अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदोषभेदीयाध्यायः १२ ]
सूत्रस्थानम्
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बक्तव्य—ऐसे अवसरों पर त्रिदोष-सिद्धान्त को आधार मानकर चिकित्सा करनी चाहिए।
स एव कुपितो दोषः समुत्थानविशेषतः। स्थानान्तराणि च प्राप्य विकारान् कुरुते बहुम् ॥ ६५ ॥
दोषों का रोगकर्तृत्व—वही दोष ( वात आदि में से कोई एक ) निदान ( कारण ) भेद से तथा शरीर के अलग-अलग अवयवों में आश्रित होकर अनेक प्रकार के रोगों को उत्पन्न कर देता है ॥ ६५ ॥
तस्माद्विकारप्रकृतीरधिष्ठानान्तराणि च। बुद्ध्वा हेतुविशेषांश्च शीघ्रं कुर्यादुपक्रमम् ॥ ६६ ॥
चिकित्साविधि-निर्देश—इसलिए रोग की प्रकृति ( वात आदि मूल कारण ), स्थान-विशेषों तथा विशेष कारणों ( आहार-विहार ) आदि को भलीभाँति समझकर तदनुसार शीघ्र चिकित्सा करनी चाहिए ॥ ६६ ॥
बक्तव्य—यहाँ दिये गये ६४ से ६६ तक के ये तीन पद्य अविकलरूप से च.सू. १८।४४-४६ से लिये गये हैं। इसके आगे ४७वें श्लोक में भगवान् पुनर्वसु ने कहा है—जो चिकित्सक रोग के मूल कारणों को समझकर बुद्धिपूर्वक तथा शास्त्र द्वारा निर्दिष्ट विधि से चिकित्सा करता है, वह कभी असफल नहीं होता है। वास्तव में इन निर्देशों का स्मरण चिकित्साकाल में अवश्य कर लेना चाहिए। 'विकारनामाऽकुशलो' ( ऊपर श्लोक ६४ ) का युक्तिसंगत समाधान करते हुए भगवान् पुनर्वसु कहते हैं—'तत्र व्याधयोऽपरिसङ्क्षेया भवन्ति, अतिबहुलात्; दोषास्तु खलु परिसङ्क्षेया भवन्ति, अनतिबहुलात्'। ( च.वि. ६।५ ) अतएव सभी रोगों का नाम-निर्धारण करना सम्भव नहीं है। अतः दोषानुसार तथा लक्षणानुसार चिकित्सा करने से अवश्य स्वास्थ्यलाभ होता है।
दूष्यं देशं बलं कालमनलं प्रकृतिं वयः। सत्त्वं सात्त्व्यं तथाऽऽहारमवस्थाश्च पृथग्विद्याः ॥ ६७ ॥
सूक्ष्मसूक्ष्माः समीक्ष्यैषां दोषौषधनिरूपणे। यो वर्तते चिकित्सायां न स स्वस्वति जातुचित् ॥
दूष्य आदि ज्ञान-निर्देश—जो चिकित्सक रस-रक्त आदि धातुओं तथा मल-मूत्र आदि दूष्यों, अनूप, जांगल आदि देशों और आमाशय, पक्वाशय आदि शरीर सम्बन्धी देशों, रोगबल तथा रोगी का बल, शीत, उष्ण आदि काल, लंघन, बमन, विरेचन तथा रक्तमोक्षण आदि का काल, मन्द, तीक्ष्ण, विषम आदि अनल ( अग्नि ) की स्थिति, वात आदि प्रकृति, बाल, यौवन आदि वयस, सत्त्व ( मनसु ), सात्त्व्य ( अनुकूलता ) तथा आहार और अनेक प्रकार की सूक्ष्म-से-सूक्ष्म अवस्थाओं का समुचित विचार कर दोषों के अनुसार औषध का प्रयोग करता है, वह चिकित्सक कभी भी चिकित्सा-कार्य में चूकता नहीं है ॥ ६७-६८ ॥
गुर्वल्पव्याधिसंस्थानं सत्त्वेहेबलाबलात्। दृश्यतेऽप्यन्यथाकारं तस्मिन्नभवितो भवेत् ॥ ६९ ॥
रोग की गुरुता-लघुता का विचार—कभी-कभी रोगी के सत्त्व ( मनसु ) तथा शरीर के सबल अथवा निर्बल होने के कारण गुरु अथवा लघु रोग के लक्षण विपरीत ( उल्टे-पुल्टे ) दिखलायी पड़ जाते हैं। ऐसी स्थिति में चिकित्सक को सावधान रहना चाहिए ॥ ६९ ॥
गुरुं लघुमिति व्याधिं कल्पयन्तु भिषग्बुवः। अल्पदोषाकलनया पथ्ये विप्रतिपद्यते ॥ ७० ॥
भिषग्बुव की निन्दा—भिषग्बुव ( जो भिषक् न होते हुए भी अपने को भिषक् कहा करता है, वह चिकित्सक ) गुरु रोग को लघु समझकर अर्थात् इसमें अधिक दोष नहीं है, अतः वह चिकित्सा करते समय भूल कर बैठता है ॥ ७० ॥
बक्तव्य—उक्त ६९ तथा ७० श्लोकों के विषय को समझने के लिए आप च.वि. ७।५-७ पद्यों का आशय समझने का प्रयत्न करें। वहाँ यह स्पष्ट शब्दों में कहा है कि उक्त प्रकार की भूल मूर्ख चिकित्सक ही कर सकता है, न कि विद्वान् चिकित्सक।
ततोऽल्पमल्पवीर्यं वा गुरुव्याघौ प्रयोजितम्। उदीर्येतत्रां रोगान् संशोधनमयोगतः ॥ ७१ ॥
शोधनं त्वतियोगेन विपरीतं विपर्यये। क्षिणुयान्न मलानेव केवलं वपुरस्यति ॥ ७२ ॥