भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

पृष्ठ 237, कुल 387 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 237

शोधनादिगणसङ्ग्रहाध्यायः १५ ]

सूत्रस्थानम्

२०१

सुरसयुगफणिज्जं कालमाला विडङ्गं खरबुसवृषकर्णीकटुफलं कासमर्दः।

क्ष्वकसरसिभाङ्गीर्कामुर्काः काकमाची कुलहलविषमुष्टीभूस्तुणो भूतकेशी ॥ ३० ॥

सुरसादिर्गणः श्लेष्मसेदःकृमिनिवृदनः। प्रतिश्यायाहृचिश्वासकासज्ज्ञो ब्रणशोधनः ॥ ३१ ॥

सुरसादि गण—सफेद तुलसी, काली तुलसी, मरुवा, कालमाला (कुटेरक), वायविंडा, खरबुस (तुलसी), मूसाकर्णी, कायफल, कासमर्द (कसौंदी), नकछिंकनी, जलधनियाँ, भारंगी, कामुका (रक्तमंजरी), मकोय या गुडफला, कुलहल (भूकदम्ब), कुचिला, सुरगन्धितुण तथा जटामांसी—यह गण कफज विकार, मेदोरोग, क्रिमिज रोग, प्रतिश्याय, भोजन के प्रति अरुचि, श्वास एवं कास रोग का शमन करता है; विशेषकर यह ब्रणशोधक होता है ॥ ३०-३१ ॥

मुष्ककस्तुग्ग्वराद्वीपिलाशधवशिंशिपाः। गुल्ममेहाशमरीपाण्डुमेदोशःकफशुक्रजित् ॥ ३२ ॥

मुष्ककादि गण—मोखा, सेहुण्ड, त्रिफला, चित्रक, पलाश, धव तथा शीशम—यह गण गुल्म, प्रमेह, अशमरी (पथरी), पाण्डुरोग, मेदोरोग, बवासीर, कफज विकार एवं शुक्र (वीर्य) सम्बन्धी दोषों को दूर करता है ॥ ३२ ॥

वत्सकमूर्वाभाङ्गीकटुका मरीचं घुणप्रिया च गण्डीरम्।

एला पाठाऽजाजी कदङ्गफलजमोदसिद्धार्थवचाः ॥ ३३ ॥

जीरकहिङ्गुविडङ्गं पशुगन्धा पञ्चकोलकं हन्ति। चलकफमेदःपीनसगुल्मज्वरशूलदुर्नात्मः ॥

वत्सकादि गण—कुटज, मूर्वा, भारंगी, कुटकी, कालीमरिच, अतीस, धूर, इलायची, पाठा, जीरा, सोनापाठा, मैनफल, अजवाइन, पीली सरसों, बालवच, कालाजीरा, हाँग, वायविंडा, अजमोद और पंचकोल (पीपल, पीपलामूल, चब्य, चित्रक तथा सोठ)—यह गण वातज विकार, कफज विकार, मेदोरोग, पीनस, गुल्म, ज्वर, शूल एवं बवासीर रोगों को नष्ट करता है ॥ ३३-३४ ॥

बचाजलददेवाह्वानगरातिविषाभयाः। हरिद्राद्रव्ययष्टघ्राहकलशीकुटजोद्भवः ॥ ३५ ॥

बचाहरिद्रादिगणावामातीसारनाशनी। मेदःकफादघपवनस्तन्यदोषनिबर्हणो ॥ ३६ ॥

बचादि गण—बालवच, नागरमोथा, देवदारु, सोठ, अतीस तथा हरीतकी (हरड या हरै)।

हरिद्रादि गण—हल्दी, दाहहल्दी (किरमोड़ा की छाल), मुलहठी, पुष्टपर्णी तथा इन्द्रजी।

उक्त दोनों गण के ये द्रव्य आमातिसार, मेदोरोग, कफजरोग, आढ्यवात (ऊरुस्तम्भ) एवं स्तन्यदोषों को नष्ट करते हैं ॥ ३५-३६ ॥

प्रियङ्गुपुष्पाञ्जनयुग्मपद्याः पद्याद्रजो योजनवल्लघनन्ता।

मानद्वमो मोचरसः समङ्गा पुत्रागशतीं मदनीयेतुः ॥ ३७ ॥

अम्बछा मधुकं नमस्कारी नन्दीवृक्षपलाशकच्छुराः।

रोधं धातकिबिल्वपेशिके कदङ्गः कमलोद्भवं रजः ॥ ३८ ॥

गणो प्रियङ्गुवम्बच्छादी पक्वातीसारनाशनी। सन्धानीयो हितो पिते ब्रणानामपि रोपणी ॥ ३९ ॥

प्रियंग्वादि गण—प्रियंगु (गोदनी) या प्रियंगुपुष्प (प्रियंगु के फूल), पुष्प (जस्ता का लावा या फूल, जिसे जयपुरी सफेदा भी कहते हैं), अञ्जनयुग्म (काला तथा सफेद सुरमा), पद्या (पद्मचारिणी), कमल का केसर, मजीठ, जवासा, सेमल, सेमल की गोद, नमस्कारी (लज्जावन्ती), नागकेशर, सफेदचन्दन तथा धाय के फूल।

अम्बछादि गण—अम्बछा (पाठा), मुलहठी, लज्जावन्ती, पारसपीपल, पलाश, धमासा, लोघ, धाय के फूल, बेल की गिरी, सोनापाठा एवं कमल का केसर।