भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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द्विविधोपक्रमणीयाध्यायः १४ ]

सूत्रस्थानम्

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विधि से अधिक स्थूलता ( मोटापा ) से पीड़ित, अधिक बलवान्, अधिक पित्त तथा कफ वालों की चिकित्सा करनी चाहिए।

आमदोष, ज्वर, वमन, अतिसार, हृद्दोष, विबन्ध, भारीपन, उद्वार ( डकार ), जी मिचलाना आदि रोगों से पीड़ितों की तथा मध्यम कोटि की स्थूलता, मध्यमबल, मध्यम पित्त तथा कफ वाले रोगियों की पहले पाचन तथा दीपन नामक चिकित्साविधियों से चिकित्सा करें।

उक्त आमदोष आदि रोगों से पीड़ित किन्तु हीन कोटि की स्थूलता, बल आदि वालों की चिकित्सा भूख-प्यासनग्रह नामक अपतर्पणों से करें।

मध्यम कोटि के बल वाले उपर्युक्त आमदोष आदि रोगों से पीड़ित किन्तु बलवान् रोगियों की चिकित्सा वातसेवन, आतप ( धूप ) सेवन तथा व्यायाम आदि अपतर्पणों से करें।

अल्प बल वाले आमदोष आदि ऊपर कहे गये रोगों से पीड़ित अल्प बल वाले रोगियों की चिकित्सा वातसेवन, धूपसेवन तथा व्यायाम आदि अपतर्पणों से करें ॥ ११-१४ ॥

बक्तव्य —यहाँ सन्तर्पण तथा अपतर्पण विधियों से चिकित्सा का निर्देश किया गया है। इस प्रसंग में ऊपर कहे गये रोगों एवं रोगियों में से कुछ रोग-रोगी वे हैं जिन्हें शोधन नामक अपतर्पण और कुछ को शमन नामक अपतर्पण का प्रयोग करायी जाता है। चिकित्सा काल में इस ओर भी ध्यान देना चाहिए।

न बृंहयेल्लङ्घनीयान्—

सन्तर्पण का निषेध —लंघन ( अपतर्पण ) कराने के योग्य ( प्रमेहरोगी, आमदोष युक्त आदि ) रोगियों को बृंहण ( सन्तर्पण ) योगों का प्रयोग न करायें।

—बृंहांस्तु मृदु लङ्घयेत् ॥ १५ ॥

युक्त्या वा देशकालादिवल्लतस्तानुपाचरेत्।

अपतर्पण-निर्देश —जो व्यक्ति सन्तर्पण के योग्य हैं, उनको अपतर्पण ( लंघन ) दिया जा सकता है। अथवा उनकी देश, काल आदि ( सात्य्य ) का विचार करके चिकित्सा की जा सकती है ॥ १५ ॥

बक्तव्य —कब कहाँ क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, इस सम्बन्ध में भगवान् पुनर्वसु के निर्देशों पर ध्यान दें—ज.सि. २।२५-२७ अर्थात् जो शास्त्र में बतलाया गया है बुद्धिमान् चिकित्सक को वैसा ही करना है, किसी प्रकार का दुराग्रह नहीं करना चाहिए। अपितु उसे चाहिए कि स्वयं भी तर्क-वितर्क करके अपने कर्तव्य का निश्चय करे, क्योंकि देश, काल तथा रोग बल एवं रोगी के बल के अनुसार कभी ऐसी भी अवस्था आ जाती है, जिसमें अकार्य भी करना पड़ता है और कार्यविधि को भी छोड़ना पड़ जाता है। जैसे—छर्दि, हृद्दोष तथा गुल्मरोगों में वमन करना सामान्य रूप से निषिद्ध है, किन्तु जहाँ-जहाँ इनकी स्वतन्त्र चिकित्सा कही गयी है वहाँ परिस्थिति-विशेष में वमन कराने का विधान मिलता है। इसी प्रकार कुष्ठरोगी के लिए बस्तिकर्म निषिद्ध है, परन्तु अवस्था-विशेष में निरुहणबस्ति देने का विधान किया गया है।

बृंहिते स्याद्वलं पुष्टितस्त्याध्यामयसङ्घ्रयः ॥ १६ ॥

सन्तर्पण के लाभ —भलीभाँति सन्तर्पण-विधि के हो जाने पर शरीर बलवान् एवं पुष्ट हो जाता है और सन्तर्पण-विधि द्वारा साध्य रोगों का क्षय भी हो जाता है ॥ १६ ॥

विमलेन्द्रियता सर्गो मलानां लाघवं र्विचिः। क्षुत्तुसहोदयः शुद्धहृदयोद्वाकरकण्ठता ॥ १७ ॥ व्याधिमार्ववमुत्साहस्तन्नानाशश्च लङ्घिते।

अपतर्पण के लाभ —भलीभाँति अपतर्पण के हो जाने पर इन्द्रियों में निर्मलता, मल-मूत्र आदि का सुख से निकलना, शरीर में हलकापन, भोजन के प्रति रुचि का होना, भूख तथा प्यास का साथ-साथ

१३ अ० ह०