अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंशोधनादिगणसङ्ग्रहाध्यायः १५ ]
सूत्रस्थानम्
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चाहिए और यदि उस गण में कोई ऐसा द्रव्य हो जो रोग की दृष्टि से अयोग्य हो तो उसे निकाल देना चाहिए ॥ ४६ ॥
वक्तव्य —प्राचीन संहिताकारों ने इस प्रकार गणों का वर्णन कर मात्रा एवं दिशा निर्देश किया है। जो द्रव्य नहीं मिलता उसके स्थान पर प्रायः उसके समान गुण वाला द्रव्य लें। जो अनुपयोगी द्रव्य हो उसे हटा दें अथवा दूसरा कोई द्रव्य उपयोगी प्रतीत हो रहा हो तो उसे जोड़ दें। यह सब 'वृद्धवैद्योपदेशतः' अर्थात् उस-उस विषय में विशेष अनुभवों वैद्य को ही यहाँ 'वृद्ध' कहा है, न केवल आयु से बड़े को। इसकी चर्चा अत्यन्त भी की गयी है, जैसे—ज्यवनप्राश के निर्माण अष्टवर्ग में वैकल्पिक द्रव्यों का निर्देश मिलता है। इस मत का समर्थन भगवान् पुनर्वसु ने च.वि. ८।१४९ में किया है, इसका अवलोकन करें।
एते वर्गा द्रोषद्व्याघ्यपेक्ष्य कल्कक्वाथस्तेहेहादियुक्ताः।
पाने नत्येऽन्वासनेऽन्तर्बहिर्वा लेपाभ्यङ्गैर्जर्न्मिति रोगान् सुकृच्छ्रान् ॥ ४७ ॥
इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूत्रश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां
प्रथमे सूत्रस्थाने शोधनादिगणसङ्ग्रहो नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
प्रयोग-विधियाँ —इस अध्याय में कहे गये वर्गों (गणों) का वात आदि दोषों, रस-रक्त आदि द्रव्यों तथा मल-मूत्र आदि मलों के अनुरूप विचार करके इन्हें कल्क (चटनी), क्वाथ (काढ़ा), स्नेहपाक, लेह (अवलेह) आदि के रूप में तैयार करके पीने, सूँघने, अनुवासन तथा निरुह्ण बस्ति के रूप में भीतरी प्रयोग अथवा लेप, अभ्यंग आदि बाहरी प्रयोगों द्वारा कष्टसाध्य रोगों को भी नष्ट किया जा सकता है ॥ ४७ ॥
वक्तव्य —महर्षि वाग्भट ने उक्त गणों का संग्रह सु.सू. ३८ एवं ३९ से किया है। द्रव्यों के संग्रह में इन्होंने कहीं कुछ द्रव्य छोड़ दिये हैं और कहीं कुछ बढ़ा दिये हैं, यह अधिकार संग्रहकर्ता को प्राप्त है। अच्छा होता यदि वे औषध-द्रव्यों के रख-रखाव की विधि का भी उल्लेख कर देते, किन्तु वह नहीं किया है, अतः आप स्वयं देख लें—सु.सू. ३८।८१। सुश्रुत ने जो भेषजागार की विधि बतलाई है, उसे भी देखें—सु.सू. ३६।१७ और इसके अनुसार आप भी अपना भेषजागार बनायें। इसमें औषधद्रव्यों का संग्रह करके रखें।
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित
निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में
शोधनादिगणसंग्रह नामक पन्द्रहवाँ अध्याय समाप्त ॥ १५ ॥