अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
उक्त दोनों गण पक्वातीसार को नष्ट करते हैं, अस्थिभंग को जोड़ते हैं, पित्तज विकारों में हितकर होते हैं तथा व्रणरोपण ( फोड़ा के घाव को भरने वाले ) होते हैं ॥ ३७-३९ ॥
मुस्तावचाग्निद्विनिशाद्वितित्ताभल्लातपाठात्रिफलाविषाख्याः ।
कुष्ठं वृटी हैमवती च योनिस्तन्यामयघ्ना मलपाचनाश्च ॥ ४० ॥
मुस्तादि गण—नागरमाथा, बालवच, चित्रक, हल्दी, दाहहल्दी, द्वितित्ता ( कुटकी, यवतित्ता ), भिलावा, पाठा, त्रिफला, विषाख्या ( अतिविषा = अतीस ), कूठ, इलायची तथा सफेद वच—यह गण योनिरोग तथा स्तन्यरोग को नष्ट करता है और यह मल का पाचन करता है ॥ ४० ॥
न्यग्रोधिपिप्लसदाफलरोधयुग्मं जम्बूद्वयार्जुनकपीतनसोमवलकाः ।
फक्षाप्रवजुलुपियाप्ललाशनन्दीकोलीकदम्बरिलामधुक् मधुकम् ॥ ४१ ॥
न्यग्रोधार्दिगणो व्रणः सङ्ग्राही भ्रम्रासधनः । मेदःपित्ताद्यतुद्वाहयोनिरोगनिबर्हणः ॥ ४१ ॥
न्यग्रोधादि गण—बरगद, पीपल, गूलर, लोघ, पठानीलोघ, जम्बूद्वय ( जामुन, कठजामुन ), अर्जुन, आमड़ा, कायफल ( काफल ), पाकर ( पिप्लन ), आम, वेत, चिरौजी, पलाश, पारसपीपल, बेर, कदम्बर, तेंदु, मुलेठी तथा महुआ—यह गण व्रण का शोधन एवं रोपण, ग्राही, टूटी हुई अस्थि को जोड़ने वाला, मेदोरोग, पित्तज रोग, रक्तविकार, तुषा, दाह तथा योनिरोगों का विनाशक है ॥ ४१-४२ ॥
एलायुग्मतुरुष्ककुष्ठफलिनीमांसीजलध्यामकं
स्पृक्काचोरकचोचपत्रतगरस्थोणेयजातीरसाः ।
शक्तिव्याघ्रनखोऽमराह्मगुहः श्रीवासकः कुङ्कुमं
चण्डागुग्गुलुदेवधूपखपुराः पुत्रागनागाहयम् ॥ ४३ ॥
एलादिको वातकफो विषं च विनियच्छति । वर्षणप्रसादनः कण्डूपिटिकाकोठनाशनः ॥ ४४ ॥
एलादि गण—एलायुग्म ( बड़ी इलायची, छोटी इलायची ), लोहवान या कुत्रिम गोद या रूमी मस्तगी, कूठ, गन्धप्रियंगु, जटामांसी, नेत्रबाला, सुगन्धितुण, स्पृक्का ( देवी ), ग्रन्थिपर्ण, दालचीनी, तेजपत्ता, तगर, धुनेर, बोल, सौप, नाबूना, देवदारु, अगुह, श्रीवासक ( गन्धाविरोजा ), केशर, चण्डा ( चोर नामक गन्धद्रव्य—वै.श.सि. ), गुग्गुल, राल, कुन्दरू, गोद, लाल नागकेसर तथा नागकेसर—यह गण वातज विकार, कफज विकार तथा विषज विकार को नष्ट करता है; वर्षण को स्वच्छ करता है, खुजली, पिडका तथा कौठ रोग को भी नष्ट करता है ॥ ४३-४४ ॥
श्यामादन्तीद्रवन्तीक्रमुककुटरणाशङ्खिनीचर्मसाहा-
स्वर्णधीरीगवाक्षीशखिरिजनकच्छिन्नरोहकारज्जाः ।
बस्तान्ती व्याधिघातो बहलबहुससतीक्ष्णवृक्षा फलानि
शयःमाद्यो हन्ति गुल्मं विषमश्चिकफो हृदुं मूत्रकृच्छ्रम् ॥ ४५ ॥
श्यामादि गण—काली निसोत, दन्ती ( जमाल्योटा ), द्रवन्ती ( मूसाकर्णी ), सुपारी, सफेद निसोत, यवतित्ता ( कालमेघ ), सातला, सत्यानाशो, इन्द्रायण, अपामार्क, कबीला, गुरुच, करंज, बस्तान्ती ( वृषगन्धा ), अमलतास, बहल ( बहुफल ), बहुस ( ईख ) तथा पीलु—यह गण गुल्मरोग, विषज विकार, भोजन के प्रति अरुचि, कफज विकार, हृदोग तथा मूत्रकृच्छ्ररोग को नष्ट करता है ॥ ४५ ॥
त्रयस्त्रिंशदिति प्रोक्ता वर्गस्तेषु त्वलाभतः । युज्यात्तद्विधमन्यच्च द्रव्यं जह्यादयौगिकम् ॥ ४६ ॥
द्रव्यग्रहण-निर्देश—यहाँ तक तैतीस द्रव्यवर्ग अर्थात् द्रव्यगण कहे गये हैं। इन गणों में परिगणित यदि कोई द्रव्य किसी कारण न मिल सके, तो वहाँ उसके समान गुण-धर्मों वाला दूसरा द्रव्य ले लेना