अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
भूल का दुष्परिणाम —उक्त चिकित्सकीय प्रमाद से गुरु (महान्) रोग में थोड़ी मात्रा में अथवा अल्पशक्तिशाली दी गयी संशोधन औषधि पूर्णरूप से संशोधन नहीं करा सकती अथवा अल्पमात्रा में संशोधन करने के कारण रोग को और अधिक बढ़ा देती है। इसके विपरीत लघु लक्षणों वाले रोग में अधिक मात्रा में उग्र बीर्य वाली संशोधन (वमन-विरचनकारक) औषधि का प्रयोग करा देने के कारण उसका अतियोग हो जाता है। इससे न केवल कफ एवं पुरीष आदि मलों का ही क्षय नहीं होता, अपितु ये औषधियाँ रोगों के शरीर को भी क्षीण कर देती हैं ॥७१-७२॥
अतोऽभियुक्तः सततं सर्वमालोच्य सर्वथा । तथा युञ्जीत भैषज्यमारोग्याय यथा ध्रुवम् ॥७३॥
चिकित्सक का कर्तव्य —अतः चिकित्सा-कर्म में लगे हुए चिकित्सक को चाहिए कि वह पूर्वापर (आगे-पीछे) का भलीभाँति विचार कर औषध (विशेषकर संशोधन औषध) का प्रयोग उस प्रकार करें, जिससे औषधप्रयोग लाभदायक हो ॥७३॥
वक्तव्य —इस विषय पर चरक के विचार इस प्रकार हैं—‘ज्ञानबुद्धिप्रदीपेन यो नाऽविशति योगिवत्। आतुरस्यान्तरात्मानं न स रोगान् चिकित्सति’ ॥ (च.वि. ४।१२) अर्थात् जो चिकित्सक अपने शास्त्रीय ज्ञान से प्रज्वलित बुद्धि रूपी दीपक को लेकर योगी की भाँति रोगी के अन्तरात्मा में प्रवेश नहीं कर जाता वह रोगी के रोगों की चिकित्सा नहीं कर सकता। यह सत्य है।
वक्ष्यन्तेऽतःपरं दोषा बुद्धिभयविभेदतः ।
दोषभेदों का वर्णन —अब इसके आगे बात आदि दोषों के वृद्धि तथा क्षय भेदों का सहारा लेकर वर्णन किया जायेगा।
पृथक् त्रीन् विद्धि—
दोषवृद्धि के तीन भेद —१. वातवृद्ध, २. पित्तवृद्ध तथा ३. कफवृद्ध।
—संसर्गस्त्रिधा, तत्र तु तात्रव ॥७४॥
संसर्ग के तीन भेद —१. वातपित्तवृद्ध, २. वातकफवृद्ध तथा ३. पित्तकफवृद्ध। इस प्रकार संसर्ग के तीन भेद कहे गये हैं। इस संसर्ग में नौ दोषभेदों को अपने प्रमाण से अधिक समझें ॥७४॥
त्रोनेव समया वृद्ध्या षडेकस्यातिशायने ।
संसर्ग के छः भेद —एक दोष की अधिक वृद्धि के छः भेद—१. वातवृद्ध पित्तवृद्धतर, २. पित्तवृद्ध वातवृद्धतर, ३. वातवृद्ध कफवृद्धतर, ४. कफवृद्ध वातवृद्धतर, ५. पित्तवृद्ध कफवृद्धतर, ६. कफवृद्ध पित्तवृद्धतर। उक्त संसर्ग ३ तथा ६ भेदों को मिला देने से ये ९ भेद हो जाते हैं।
त्रयोदश समस्तेषु—
समस्त दोषवृद्धि के १३ भेद —इनके भेदों में दो-दो दोषों की वृद्धि तथा १-१ की अतिवृद्धि होने पर ६ भेद, तुल्यवृद्धि तथा तर-तम भेद से ६ और १ भेद के जोड़ने से ये १३ भेद होते हैं, जिन्हें आगे कहा जायेगा। उनका क्रम यह है।
—षड् दृष्टेकातिशयेन तु ॥७५॥
१३ भेदों के उदाहरण —इस दृष्टि से दो दोषों के अतिशय से तीन भेद और एक दोष के अतिशय से भी तीन भेद होते हैं, इस प्रकार ६ भेद हुए—१. कफवृद्ध, वात-पित्त अधिक वृद्ध; २. पित्तवृद्ध, वात-कफ अधिक वृद्ध; ३. वातवृद्ध, पित्त-कफ अधिक वृद्ध; ४. पित्त-कफवृद्ध, वात अधिक वृद्ध; ५. वात-कफवृद्ध, पित्त अधिक वृद्ध; ६. वात-पित्तवृद्ध, कफ अधिक वृद्ध ॥७५॥
एकं तुल्याधिकेः—