भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

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दोषोपक्रमणीयाध्यायः १३ ]

सूत्रस्थानम्

१८९

हन्त्याशु युक्ते वक्त्रेण द्रव्यमाभाशयान्मलां ॥ ३० ॥ प्राणेन चोर्ध्वजन्मृतान् पक्वाधानादुदेन च ।

आसन्न दोष का निर्हरण—इस स्थिति में प्रयोग किया गया शोधनकारक औषधद्रव्य आभाशय में स्थित दोषों ( मलों ) को वमन विधि से मुख द्वारा निकाल देता है। नासिका के छिद्रों द्वारा जन्म के ऊपरी भाग में स्थित विकारों को निकाल देता है। पक्वाशयगत मलों को शोधन औषध गुदमार्ग से निकाल देता है ॥ ३० ॥

बक्तव्य—तात्पर्य यह है कि मुख द्वारा प्रयुक्त औषधद्रव्य वमन द्वारा, नासिका द्वारा प्रयुक्त रेचकनस्य नासिका के छिद्रों द्वारा दोष-निर्हरण करता है और निरुत्पन्नवस्ति द्वारा दिये गये औषधद्रव्य पक्वाशयस्थित दोषों को गुदमार्ग से निकाल देते हैं। यही तात्पर्य 'यथासन्न' शब्द का है।

उत्किल्लष्टानध ऊर्ध्वं वा न चामान् वहतः स्वयम् ॥ ३१ ॥ धारयेदौषधैर्दोषान् विधृतास्ते हि रोगवाः ।

दोषनिर्हरण-निर्देश—बाहर निकलने के लिए ऊपर तथा नीचे से प्रवृत्त अथवा गुदमार्ग से स्वयमेव बहते हुए आमदोषों को स्तम्भन औषधों का प्रयोग करके न रोकें, क्योंकि रोके गये वे आमदोष अनेक प्रकार के रोगों को उत्पन्न कर देते हैं ॥ ३१ ॥

प्रवृत्तान् प्रागतं दोषानुपेक्षेत हित्ताशिनः ॥ ३२ ॥ विबद्धान् पाचनेस्तैस्तैः पाचयेन्निरहरेत वा ।

दोषनिर्हरण-विवेक—अतएव हित भोजन करने वाले रोगी के स्वयं प्रवृत्त हुए दोषों की पहले उपेक्षा करें अर्थात् उन्हें प्रवृत्त होने ( निकल जाने ) दें और जो आमदोष शरीर में रके हुए हों, उन्हें उचित पाचनकारक औषधद्रव्यों से पचायें अथवा उनको निकालने का प्रयत्न न करें। उक्त ३१ तथा ३२वें पद्य में प्रयुक्त 'दोष' शब्द का अर्थ—मल है ॥ ३२ ॥

श्रावणे कार्तिके चैत्रे मासि साधारणे क्रमात् ॥ ३३ ॥ ग्रीष्मवर्षाहिमचितान् वाय्वादीनाशु निरहरेत् ।

शोधन का काल—श्रावण, कार्तिक, चैत्र ये मास साधारण ( सम-शीतोष्ण ) होते हैं, अतएव इन मासों में व्रम से ग्रीष्म, वर्षा, हिम ( हेमन्त ) ऋतु में संचित वात, पित्त तथा कफ दोषों को शीघ्र शोधन द्रव्यों के प्रयोगों से निकाल डालें ॥ ३३ ॥

अत्युष्णवर्षशीता हि ग्रीष्मवर्षाहिमागमाः ॥ ३४ ॥ सन्धौ साधारणे तेषां दुष्टान् दोषान् विशोधयेत् ।

सहेतुक शोधन काल—उक्त कालों में शोधन कराने का कारण-निर्देश—ग्रीष्मकाल में गर्मी अधिक होती है, वर्षाकाल में वर्षा अधिक होती है और हेमन्त ऋतु में शीत अधिक पड़ता है, अतः ऋतुसन्धि में तथा उक्त साधारण काल में ग्रीष्म, वर्षा, हेमन्त ऋतुओं में दूषित हुए दोषों का शोधन करना चाहिए ॥ ३४ ॥

स्वस्थवृत्तमभिप्रेत्य, व्याधी व्याधिवशेन तु ॥ ३५ ॥

शोधन का दृष्टिकोण—उक्त दोषशोधन का निर्देश सामान्य रूप से स्वस्थ पुरुष के लिए कहा गया है, क्योंकि समय पर संचित दोषों का निर्हरण हो जाने से उसका स्वास्थ्य बना रहेगा। रुग्णावस्था में तो रोग की स्थिति के अनुसार दोषों का निर्हरण करना पड़ता है ॥ ३५ ॥

कृत्वा शीतोष्णवृष्टीनां प्रतीकारं यथायथम् । प्रयोजयेत्क्रियां प्राप्तां क्रियाकालं न हापयेत् ॥ ३६ ॥

शोधन की विशिष्ट विधि—रुग्णावस्था में शीत, उष्ण, वर्षा के कारण होने वाली बाधाओं का प्रतीकार करके यथोचित विधि से वमन-विरचन ( संशोधनों ) का प्रयोग कराना ही चाहिए। इसमें क्रियाकाल को हाथ से न जाने दें ॥ ३६ ॥

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