अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चदशोऽध्यायः
अथातः शोधनादिगणसङ्ग्रहमध्यायं व्याख्यास्यामः ।
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।
अब हम यहाँ से शोधनादिगणसंग्रह नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। जैसा कि आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।
उपक्रम—द्विविधोपक्रमणीय नामक अध्याय का वर्णन करने के बाद अब यहाँ से शोधनादिगणसंग्रह नामक अध्याय का आरम्भ किया जा रहा है। इसके पूर्व अध्याय में अनेक प्रकार की चिकित्सा-विधियों का वर्णन सूत्र रूप में किया गया था। अब इस प्रकरण में शोधन आदि कर्म के उपयोगी औषधगणों के संग्रह की चर्चा की जायेगी।
संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—ज.सू. ४; सु.सू. ३७, ३८, ३९ एवं अ.सं.सू. १४, १५, १६ में देखें।
मदनमधुकलम्बानिम्बविम्बोविशालात्रपुसकुटजमूवदिवदालीकुमिन्म ।
विदुलदहनचित्राः कोशवत्यौ करजः कणलवणवचैलासर्पपाञ्चर्दनानि ॥ १ ॥
वमनकारक द्रव्य—मैनफल, मुलेठी, लम्बा ( कटुमुम्बी ), निम्ब ( नीम ), विम्बो ( कड़वी तुण्डिकेरी ), इन्द्रायण, त्रपुस ( काली निशोध, अन्यत्र खीरा ), कुटज, मूर्वा, देवदाली ( बन्दालडोडा ), वायविडंग, जलवैतस, चित्रक, कडुआ परबल, कोशातकी, राजकोशातकी, करज, पिपली, लवण, बालवच, इलायची तथा सफेद ( पीली ) सरसों ॥ १ ॥
वक्तव्य—ऊपर निर्दिष्ट औषधद्रव्यों को वमनकारक कहा गया है, किन्तु इनमें कतिपय द्रव्य ऐसे हैं, जिनके स्वतन्त्र गुण वामक नहीं हैं। जैसे—मधुक ( मुलेठी ), एला ( इलायची ) तथा त्रपुस का अर्थ जिन्होंने 'खीरा' किया है, वह भी। इसके बाद एक प्रकाश की किरण दिखलायी पड़ी, वह है—सुश्रुत की अमुतोपम वाणी—'समस्तं वर्गमर्धं वा यथालभमथापि वा। प्रपुञ्जीत भिषक् प्राज्ञो यथोद्दिष्टेषु कर्मसु' ॥ ( सु.सू. ३७।३४ ) अर्थ स्पष्ट है। इस गण में कहे गये द्रव्यों के स्वतन्त्र गुणों के विवेचन की आवश्यकता नहीं पड़ती, अपितु इनका प्रयोग मिलाकर किया जाता है, क्योंकि यह सुश्रुत का सिद्धान्त-वाक्य मिश्रक वर्ग का है। मदनद्रव्य वमनकारक द्रव्यों में अग्रणी है, अतएव इस गण में उसकी सर्वप्रथम गणना की गयी है।
निकुम्भकुम्भत्रिफलागवाक्षीस्तुक्शङ्खिनीनोलितितिल्कानि ।
शम्याककम्पिलकहेमदुधा दुग्धं च मूत्रं च विरेचनानि ॥ २ ॥
विरेचनकारक द्रव्य—दन्ती ( जमालगोटा ) की जड़, निसोत की जड़, त्रिफला, इन्द्रायण की जड़, थूहर का दूध, शंखिनी, नील के बीज, तिल्क ( लोघ की छाल ), अमलतास की गुद्दी, कबीला, स्वर्णक्षीरी, दूध तथा मूत्र ( गोमूत्र ) आदि द्रव्य विरेचक होते हैं ॥ २ ॥
वक्तव्य—'तिल्कस्यककाम्पिल्यकपाटलीत्वकः' । ( अ.सं.सू. १४३ ) उक्त विषय को अ.हू.सू. १५।२ में देखें। बुद्धवाग्भट ने कबीला की त्वचा का प्रयोग विरेचनार्थ लेने का निर्देश दिया है, उस विषय का संशोधन हृदय में किया गया है। इसका ग्राह्य अंग सामान्य रूप से फलरज है। इसकी त्वचा का प्रयोग कुष्ठ में किया जाता है। परिचय—'इष्टिकाचूर्णसङ्काशः चन्द्रिकाढ्योऽल्परेचनः । सौराष्ट्रदेशे वृक्षस्य फलरेचुः कपिलकः' ॥ देखें—शिवदत्त-निघण्टु। इतना होने पर भी बुद्धवाग्भट का निर्देश परीक्षणीय है।