अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदशोऽध्यायः
अथातो दोषोपक्रमणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ।
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।
अब यहाँ से हम दोषोपक्रमणीय नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। जैसा कि आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।
उपक्रम—उपक्रमण का अर्थ है—चिकित्सा। इसके पहले अध्याय में विकारयुक्त अर्थात् घटे-बढ़े हुए वात आदि दोषों, रस आदि धातुओं तथा पुरीष आदि मलों की शीघ्र चिकित्सा करनी चाहिए, कहा गया है। अतः उनकी चिकित्सा करने के दृष्टिकोण से प्रस्तुत अध्याय का यहाँ उपक्रम किया जा रहा है। अथवा उक्त विषय को हम इस प्रकार भी कह सकते हैं—लक्षणस्कन्ध का वर्णन करने के बाद अब यह औषधस्कन्ध प्रस्तुत है।
संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—च.चि. ३०; सु.उ. ६४ तथा अ.सं.सू. २१ एवं २३ में देखें।
वातस्योपक्रमः स्नेहः स्वेदः संशोधनं मृदु। स्वादुमूललवणोष्णानि भोज्यान्मध्यङ्गमर्दनम् ॥ १ ॥
वेष्टनं त्रासनं सेको मद्यं पैंष्टिकगौडिकम्। स्निग्धोष्णा बस्तयो बस्तिनियमः सुखशीलता ॥ २ ॥
दीपनैः पाचनैः सिद्धाः स्नेहाश्रानेकयोनयः। विशेषान्मेद्यपिशिरसतैलानुवासनम् ॥ ३ ॥
वातदोष-चिकित्सा—स्नेह-प्रयोग (पान), स्वेदन (पसीना लाने के उपाय), हलका संशोधन (वमन, विरेचन आदि), मधुर, अम्ल, लवण रस तथा उष्ण भोजनों का प्रयोग, अभ्यंग (उबटन), मर्दन (मूट्टी, चम्पी, दबाना आदि), वेष्टन (पट्टी आदि से बाँधना), त्रासन (डराना-धमकाना), संक, मद्य का सेवन, उसमें भी पीठी और गुड़ से निर्मित मद्य का सेवन, स्निग्ध तथा उष्ण बस्तियों का नियमानुसार सेवन करना, सुखपूर्वक समय बिताना (व्यर्थ की दौड़-धूप से वातदोष बढ़ जाता है, अतः आराम करना), अग्निवर्धक तथा पाचनकारक द्रव्यों द्वारा तैयार किये गये अनेक प्रकार के स्नेहों का सेवन करना, विशेष रूप से सूअर, भैंसा आदि मेदस्वी प्राणियों के मांस तथा मांसरस का सेवन अथवा वातहर तैलों (नारायण तैल, एरण्ड तैल आदि) की अनुवासन बस्ति का प्रयोग करें ॥ १-३ ॥
पित्तस्य सर्पिषः पानं स्वादुशीतैर्विरेचनम्। स्वादुतिक्तकषायणि भोजनान्मौषधानि च ॥ ४ ॥
सुगन्धिशीतहृद्यानां गन्धानामुपसेवनम्। कण्ठे गुणानां हाराणां मणीनामुरसा धृतिः ॥ ५ ॥
कपूरचन्दनोशीरैरनुलेपः क्षणे क्षणे। प्रदोषश्चन्द्रमाः सौधं हारि गीतं हिमोऽनिलः ॥ ६ ॥
अयन्त्रणसुखं मित्रं पुत्रः सन्दिग्धमृधवाक्। छन्दानुवर्तिनो दाराः प्रियाः शीलविभूषिताः ॥ ७ ॥
शीताम्बुधारगर्भाणि गृहाण्युद्यानदीर्घिकाः। सुतीर्थविपुलस्वच्छसलिलाशयसेकते ॥ ८ ॥
साम्भोजजलतीरान्ते कायमाने द्रुमाकुले। सौम्या भावाः पयः सर्पिविरेकश्च विशेषतः ॥ ९ ॥
पित्तदोष-चिकित्सा—घृतपान, मधुर तथा शीतवीर्य द्रव्यों द्वारा विरेचन कराना, मधुर, तिक्त तथा कषाय रस-प्रधान भोजनों एवं औषधों का प्रयोग, सुगन्धित, शीतल तथा हृदय को प्रिय लगने वाले गन्धों का समीप से सेवन करना, गले में कण्ठियों, हारों तथा मणियों को (हृदय में) धारण करें। कपूर, चन्दन, खस का बार-बार अनुलेप लगायें। वास्तव में ये लेप सूख जाने पर कष्टकारक होते हैं, अतः सूखे हुए लेप को हटाकर तब ताजा लेप उन-उन अवयवों पर लगायें। प्रदोष (सायंकाल) का समय, चन्द्रमा, सौध (चूना पुता हुआ भवन—यह कुछ दिन शीतल रहता है) में निवास, मनोहर गीत, शीतल वायु, अयन्त्रणसुखमित्र