अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
युष्म्यादनन्तमन्त्रादौ मध्येऽन्ते कवलान्तरे । ग्रासे ग्रासे मुहुः सात्सं सामुद्रं निशि बीचधम् ॥ ३७ ॥
औषध-सेवन के १० काल—औषध का प्रयोग निम्नलिखित समयों में करें—१. अनन्त, इसमें केवल औषध का सेवन करें; जैसे—लंघन काल में। २. अन्न खाने से पहले अर्थात् औषध खाने के बाद भोजन करना। ३. अन्न (आहार) के बीच में, जैसे—भोजन के बीच-बीच में जल पिया जाता है। ४. अन्न के अन्त में। ५. कवल (कौर-ग्रास) के बीच में; यह दो प्रकार से होता है—१. कौर के बीच में डालकर अथवा २. दो कौरों के बीच में; जैसे—पहला कौर खाया फिर औषध, फिर दूसरा कौर। ६. प्रत्येक ग्रास के साथ। ७. मुहुः—द्वितीय में अनेक बार। ८. सात्सं—अन्न के साथ मिलाकर। ९. सामुद्र्यं—अन्न से सम्पुटित करके। १०. निशि—सोते समय ॥ ३७ ॥
वक्तव्य —सुश्रुत ने औषध-सेवन के दस कालों का वर्णन इस प्रकार किया है—‘अत ऊर्ध्वं दशौषध-कालान् वक्ष्यामः। तत्राभवन्तं प्राग्भवन्तमधोभक्तं मध्येभक्तमन्तराभक्तं सभक्तं सामुद्र्यं मुहुर्मूर्हृत्प्रियासान्तरं चेति दशौषधकालाः’ ॥ (मु.उ. ६४।६५) इसकी व्याख्या इसी क्रम में ८३ तक सुश्रुत में ही देखें। आचार्य शाङ्कधर ने औषध-सेवन के पाँच कालों का ही उल्लेख किया है। आचार्यों के अपने-अपने दृष्टिकोण हैं। देखें—शा.सं.पू.ख. २।२ से १२ तक और च.चि. ३०।२९७ से ३०३ तक।
कफोद्रेके गदेऽनन्तं बलिनो रोगरोगिणोः। अन्नादौ विगुणेषपाने, समाने मध्य इष्यते ॥ ३८ ॥
व्यानोऽन्ते प्रातराशयस्य, सायमाशयस्य तूत्तरे। ग्रासग्रासान्तयोः प्राणे प्रदुष्टे मातरिश्चभि ॥ ३९ ॥
मुहुर्मूर्हृत्विषच्छर्दिहिम्वातृष्ट्यासकासिषु। योज्यं सभोज्यं श्वेषज्यं भोज्यैश्चित्रैररोचके ॥ ४० ॥
कम्पाक्षेपकहिम्वासु सामुद्रं लघुभोजिनान्म्। ऊर्ध्वजत्रुविकारेषु स्वप्नकाले प्रशस्यते ॥ ४१ ॥
इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां
प्रथमे सूत्रस्थाने दोषोपक्रमणीयो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
रोगानुसार औषध-सेवनकाल —यहाँ रोगानुसार उक्त दस औषध-सेवनकालों का प्रयोग निर्देश किया जा रहा है—(१) अनन्त औषध का प्रयोग कफदोष का प्रकोप होने पर, बलवान् रोग में तथा बलवान् रोगी में किया जाता है। (२) अन्न के आदि में अपानवायु की गति विलोम होने पर औषध दी जाती है। (३) भोजन के मध्य में औषध का प्रयोग समानवायु की विकृति में किया जाता है। (४) भोजन के अन्त में औषध का प्रयोग दिन के भोजन के अन्त में व्यानवायु के विकृत होने पर और रात्रि के भोजन के अन्त में उदानवायु के विकृत होने पर किया जाता है। (५) ग्रास के अन्त में सेवन की गयी औषधि प्राणवायु की विकृति में दी जाती है। (६) ग्रास में मिलाकर दी गयी औषधि भी प्राणवायु की विकृति में लाभप्रद होती है। (७) बार-बार औषध-प्रयोग विषविकार, वमन, हिचकी, तृष्णा (प्यास का अधिक लगना), श्वास तथा कास रोगों में लाभप्रद होता है। (८) सभोज्यं (भोजन-पदार्थों में मिलाकर) किया गया औषध-प्रयोग अरोचक रोग में करना चाहिए, वे भोजन विविध प्रकार के तथा हर्षिकारक हों। (९) सामुद्र्य औषध-प्रयोग कम्परोग, आक्षेपक और हिम्वा (हिचकी) में करना चाहिए। इन रोगियों को लघु भोजन करने वाला होना चाहिए। (१०) निशि (सोते समय) में किया गया औषध-प्रयोग जत्रुअस्थि (Collar bone) के ऊपरी भाग में होने वाले कान, नाक आदि के रोगों में लाभप्रद होता है ॥ ३८-४१ ॥
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित
निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-मूत्रस्थान में
दोषोपक्रमणीय नामक तेरहवाँ अध्याय समाप्त ॥ १३ ॥