर्चा की जायेगी।
संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—ज.सू. ४; सु.सू. ३७, ३८, ३९ एवं अ.सं.सू. १४, १५, १६ में देखें।
मदनमधुकलम्बानिम्बविम्बोविशालात्रपुसकुटजमूवदिवदालीकुमिन्म ।
विदुलदहनचित्राः कोशवत्यौ करजः कणलवणवचैलासर्पपाञ्चर्दनानि ॥ १ ॥
वमनकारक द्रव्य—मैनफल, मुलेठी, लम्बा ( कटुमुम्बी ), निम्ब ( नीम ), विम्बो ( कड़वी तुण्डिकेरी ), इन्द्रायण, त्रपुस ( काली निशोध, अन्यत्र खीरा ), कुटज, मूर्वा, देवदाली ( बन्दालडोडा ), वायविडंग, जलवैतस, चित्रक, कडुआ परबल, कोशातकी, राजकोशातकी, करज, पिपली, लवण, बालवच, इलायची तथा सफेद ( पीली ) सरसों ॥ १ ॥
वक्तव्य—ऊपर निर्दिष्ट औषधद्रव्यों को वमनकारक कहा गया है, किन्तु इनमें कतिपय द्रव्य ऐसे हैं, जिनके स्वतन्त्र गुण वामक नहीं हैं। जैसे—मधुक ( मुलेठी ), एला ( इलायची ) तथा त्रपुस का अर्थ जिन्होंने 'खीरा' किया है, वह भी। इसके बाद एक प्रकाश की किरण दिखलायी पड़ी, वह है—सुश्रुत की अमुतोपम वाणी—'समस्तं वर्गमर्धं वा यथालभमथापि वा। प्रपुञ्जीत भिषक् प्राज्ञो यथोद्दिष्टेषु कर्मसु' ॥ ( सु.सू. ३७।३४ ) अर्थ स्पष्ट है। इस गण में कहे गये द्रव्यों के स्वतन्त्र गुणों के विवेचन की आवश्यकता नहीं पड़ती, अपितु इनका प्रयोग मिलाकर किया जाता है, क्योंकि यह सुश्रुत का सिद्धान्त-वाक्य मिश्रक वर्ग का है। मदनद्रव्य वमनकारक द्रव्यों में अग्रणी है, अतएव इस गण में उसकी सर्वप्रथम गणना की गयी है।
निकुम्भकुम्भत्रिफलागवाक्षीस्तुक्शङ्खिनीनोलितितिल्कानि ।
शम्याककम्पिलकहेमदुधा दुग्धं च मूत्रं च विरेचनानि ॥ २ ॥
विरेचनकारक द्रव्य—दन्ती ( जमालगोटा ) की जड़, निसोत की जड़, त्रिफला, इन्द्रायण की जड़, थूहर का दूध, शंखिनी, नील के बीज, तिल्क ( लोघ की छाल ), अमलतास की गुद्दी, कबीला, स्वर्णक्षीरी, दूध तथा मूत्र ( गोमूत्र ) आदि द्रव्य विरेचक होते हैं ॥ २ ॥
वक्तव्य—'तिल्कस्यककाम्पिल्यकपाटलीत्वकः' । ( अ.सं.सू. १४३ ) उक्त विषय को अ.हू.सू. १५।२ में देखें। बुद्धवाग्भट ने कबीला की त्वचा का प्रयोग विरेचनार्थ लेने का निर्देश दिया है, उस विषय का संशोधन हृदय में किया गया है। इसका ग्राह्य अंग सामान्य रूप से फलरज है। इसकी त्वचा का प्रयोग कुष्ठ में किया जाता है। परिचय—'इष्टिकाचूर्णसङ्काशः चन्द्रिकाढ्योऽल्परेचनः । सौराष्ट्रदेशे वृक्षस्य फलरेचुः कपिलकः' ॥ देखें—शिवदत्त-निघण्टु। इतना होने पर भी बुद्धवाग्भट का निर्देश परीक्षणीय है।