अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
असनादिविजयते भित्रकुष्ठकफक्रिमीन्। पाण्डुरोगं प्रमेहं च मेदोदोषनिबर्हणः ॥ २० ॥
असनादि गण—विजयसार, तिनिश, भोजपत्र, अर्जुन, डिठोरी, बैरसार, श्वेतसार, सिरस, शीशम, मेदासिंगी, सफेदचन्दन, लालचन्दन, दारुहल्दी, ताड़, पलाश, अगुह, सागवान, सालवृक्ष, सुपारी, धव, इन्द्रजी, अजकर्ण एवं अश्चकर्ण—यह गण शिवत्र ( सफेद कोढ़ ), कुष्ठरोग, कफज रोग, क्रिमिरोग, पाण्डुरोग, प्रमेह तथा मेदोदोष ( मोटापा ) इन विकारों को नष्ट करता है ॥ १९-२० ॥
वरुणसैर्यक्युभ्यश्चातावरोदहनमोरटबिल्वविषाणिकाः ।
द्विवृहतीद्विकरञ्जयाद्र्यं बहूलपल्लवदर्भरुजाकराः ॥ २१ ॥
वरुणादिः कफं मेदो मन्दाग्नित्वं नियच्छति। आद्यवार्तां शिरःशूलं गुल्मं चान्तः सविद्रधिम् ॥
वरुणादि गण—वरुण ( वरना ), लाल फूल वाली कटसरेया, सफेद फूल वाली कटसरेया, शतावर, चित्रक, मूर्वा, बेल, काकड़ासिंगी, कण्टकारी, वनभण्टा, करंज, पूतिकरंज, अरणी, हँरें, सहजन, दर्भ ( कुशभेद ) तथा रुजाकर ( हिन्ताल )—यह गण कफज विकार, मेदोविकार, मन्दाग्नि, ऊरुस्तम्भ, शिरःशूल, गुल्मविकार तथा विद्रधि ( भीतर की ओर मुँह वाला फोड़ा ) को नष्ट करता है ॥ २१-२२ ॥
ऊषकस्तुत्युत्कं हिङ्गु कासीसद्वयसैन्धवम्। सशिलाजतु कुन्तूशमगुल्ममेदःकफापहम् ॥ २३ ॥
ऊषकादि गण—ऊषक ( कल्लर ), तूतिया ( औषध-प्रयोग में इसे भूत कर लिया जाता है ), हाँग, हरा कासीस, संधानमक तथा शिलाजीत—यह गण मूत्रकुन्तु, अश्मरी ( पथरी ), गुल्म, मेदोविकार एवं कफज विकार को शान्त करता है ॥ २३ ॥
वेल्तन्तरारणिकबूकवृषाशमभेदगोकण्टकेकटसहाचरबाणकाशाः ।
वृक्षादनीनलकुशद्वयगुण्टगुन्दाभल्लूकमोरटकुरण्टकरम्भपार्थः ॥ २४ ॥
वर्गां वीरतराद्योऽयं हन्ति वातकृतान् गदान्। अश्मरीशर्करामूत्रकुन्तूशघातरुजाहरः ॥ २५ ॥
वीरतरादि गण—वीरतरु, अग्निमन्य ( अरणि ), बूक ( ईश्वरमलिका ), अडूसा, पाषाणभेद, गोखरु, इत्कर, सहचर, बाण ( नीले फूल वाली कटसरेया ), काश, वन्दा, नलसर ( नरकट ), कुश, दर्भ ( डाभ ), गुण्ट ( कुन्ड्र ), गुन्दा ( पटेरक ), भल्लूक ( सोनापाठा ), मोरट ( क्षीरमोरट ), कुरण्ट ( सिलियारा ), करम्भ ( उत्तम अरणि ) और पार्थ ( सुवर्चला—हलुडल )—यह गण वातज विकारों, अश्मरी ( पथरी ), शर्करा, मूत्रकुन्तु तथा मूत्राघात की पीड़ा का शमन करता है ॥ २४-२५ ॥
रोधश्राबरकरोधपलाशा जिङ्गिणीसरलकटफलयुक्ताः ।
कृत्सिताम्बकदलीगत्तशोकाः सैलवालुपरिपैलवमोचाः ॥ २६ ॥
एष रोधादिको नाम मेदःकफहरो गणः। योनिदोषहरः स्तम्भी वण्यौ विषविनाशनः ॥ २७ ॥
रोधादि गण—लोघ, पठानीलोघ, पलाश, जिगिणी ( काला सेमल ), सरल ( चौड़ वृक्ष ), कायफल, रासना, कदम्ब, केला, अशोक, ऐलवालुक, मोथा एवं मोच ( सलई )—यह गण मेदोदोष, कफज रोग, योनिविकारनाशक, मलस्तम्भक, वर्ण को उज्ज्वल करने वाला तथा विषविकार को नष्ट करता है ॥ २६-२७ ॥
अकालिकां नागदन्ती विशल्या भाङ्गीं रास्ता वृश्चिकाली प्रकीर्या ।
प्रत्यक्पुष्पी पीततैलोदकीर्या श्वेतायुग्मे तापसानां च वृक्षः ॥ २८ ॥
अयमर्कादिको वर्गः कफमेदोविषापहः। कृमिकुष्ठप्रशमनो विशेषाद्वन्नशोधनः ॥ २९ ॥
अर्कादि गण—आक ( मदार ), अलर्क ( सफेद फूल वाला मदार ), नागदमन, कलिहारी, भारंगी, रासना, ऊंटकटारा, करंज, अपामार्ग ( चिरचिटा ), मालकाँगुनी, डिठौरी, दोनों श्वेता ( किणही, पालिन्दी ) तथा तापसवृक्ष ( इंगुदी )—यह गण कफज विकार, मेदोरोग, विषविकार, क्रिमिरोग तथा कुष्ठरोग नाशक है; विशेष करके यह दुष्टव्रणों का शोधक है ॥ २८-२९ ॥