अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
पृष्ठ 230, कुल 387 में से
संदर्भ में पढ़ें१९४
अष्टाङ्गहृदय
लगना, हृदय, उद्गार ( डकार ) तथा कण्ठप्रदेश का शुद्ध होना, रोगों का घट जाना, उत्साह की वृद्धि एवं तन्त्र का नाश—ये लक्षण होते हैं ॥ १७ ॥
अनेपेक्षितमात्रादिसेविते कुरुतस्तु ते ॥ १८ ॥ अतिस्यौल्यातिकार्थ्यादीन्, वक्ष्यन्ते ते च सौषधाः ।
योग, अतियोग, हीनयोग—अनेपेक्षित ( जितनी आवश्यकता नहीं है उतने ) सन्तर्पणकारक द्रव्यों का सेवन करने से अतिस्यूलता ( मोटापा ) आदि रोग हो जाते हैं तथा अधिक अपतर्पणकारक द्रव्यों या विधियों का सेवन करने से अत्यन्त कुशता आदि रोग हो जाते हैं। आगे इन रोगों का चिकित्सा सहित वर्णन किया जायेगा ॥ १८ ॥
रूपं तैरेव च जेयमतिबृंहितलङ्घिते ॥ १९ ॥
उनके लक्षण—उक्त अतिस्यूलता तथा अतिकुशता आदि लक्षणों द्वारा क्रमशः यह जान लेना चाहिए कि अतिस्यूल में अतिसन्तर्पण तथा अतिकुश में अतिअपतर्पण हो गया है ॥ १९ ॥
अतिस्यौल्यापचीमेहज्वरोदरभगन्दरात् । काससन्त्यासकृच्छ्रामकृच्छ्रादीनतिदारुणान् ॥ २० ॥
अतिस्यूलता आदि रोग—अतिसन्तर्पण ( बुंहण ) के कारण होने वाले रोगों के नाम—अतिस्यूलता ( मोटापा ), अपची, प्रमेह, ज्वर, उदररोग, भगन्दर, कास, सन्त्यास, मूत्रकृच्छ्र, आमवात, कृच्छ्र आदि अत्यन्त कष्टदायक रोग हो जाते हैं ॥ २० ॥
तत्र मेदोऽनिलस्लेष्मनाशनं सर्वमिष्यते ।
चिकित्सा-सूत्र—उक्त स्यूलता आदि रोगों में मेदोधातु, वातदोष तथा कफदोष को नष्ट करने वाले आहार-विहारों तथा औषधों का प्रयोग करना चाहिए।
कुलत्यजूर्णश्यामाकथवमुद्गमधुदकम् ॥ २१ ॥
मस्तुदण्डाहारिष्टचित्ताशोधनजागरम् । मधुना त्रिफलां लिह्यादुद्गुभीमभयां घनम् ॥ २२ ॥
रसाञ्जनस्य महतः पञ्चमूलस्य गुग्गुलोः । शिलाजतुप्रयोगश्च सप्तिमन्यरसो हितः ॥ २३ ॥
विडङ्गं नागरं क्षारः काललोहरजो मधु । यवामलकचूर्णं च योगोऽतिस्यौल्यादोषजित् ॥ २४ ॥
विशेष चिकित्सा—खान-पान—कुलथी ( गहूत या धीत ), ज्वार, सार्वी, जौ, मूंग, मधु मिला हुआ जल, दही का पानी, मठा, आसव, अरिष्ट, चित्ता करना, शोधन ( वमन-विरचन ) और रात्रि में जागना—इनका सेवन करना चाहिए।
औषध-प्रयोग—त्रिफलाचूर्ण को, गुरुच का स्वरस, केवल हीरीतकी के चूर्ण को अथवा नागरमोथा के चूर्ण को मधु के साथ मिलाकर चाटना चाहिए।
रसाञ्जन ( रसवत ) का, बिल्वादि महापञ्चमूल ( बेल, अरणी, सोनापाठा, गम्भार, पाङ्गल ) का, शुद्ध गुग्गुल का अथवा शुद्ध शिल्पजीत का सेवन अरणी की छाल के क्वाथ ( काढ़ा ) के साथ बहुत समय तक करना चाहिए।
विडंगदि योग—वायविडंग, सोठ, जौबार अथवा कोई भी क्षार, कालायस भस्म, जौ का चूर्ण और आँवला का चूर्ण—इन सबको मधु के साथ मिलाकर सेवन करने से अतिस्यूलता का विनाश होता है ॥ २१-२४ ॥
व्योषकद्रवीराशिगुविडङ्गातिविषास्थिराः । हिङ्गुसौवर्चलाजाजीयवानीधात्यचित्रकाः ॥ २५ ॥
निशे बृहत्यौ हृपुषा पाठा मूलं च केम्बुकात् । एषां चूर्णं मधु घृतं तैलं च सद्रशांशकम् ॥
सक्तुभिः षोडशगुणैर्युक्तं पीतं निहन्ति तत् । अतिस्यौल्यादिकान् सर्वान् रोगानन्यांश्च तद्विधान् ॥
हृद्दोषकामलाधित्रवशसाकासगलग्रहान् । बुद्धिमेधास्मृतिकरं सन्नस्याग्रेष्ठं दीपनम् ॥ २८ ॥
व्योषादि योग-फलश्रुति—व्योष ( सोठ, मरिच, पीपल ), कट्बी ( कुटकी ), वरा ( हरड, बहेड़ा, आँवला ), सहजन के बीज, वायविडंग, अतीस, शाल्मणी, हींग, सोचरनमक, जीरा, अजवाइन, धनियां,