अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
(ऐसा मित्र जो मनचाहा सुख दे सके), मधुर तथा तोतली बोली बोलने वाला पुत्र, मन के अनुरूप व्यवहार करने वाली, प्रिय, सुशील तथा सुशोभित स्त्रियाँ, शीतल जल की धाराओं वाले फुहारों से युक्त घर, बगीचे, बावड़ियाँ, सुन्दर घाट वाले, विस्तृत, साफ-सुथरे जल वाले जलाशय के समीप बालू से बने हुए ऊँचे स्थान पर बैठना, खिले हुए कमलों से युक्त तालाब के तट पर जहाँ घास-फूस का घर बनाया गया हो और जो चारों ओर हरे-भरे पेड़ों से घिरा हुआ हो ऐसे स्थानों पर निवास करना, सभी मन को प्रसन्न करने वाले भावों (रहन-सहन की व्यवस्था) से युक्त स्थान पर विहार करना; विशेष करके दूध तथा ची का सेवन करना और विरेचन करना—ये पित्तदोष की चिकित्सा है ॥ ४-१ ॥
वक्तव्य —अयन्त्रणसुखं मित्रम्—मित्र का पास में रहना सुखद होता है और उसकी बात को मानना यन्त्रणा जैसा कष्ट नहीं देती। कायमानम्—अन्यत्र इसका अर्थ है—शरीर के बराबर और यहाँ 'तृणादिरचिता-गारम्'। प्रदोषः—यह समय चन्द्रमा के न रहने पर भी सुखद एवं शीतल होता है।
॥लेख्मणो विधिना युक्तं तीक्ष्णं वमनरेचनम्। अत्रं हृक्षालपतीक्ष्णोष्णं कटुतिक्तकपायकम् ॥ १० ॥
दीर्घकालस्थितं मद्यं रतिप्रोतिः प्रजागरः। अनेकरूपो व्यायामश्चिन्ता रूक्षं विमर्दनम् ॥ ११ ॥
विशेषाद्भ्रमनं यूषः शोर्डं मेदोन्मसोपधम्। धूमोपवासगण्डूषा निःसुखत्वं सुखाय च ॥ १२ ॥
कफदोष-चिकित्सा —इसमें विधिपूर्वक तीक्ष्ण वमन तथा विरेचन का प्रयोग करें। आहार—रूक्ष, मात्रा में थोड़ा, तीक्ष्ण (मरिच आदि द्रव्य), उष्णवीर्य वाले पदार्थ; कटु, तिक्त, कपाय रस से युक्त पदार्थों का सेवन करें; पुराना मद्य, स्त्री-सहवास में प्रीति, रात में अधिक जागना, विविध प्रकार का व्यायाम (परिश्रम वाले कार्य), चिन्तन (फिकर) करना, रूक्ष पदार्थों (सोठ आदि) को शरीर पर मलना, विशेष करके इसमें वमन कराना, दालों का यूष (रस), मधु, मेदोनाशक चिकित्सा, धूमपान, उपवास, गण्डूष धारण करना तथा सुखसाधनों का त्याग करना—ये सब सुखद होते हैं ॥ १०-१२ ॥
वक्तव्य —महर्षि वाग्भट के उक्त विवेचन का मूल आधार च.सू. २०।१२ से १९ तक है, इन्हें देखें। विशेष रूप से वातज विकारों में बस्तिप्रयोग, पित्तज विकारों में विरेचन और कफज विकारों में वमन-प्रयोग चिकित्सा के मूल आधार हैं। 'उपक्रम' का अर्थ है—चिकित्सा। देखें—मैदनी-कोष।
उपक्रमः पुण्यदोषान् योऽयमुद्दिश्य कीर्तितः। संसर्गसन्निपातेषु तं यथास्वं विकल्पयेत् ॥ १३ ॥
विषयोपसंहार —यहाँ जो यह वात आदि दोषों की चिकित्सा का निर्देश किया गया है, इसे संसर्गज (ब्रह्मज) रोगों तथा सन्निपातज रोगों में दोषानुसार देखकर प्रयोग करना चाहिए ॥ १३ ॥
ग्रीष्मः प्रायो महत्पित्ते वासन्तः कफमाष्टते। महतो योगवाहिल्वातु, कफपित्ते तु शारदः ॥ १४ ॥
चिकित्सा-निर्देश —वातज एवं पित्तज रोगों में प्रायः ग्रीष्म-ऋतुचर्या में कहे गये आहार-विहारों का सेवन, कफज तथा वातज रोगों में वसन्त-ऋतुचर्या का सेवन करें। क्योंकि वात या वायु योगवाही होता है अर्थात् वह उष्णकाल में उष्ण और शीतकाल में शीत हो जाता है। कफज और पित्तज रोगों में शरद-ऋतुचर्या में कहे गये पदार्थों का सेवन करें ॥ १४ ॥
चय एव जयेदोषं कुपितं त्वविरोधयन्। सर्वकोपे बल्योपासं शेषदोषाविरोधतः ॥ १५ ॥
चिकित्सा का समय —जब दोषों का संचय होता है, उसी समय उनको शान्त कर देना चाहिए। यदि उस समय कोई दोष कुपित हुआ हो तो संचित दोष को शान्त करते समय उसके साथ विरोध न करते हुए कुपित दोष की भी चिकित्सा कर लेनी चाहिए। यदि सब दोष कुपित हुए हों तो उनमें जो बलवान् दोष हो उसकी पहले शान्त करनी चाहिए, किन्तु ध्यान रहे कि शेष दोषों के साथ उस चिकित्साक्रम का विरोध नहीं होना चाहिए ॥ १५ ॥
प्रयोगः शमयेद्वचाधिमेकं योऽन्यमुदीरयेत्। नाऽसौ विशुद्धः शुद्धस्तु शमयेद्यो न कोपयेत् ॥ १६ ॥