अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
मदनकुटजकुच्छदेवदालीमधुकवचादशमूलदारुशस्ताः । यवमिशिकृतवेधनं कुल्ल्या मधु लवणं त्रिवृता निरुहणानि ॥ ३ ॥
निरुहणोपयोगी द्रव्य—मैनफल, कुटज की छाल, कूठ, बन्दालडोडा, मुलेठी, बालवच, दशमूल (दोनों पञ्चमूल), देवदारु, रासना, जौ, सौफ या सोया, कृतवेधन (धामार्गव तरोई), कुल्ल्या के बीज, मधु, लवण और निसोत—इन द्रव्यों का उपयोग निरुहणवस्ति के लिए करना चाहिए ॥ ३ ॥
वेल्लापामार्गव्योषदाबीसुराला बीजं शैरीषं बाहृतं शैग्रवं च । सारो माधूकः सैन्धवं ताभ्यंशैलं त्रुट्यौ पृथ्वीका शोधयन्त्युत्तमाङ्गम् ॥ ४ ॥
शिरोविरिचनोपयोगी द्रव्य—वायविंडंग, अपामार्ग, व्योष (सोत, मरिच, पीपल), दारुहल्दी, सफेद राल, सिरौष के बीज, वनभण्टा के बीज, सहजन के बीज, महुआ का सार, संधानमक, ताभ्यंशैल (सूखा रसाञ्जन), छोटी तथा बड़ी इलायची और पृथ्वीका (हिंगुपत्री)—ये द्रव्य शिरोविरिचक होते हैं। ये रूक्ष विरिचक द्रव्य हैं। इनकी नस्य देने से सिर के भीतर जमा हुआ कफ बाहर निकल आता है ॥ ४ ॥
भद्रदारु नतं कुच्छं दशमूलं बलाद्रयम् । वायुं वीतरदिदश्च विदार्पादिश्च नाशयेत् ॥ ५ ॥
वातनाशक द्रव्य—देवदारु, तगर, कूठ, दशमूल (दोनों पञ्चमूल), बला, अतिबला, वीरतर आदि गण (आगे २४वाँ श्लोक देखें) तथा विदार्पादि गण (आगे ९-१०वाँ श्लोक देखें) ये द्रव्य वातनाशक हैं ॥ ५ ॥
दूर्वाऽनन्ता निम्बवासाऽस्तमगुप्ता गुन्दाऽभीरः शीतपाकी प्रियङ्गुः । न्यग्रोधादिः पद्मकादिः स्थिरे द्वे पद्यं वयं सारिवादिश्च पित्तम् ॥ ६ ॥
पित्तनाशक द्रव्य—दूब, जवासा, नीम, अहूसा, केबीच, गुन्दा (पटेरक), शतावरो, शीतपाकी (काकण्तिका-भेद), प्रियंगु (श्यामा), न्यग्रोधादि गण (श्लोक ४१), पद्मकादि गण (श्लोक १२), शालपर्णी, पुष्टपर्णी, कमल, नागरमोथा तथा सारिवादि गण (श्लोक ११)—इनका सेवन पित्तदोषनाशक होता है ॥ ६ ॥
आरुण्वाधिरकादिर्मुष्ककाद्योऽसनादिकः । सुरसादिः समुस्तादिवत्सकादिवल्लासजित् ॥ ७ ॥
कफनाशक द्रव्य—आरुण्वादि गण (श्लोक १७), अर्कादि गण (श्लोक २८), मुष्ककादि गण (श्लोक ३२), असनादि गण (श्लोक १९), सुरसादि गण (पद्य ३०), मुस्तादि गण (पद्य ४०) एवं वत्सकादि गण (पद्य ३३) इन गणों में वर्णित द्रव्य कफनाशक होते हैं ॥ ७ ॥
जीवन्ती काकोल्यौ मेदे द्वे मूद्रमाषपर्ण्यां च । ऋषभकजीवकमधुकं चेति गणो जीवनीयाख्यः ॥
जीवनीय गण—जीवन्ती, काकोली, क्षीरकाकोली, मेदा, महामेदा, मुदगपर्णी, माषपर्णी, ऋषभक, जीवक तथा मुलेठी—ये दस द्रव्य जीवनी शक्ति को बढ़ाने वाले हैं ॥ ८ ॥
विदारिपञ्चाङ्गुलवृश्चिकालीवृश्रोवदेवाहृष्यूर्पण्यः ।
कण्डूकरी जीवनहृत्संज्ञे द्वे पञ्चके गोपसुता त्रिपादा ॥ ९ ॥
विदार्पादिरयं हृद्यो बृंहणो वातपित्तहा । शोषगुल्माङ्गमर्दोर्वश्वसासकसहरो गणः ॥ १० ॥
विदार्पादि गण—विदारीकन्द, एरण्ड, मेडासिंगी, पुनर्वा, देवदारु, मुदगपर्णी, माषपर्णी, केबीच, जीवनपञ्चमूल (अ.हृ.सू. ६।१७०), लघुपञ्चमूल (अ.हृ.सू. ६।१६९), सारिवा तथा हंसराज—ये द्रव्य विदार्पादिगण के कहे गये हैं। यह गण हृदय के लिए हितकर, शरीर को पुष्ट करने वाला, वात तथा पित्त-दोषनाशक, शोष, गुल्म, अंगमर्द, ऊर्ध्वश्वस तथा कास रोगों का विनाशक है ॥ ९-१० ॥
सारिवोशरीरकाश्मर्यमधुकशशिश्चिरद्वयम् । यष्टौ परुषकं हन्ति बाहृपिताम्रतृङ्खरान् ॥ ११ ॥