भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

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अष्टाङ्गहृदये

कृशता-चिकित्सा—इसमें पान ( पेय—दूध आदि ), अन्न ( आहार—स्निग्ध पदार्थ, खीर अथवा मांस आदि ) तथा भेषज ( असगन्ध आदि ) बृंहण पदार्थों का नियमित सेवन करे ॥ ३३ ॥

अचिन्तया हर्षणेन ध्रुवं सन्तर्पणेन च । स्वप्नप्रसङ्गान्नच कृशो वराह इव पुष्यति ॥ ३४ ॥

चिन्ता ( सोच-फिकर ) न करने से, प्रसन्न रहने से, सन्तर्पण पदार्थों का निरन्तर सेवन करते रहने से और अधिक सोने से कृश मनुष्य सूअर की भाँति मोटा हो जाता है ॥ ३४ ॥

न हि मांससमं किञ्चिदव्यदेहबृहत्त्वकृतं । मांसादमांसं मांसेन सम्भूतत्वाद्दिशेषतः ॥ ३५ ॥

मांस की महत्ता—बृंहण ( सन्तर्पण ) कारक द्रव्यों में मांस के समान ऐसा कोई द्रव्य नहीं है, जो शरीर को शीघ्र मोटा कर सके। उसमें भी कच्चा मांस को खाने वाले प्राणियों का अपना मांस भी मांस को खाने के कारण ही मोटा होता है, अतः इस प्रकार के प्राणियों का मांस और भी अधिक मांसवर्धक होता है ॥ ३५ ॥

गुरु चातर्पणं स्थूले विपरीतं हितं कृशे । यवगोधूममुभयोस्तद्योग्याहितकल्पनम् ॥ ३६ ॥

स्थूलता एवं कृशता की चिकित्सा—स्थूलता में गुरु ( देर में पचने वाले ) पदार्थों का आधा पेट भोजन करना हितकारक होता है और कृशता में लघु पदार्थों का सन्तर्पण ( भरपेट खाना ) लाभकर होता है। जो तथा गेहूँ के विविध पदार्थों की स्थूल एवं कृश के योग्य कल्पना करके दिये गये आहार दोनों के लिए लाभदायक होते हैं ॥ ३६ ॥

वक्तव्य—यद्यपि चाणक्य ने कहा है कि—‘मांसान्मांसं प्रवर्धते’। यह सत्य है, परन्तु निरामिषभोजी समाज भी स्वस्थ, हृष्ट-पुष्ट देखा जाता है और निरामिषभोजी आमिषभोजियों की अपेक्षा आध्यात्मिक दृष्टि से अधिक सुखी जीवन बिताते हैं।

भगवान् पुनर्वसु ने जो लंघन तथा बृंहण की परिभाषा दी है, वह अत्यन्त निष्प्रान्त है। देखें—‘यत् किञ्चिल्लाघवकरं देहे तल्लङ्घनं स्मृतम्। बृहत्वं यच्छरीरस्य जनयेत् तच्च लङ्घनम्’ ॥ ( व.सू. २२।१ ) अर्थात् जो आहार-विहार तथा औषधोपचार शरीर में हलकापन उत्पन्न करता है, उसे लंघन कहते हैं और जो गुरुता ( भारीपन ) पैदा करता है, उसे ‘बृंहण’ कहते हैं।

दोषगत्याऽतिरिच्यन्ते ग्राहिभेद्यादिभेदतः । उपक्रमं न ते द्वित्वाद्भिन्ना अपि गदा इव ॥ ३७ ॥

इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां प्रथमे सूत्रस्थाने द्विविधोपक्रमणीयं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥


यद्यपि दोषों की गतिभेद के अनुसार ग्राही एवं भेदी आदि भेदों से चिकित्सा के भी अनेक भेद होते हैं और तदनुसार उनकी व्यवस्था भी की जाती है; फिर भी वे सभी चिकित्सा सम्बन्धी भेद सन्तर्पण एवं अपतर्पण के भीतर उसी प्रकार आ जाते हैं जैसे रोगों के अनेक भेद होने पर भी वे साम तथा निराम भेद से दो प्रकार के ही होते हैं ॥ ३७ ॥

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में द्विविधोपक्रमणीय नामक चौदहवाँ अध्याय समाप्त ॥ १४ ॥