भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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दोषोपक्रमणीयाध्यायः १३ ]

सूत्रस्थानम्

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शुद्ध प्रयोग का परिचय—जो औषध-प्रयोग (चिकित्सा) एक रोग अथवा एक दोष को शान्त करता है और दूसरे रोग या दोष को उन्माड देता है, वह प्रयोग विशुद्ध (उत्तम) नहीं कहा जा सकता है। शुद्ध प्रयोग तो वह है जो एक रोग या दोष को शान्त तो कर दे, किन्तु दूसरे रोग को न उन्माडे ॥ १६ ॥

बक्तव्य—इस दृष्टि से प्रचलित चिकित्सा-पद्धतियों की ओर देखिये, क्या इतना उदार सिद्धान्त किसी अन्य पद्धति का है? आयुर्वेद के अतिरिक्त अन्य पद्धतियों तो रोग के तात्कालिक लाभ तक ही मात्र अपना कर्तव्य समझती हैं, अस्तु।

व्यायामादूषणस्तैक्षण्यादहिताचरणादपि। कोष्ठाच्छाखास्थिमर्माणि द्रुतत्वान्मास्तस्य च ॥ दोषा यान्ति—

दोषों का स्थानान्तर गमन—व्यायाम अथवा शारीरिक श्रम करने से, जठराग्नि की तीक्ष्णता से, अहित-कर आहार-विहार करने से तथा वातदोष के शीघ्रगामी होने से उक्त वात आदि दोष कोष्ठ (नामक आभ्यन्तर रोगमार्ग में) से शाखा (नामक बाह्य रोगमार्ग) में अथवा अस्थि (मध्यम रोगमार्ग) में पहुँच जाते हैं ॥ १७ ॥

—तथा तैश्चः स्रोतोमुखविशोधनात्। वृद्ध्याऽभिष्यन्दान्त्याकात्कोष्ठं बायोश्च निग्रहात् ॥ १८ ॥

दोषों का कोष्ठगमन—और स्रोतों के मुखों की शुद्धि हो जाने से, उनकी वृद्धि होने से, अभिष्यन्द होने से, पाक होने से अथवा वातदोष के निग्रह (अवरोध) से बाह्य तथा मध्यम रोगमार्ग से कोष्ठ की परिधि में दोष पहुँच जाते हैं ॥ १८ ॥

तत्रस्थाश्च विलम्बेन् भूयो हेतुप्रतीक्षिणः।

पुनः रोगोत्पादन—जब तक दोष कोष्ठप्रदेश में रहते हैं कोई रोग-विशेष को उत्पन्न नहीं करते, किन्तु वे पुनः विकारोत्पादक हेतुओं (निदानों) की प्रतीक्षा करते रहते हैं। अपने अनुरूप कारणों को पाकर वे रोगोत्पत्ति कर देते हैं।

ते कालादिबलं लब्ध्वा कुष्यन्त्याश्रयेष्वपि ॥ १९ ॥

अन्य स्थानों में दोषप्रकोप—वे वात आदि दोष काल, देश, अपथ्य आहार-विहार द्वारा बल (शक्ति) पाकर अतएव प्रबल होकर दूसरे-दूसरे दोषों के आशयों में जाकर भी कुपित होकर रोगों को उत्पन्न कर देते हैं ॥ १९ ॥

तत्रान्यस्थानसंस्थेषु तदीयामबलेषु तु। कुर्याच्चिकित्साम्—

चिकित्सा-निर्देश—इस स्थिति में यदि दूसरे दोष के आशय में स्थित दोष यदि दुर्बल हो तो उस स्थान में स्थित दोष सम्बन्धी चिकित्सा करनी चाहिए। यदि दोष बलवान् हो तो पहले उसी दोष की चिकित्सा करनी चाहिए।

—स्वामेव बलेनान्याभिभाषिषु ॥ २० ॥

आगन्तु शमयेद्वोषं स्थानिनं प्रतिकृत्य वा।

यदि वह दोष अपनी शक्ति से निर्दिष्ट स्थान (आशय) वाले दोष को दबाकर स्थित हो तो उस (बलवान्) दोष की चिकित्सा करे। अथवा स्थानीय मूल दोष की चिकित्सा करके तब आगन्तुज (दूसरे स्थान से आये हुए) दोष की चिकित्सा करनी चाहिए ॥ २० ॥

प्रायस्तिर्यगता दोषाः क्लेशयन्त्यातुरांश्चिरम् ॥ २१ ॥

कुर्यान्न तेषु त्वरया देहाग्निबलवित् क्रियाम्।

तिर्यगता दोष-चिकित्सा—प्रायः तिर्यक् (तिरछे अर्थात् मध्यम रोग) मार्गों में गये हुए दोष चिरकाल तक रोगियों को कष्ट देते रहते हैं, अतः शरीरबल एवं अग्निबल को जानने वाला चिकित्सक शीघ्रता से इनकी चिकित्सा न करे अर्थात् धीरे-धीरे इनकी चिकित्सा करे ॥ २१ ॥