अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंद्विविधोपक्रमणीयाध्यायः १४ ]
सूत्रस्थानम्
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चीता, हल्दी, दाहहल्दी की छाल, कण्टकारी, वनभण्टा, हपुषा, पाठा और करेम् की जड़—इन सब द्रव्यों का कपडछन किया हुआ समानभाग चूर्ण १ तोला; मधु, घृत तथा तिलतैल १-१ तोला और जी का सत् १६ तोला लेकर भलीभाँति मिलाकर जल में घोलकर प्रतिदिन पीना चाहिए। इसका सेवन अतिस्थूलता आदि रोगों तथा सन्तर्पण सेवन के कारण उत्पन्न होने वाले और इस प्रकार के अन्य रोगों को नष्ट करता है। हृद्दोग, कामला, श्वेतत्र, श्वास, कास तथा गल्यह ( देखें—च.सू. १८१२ ) रोगों को नष्ट करता है। बुद्धि, मेधा तथा स्मृतिवर्धक एवं मन्द अग्नि को प्रदीप्त करता है ॥ २५-२८ ॥
अतिकार्श्य भ्रमः कासस्तुष्णाधिक्यमरोचकः। स्नेहाग्निनिद्रादृक्श्रोत्रशुक्रौजःशुक्त्वरक्षयः ॥ बस्तिहृन्मूर्ध्निजङ्घोरुत्रिकपाश्चरुजा ज्वरः। प्रलापोर्ध्वानिलग्लानिच्छर्द्विपर्वास्थिभेदनम् ॥ वर्चोमूत्रग्रहाद्याश्च जायन्तेऽतिबिलङ्कृतात्।
कुशता आदि रोग—अधिक लंघन अथवा अधिक अपतर्पण करने से अधिक कुशता, भ्रम ( चक्करों ) का आना, कास, प्यास का अधिक लगना तथा भोजन के प्रति अरुचि का होना—ये लक्षण होते हैं। स्नेह, जठराग्नि, निद्रा, दुष्टि, श्रोत्र, शुक्र, ओजस, भूख तथा स्वर का क्षय हो जाता है। बस्ति ( मूत्राशय ), हृदय, मूर्धा, जंघा, ऊरु, त्रिक ( स्फिकसन्ध्याः पृष्ठवशास्थन्योः सन्धिस्तत् त्रिक मतम् ) तथा पसलियों में पीड़ा, ज्वर, प्रलाप, ऊपर की ओर को वातदोष का प्रकोप होना, ग्लानि ( हर्षक्षय ), वमन, पर्वा ( पोरों ) तथा अस्थियों में फटने की-सी पीड़ा का होना, मल एवं मूत्र की प्रवृत्ति में रुकावट आदि विकार अधिक लंघन करने से हो जाते हैं ॥ २९-३० ॥
काश्यमेव वरं स्थौल्यात् न हि स्थूलस्य भेषजम् ॥ ३१ ॥ बृंहणं लङ्घनं वाऽलमतिमेदोऽग्निवातजित्।
स्थूलता से कुशता श्रेष्ठ—स्थूल होने से कुश होना अच्छा है, क्योंकि स्थूलता की कोई सरल चिकित्सा नहीं है। क्योंकि स्थूलता रोग में मेदोधातु, जठराग्नि एवं वातदोष अधिक बढ़ जाते हैं, इनको घटाने ( कम करने ) के लिए न बृंहण-चिकित्सा ही समर्थ है और न लंघन ही समर्थ हैं ॥ ३१ ॥
बलव्य—चरक ने स्थौल्य के सम्बन्ध में विचार करते हुए कहा है—‘स्थौल्यकाश्यं वरं काश्यं समोप-करणो हितो’। ( च.सू. २१।१७ ) अर्थात् स्थूल पुरुष की सद्यःफलदायक कोई चिकित्सा नहीं है। देखें—यदि जठराग्नि और बढ़े हुए वातदोष की शान्ति के लिए हम सन्तर्पण द्रव्यों का प्रयोग करते हैं, तो इससे मेदोधातु अधिक बढ़ जायेगा। यदि हम अपतर्पण-चिकित्सा करते हैं तो यह मेदस्वी पुरुष उसे सहन नहीं कर सकता, अतएव कहा गया है—‘स्थूल होने की अपेक्षा कुश होना ही अच्छा है’। कुश रोगी को यथास्थिति में लाना सरल है, स्थूल को अपेक्षाकृत कुश करना कठिन होता है। यह अपने लिए तथा दूसरों के लिए बोझ होने के साथ-ही-साथ भूषार भी होता है। इसलिए चरक ने इसकी गणना ‘अष्टौ निन्दितौयाध्यायं’ में की है। तथापि इनकी चिकित्सा का वर्णन इसी के आगे किया जा रहा है।
मधुरस्निग्धसौहित्यैर्यत्सीस्थेन च नश्यति ॥ ३२ ॥ क्रशिमा स्थविमाऽत्यन्तविपरीतनिषेवर्णः।
कुशता-चिकित्सा—मधुर तथा घी-तेल से बने हुए आहारों को सदा भरपेट खाते रहने से तथा सुखमय जीवन बिताने से कुशता दूर हो जाती है।
स्थूलता-चिकित्सा—स्थूलता जिन कारणों से उत्पन्न हुई है, उनके सर्वथा विपरीत आहार-विहारों का चिरकाल तक सेवन करने से दूर की जा सकती है। इसी को आयुर्वेदशास्त्र ने ‘निदान-परिजन’ चिकित्सा भी कहा है ॥ ३२ ॥
योजयेद्वृंहणं तत्र सर्वं पानात्रभेषजम् ॥ ३३ ॥