भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

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अष्टाङ्गहृदये

शमयेत्तान् प्रयोगेण सुखं वा कोष्ठमानयेत् ॥ २२ ॥

ज्ञात्वा कोष्ठप्रपन्नाश्च यथासन्नं विनिर्हरेत्।

चिकित्सा-विधि —तिर्यगत दोषों के लंघन या पाचन आदि विधियों से अथवा स्नेहन तथा स्वेदन विधियों से सरलता से उन दोषों को कोष्ठ की ओर ले आये और जब वे दोष कोष्ठ में आ जाते हैं, तो उन्हें विरेचन विधि से बाहर निकालने का प्रयास करे ॥ २२ ॥

स्रोतोरोधबलघ्रंशगौरवानिलमुद्भताः ॥ २३ ॥

आलस्यापत्तिनिष्ठीवमलसङ्काहचिकलमाः । लिङ्गं मलानां सामानां, निरामाणां विपर्ययः ॥

साम-निराम दोषों के लक्षण —स्रोतों में ह्कावट, शारीरिक बल का क्षीण होना, शरीर में भारीपन, वातदोष का प्रतिलोम होना, आलस्य (शक्ति रहने पर भी काम करने की इच्छा का न होना), भोजन का न पचना, बार-बार थूक का आना, पुरीष आदि मलों के निकलने में ह्कावट, अरुचि और वलम (मुस्ती) —ये लक्षण आमदोषयुक्त वात आदि दोषों के होते हैं और इनके विपरीत लक्षण निरामदोषों के होते हैं ॥ २३-२४ ॥

ऊष्णोऽल्पबलत्वेन धातुमाद्यमपाचितम्। दुष्टामाशयगतं रसमामं प्रचक्षते ॥ २५ ॥

आम का वर्णन —ऊष्मा (अग्नि) का बल घट जाने से जिस रसधातु का भलीभाँति पाक नहीं हो पाता और जो आमाशय में वात आदि दोषों से दूषित हो जाता है, उस रस को 'आम' कहते हैं ॥ २५ ॥

वक्तव्य —इस विषय को विस्तृत रूप से समझने के लिए सुश्रुत-उत्तरतन्त्र अध्याय ५६ का सम्पूर्ण अवलोकन करें।

अन्ये दोषेभ्य एवाति दुष्टेभ्योऽन्योऽन्यमूर्च्छनात्। कोद्रवेभ्यो विषस्येव वदन्त्यामस्य सम्भवम् ॥

आम-सम्बन्धी मतान्तर —कुछ आचार्यों का मत है कि अत्यन्त दुष्ट वात आदि दोषों का आपस में मिश्रण होने से उस प्रकार 'आम' की उत्पत्ति हो जाती है, जैसे कोद्रों नामक धान्य में से विष की ॥ २६ ॥

आमेन तेन सम्युक्ता दोषा दूष्याश्च दूषिताः । सामा इत्युपदिश्यन्ते ये च रोगास्तदुद्भवाः ॥ २७ ॥

सामदोष एवं सामरोग —उक्त 'आम' से युक्त वात आदि दोष एवं रस आदि सातों धातु दूषित होने पर 'साम' अर्थात् आमदोषयुक्त कहे जाते हैं। उन दोषों तथा दूष्यों के सम्पर्क से उत्पन्न होने वाले ज्वर आदि रोग भी 'साम' कहे जाते हैं। यथा—आमज्वर, आमातिसार आदि ॥ २७ ॥

सर्वदेहप्रविसृतान् सामान् दोषान् न निर्हरेत्। लीनान् धातुष्वनुकिल्लिष्टान् फलादामाद्व्रसानिव ॥

आश्रयस्य हि नाशाय ते स्युर्दुर्निर्हरत्वतः ।

सामदोषों की चिकित्सा —सम्पूर्ण शरीर में फैले हुए सामदोषों को निकालने का प्रयत्न न करें, क्योंकि वे दोष रस आदि धातुओं में विलीन (मिले-जुले) रहते हैं और बाहर निकलने के लिए उन्मुख नहीं होते, ऐसी स्थिति में उन्हें न निकाले और वे दोष भी उस प्रकार नहीं निकल पाते, जैसे कच्चे फूल में से रस नहीं निकलता। ऐसी स्थिति में यदि उन दोषों को निकालने का प्रयास किया जायेगा तो वे आश्रय (उस-उस शरीरावयव) के ही विनाशक हो सकते हैं ॥ २८ ॥

पाचनैर्दीपनैः स्नेहेस्तात् स्वेदैश्च परिष्कृतान् ॥ २९ ॥

शोधयेच्छोधनैः काले यथासन्नं यथाबलम्।

दोषनिर्हरण-विधि —अतः उन आमदोषों को निकालने के लिए उन्हें पाचन, दीपन, स्नेहन एवं स्वेदन प्रयोगों के द्वारा परिष्कृत (शोधन योग्य) करके शोधन योग्य काल (ऋतु) में यथासन्न (जिस ओर से आकर दोष हके हों) और यथाबल (रोग तथा रोगी की शक्ति के अनुसार) शोधनविधियों से उनका शोधन करें ॥ २९ ॥