अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्दशोऽध्यायः
अथातो द्विविधोपक्रमणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ।
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ॥
अब यहाँ से हम द्विविध उपक्रमणीय नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। जैसा कि आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।
उपक्रम—दोषोपक्रमणीय अध्याय के बाद द्विविधोपक्रमणीय अध्याय का वर्णन करने में दोनों के बीच सामान्य तथा विशेष का सम्बन्ध है। पहले वाले अध्याय में सर्वसामान्य चिकित्सा का वर्णन किया गया था, अब इसमें दो प्रकार की चिकित्साओं का विशेष वर्णन किया जा रहा है।
संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—च.सू.२१, २२, २३; सु.सू. १५, सु.चि. १।११ से १३; सु.उ. ३९ श्लोक १०२-१०५; अ.सं.सू. २४ में देखें।
उपक्रमस्य हि द्वित्वाद्विधैवोपक्रमो मतः।
चिकित्सा के दो भेद—उपक्रम्य ( रोग ) दो प्रकार का होता है—१. साम और २. निराम। अतएव इन दोनों की चिकित्सा भी विधिभेद से दो प्रकार की होती है।
एकः सन्तर्पणस्तत्त्वं द्वितीयश्चापतर्पणः ॥ १ ॥
बृंहणो लङ्घनश्चेति तत्पर्यायावुदाहृतौ। बृंहणं यद्वहत्त्वाय लङ्घनं लाघवाय यत् ॥ २ ॥ देहस्य—
सन्तर्पण तथा अपतर्पण—उन दो चिकित्साओं का नाम है—१. सन्तर्पण और २. अपतर्पण। इन्हीं के पर्याय हैं—१. बृंहण और २. लंघन ( उपवास करना )। बृंहण-चिकित्सा उसे कहते हैं जिससे शरीर हृष्ट एवं पुष्ट हो जाय और लंघन उसे कहते हैं जिससे शरीर हल्का हो जाय ॥ १-२ ॥
—भवतः प्रायो भौमापमितरच्च ते।
तत्त्वों की प्रधानता—बृंहण-चिकित्सा में पृथिवी तत्त्व तथा जल तत्त्व की प्रधानता होती है और लंघन-चिकित्सा में शेष तीन तत्त्वों ( अग्नि, वायु एवं आकाश तत्त्व ) की प्रधानता होती है।
स्नेहंन रूक्षणं कर्म स्वेदनं स्तम्भनं च यत् ॥ ३ ॥
भूतानां तदपि द्वैध्याद्वितयं नातिवर्तते।
स्नेहन आदि का वर्णन—स्नेहन, रूक्षण, स्वेदन तथा स्तम्भन ये चारों कर्म भी सन्तर्पण तथा अपतर्पण भेद से दो प्रकार के होते हैं। क्योंकि पृथिवी आदि पाँच महाभूत भी सन्तर्पण तथा अपतर्पण भेद से दो प्रकार के होते हैं ॥ ३ ॥
शोधनं शमनं चेति द्विधा तत्रापि लङ्घनम् ॥ ४ ॥
प्रत्येक के दो भेद—सन्तर्पण का पर्याय बृंहण है और अपतर्पण का पर्याय लंघन है। यह लंघन भी शोधन एवं शमन भेद से दो प्रकार का कहा गया है ॥ ४ ॥
यदीरयेद्वहिर्दोषान् पञ्चधा शोधनं च तत्। निरुहो वमनं कायशिरोरेकोऽन्नविस्मृतिः ॥ ५ ॥