भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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शोधनादिगणसङ्ग्रहाध्यायः १५ ]

सूत्रस्थानम्

११९

सारिवादि गण—सारिवा, खस, सम्भार, महुआ, सफेदचन्दन, लालचन्दन, मुलेठी तथा फालसा—ये द्रव्य सारिवादि गण के हैं। इन द्रव्यों का प्रयोग करने से दाह, पित्तज रोग, रक्तज रोग, तुषा (प्यास) तथा ज्वर का नाश हो जाता है ॥ ११ ॥

पञ्चकपुष्पौ वृद्धितुगर्धः शुद्धयमृता दश जीवनसंज्ञाः ।

स्तन्यकरा धन्तरीणपित्तं प्रीणनजीवनबहुणवृष्याः ॥ १२ ॥

पञ्चादि गण—पञ्चाकण्ठ, पुष्प (प्रपीण्डरीक), वृद्धि (महाश्रावणी), वंशलोचन, कृद्धि, काकडसिंगी, गुरुच तथा जीवनीय गण के दस द्रव्य (देखें—परा ८वीं)—इसे पञ्चादि गण कहते हैं। यह दूध को बढ़ाता है, वातज, पित्तज रोगों को नष्ट करता है, तृप्तिकारक है, जीवनीय शक्ति को बढ़ाता है, शरीर को पुष्ट करता है तथा वीर्यवर्धक है ॥ १२ ॥

परुषकं वरा द्राक्षा कटफलं कतकात् फलम् । राजाहं दाडिमं शाकं तृणमृत्रामयवातजित् ॥ १३ ॥

परुषकादि गण—फालसा, त्रिफला, दाख या मुनक्का, कायफल (काफल), निर्मली के बीज, खिरनी के फल, दाडिम (अनार) तथा सागवान के फल—इनका प्रयोग प्यास लगाने में, मूत्रज तथा वातज विकारों का शमन करता है ॥ १३ ॥

अञ्जनं फलिनी मांसी पद्योत्पलसाञ्जनम् । सैलामधुकनागाहं विषान्तर्दाहपित्तनूत् ॥ १४ ॥

अञ्जनादि गण—काला सुरमा, सफेद सुरमा (इन दोनों को प्रोतोज्जन तथा सौवीराञ्जन भी कहते हैं), फलिनी (प्रियंगु), जटामांसी, कमल, नीलकमल, रसवत, बड़ी इलायची, मुलेठी और नागकेसर—इनका प्रयोग विषविकार, अन्तर्दाह (भीतरी जलन) तथा पित्तविकारों का शमन करता है ॥ १४ ॥

पटोलकटुरोहिणीचन्दनं मधुस्रवगुड्डीचपाठान्वितम् ।

निहन्ति कफपित्तकुष्ठज्वरान् विषं वमिमरोचकं कामलाम् ॥ १५ ॥

पटोलादि गण—परबल, कुटकी, सफेदचन्दन, मधुस्रव (सुरंगी), गुरुच तथा पाठा—यह गण कफज रोग, पित्तज रोग, कुष्ठरोग, ज्वर, विषविकार, वमन, अरोचक तथा कामला रोगों का शमन करता है ॥ १५ ॥

वक्तव्य—मधुस्रव शब्द के 'वैद्यकशब्दसिन्धु' में अनेक पर्याय इस प्रकार मिलते हैं—मधुक वृक्ष, मोरटलता, मूर्वा, चोरमूर्वा, हंसपदी, पिण्डबजूर का वृक्ष, जीवन्ती, मधुयष्टि, जटामांसी, लाल लज्जालु।

गुड्डीचपद्यकारिष्टधानकारक्तचन्दनम् । पित्तन्तेष्पज्वरच्छद्विदाहतुष्णाधन्मग्निकृत् ॥ १६ ॥

गुड्डीयादि गण—गुरुच, पथकाष्ठ, नीम की छाल, धनियाँ तथा लालचन्दन—यह गण पित्तज विकार, कफज विकार, ज्वर, वमन, दाह, प्यास का लगाना; इन विकारों को दूर करता है एवं जठराग्नि को प्रज्वलित करता है ॥ १६ ॥

आरग्वधैन्द्रयवपाटलिकाकित्तिकानिम्बाभूतामधुरसास्रववृक्षपाठाः ।

भूनिम्बसैर्यकपटोलकरञ्जयुष्मसत्तच्छदाग्निमुषवीफलबाणघोण्टाः ॥ १७ ॥

आरग्वधादिर्जयति छद्विकुष्ठविषज्वरान् । कफं कण्डू प्रमेहं च दुष्टव्रणविशोधनः ॥ १८ ॥

आरग्वधादि गण—अमलतास, इन्द्रजी (कुटजबीज), पादूल, करंज, नीम, गुरुच, मूर्वा, सुवृक्ष (या सुवतह—विकेकत वृक्ष), पाठा, चिरायता, कटसैर्या, परबल, लताकरंज, करंज (कजू या डिठोरी), छतिवन, चित्रक, कलौजी, मैनफल, सहचर तथा सुपारी; यह गण वमन, कुष्ठ, विषविकार, ज्वर, कफज रोग, खुजली तथा प्रमेहरोग को नष्ट करता है एवं दूषित व्रण को शुद्ध करता है ॥ १७-१८ ॥

असतनतिनिशभूजैवेतवाहप्रकीर्याः खदिरकदरभण्डशिंशिपामेषशुद्ध्याः ।

त्रिहिमतलपलाशा जोद्धकः शाकशाली क्रमुकधवकलिङ्गच्छागकर्णाश्रकर्णाः ॥ १९ ॥