भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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षोडशोऽध्यायः

अथातः स्नेहविधिमध्येयार्थं व्याख्यास्यामः ।

इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।

अब हम यहाँ से स्नेहनविधि नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। जैसा कि इस विषय में आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।

उपक्रम—शोधन आदि गणों के पश्चात् अब यहाँ स्नेहाध्याय का आरम्भ किया जा रहा है। क्योंकि शास्त्रीय परम्परा के अनुसार शोधन-चिकित्सा स्नेहन तथा स्वेदन करने के पश्चात् ही की जाती है, इसीलिए यहाँ स्नेहन तथा स्वेदन का उपक्रम किया जा रहा है।

संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—च.सू. १३; सु.चि. ३१ एवं अ.सं.सू. २५ में देखें।

गृहशीतसरस्निग्धमन्दसुधममुद्रद्वबम्। औषधं स्नेहनं प्रायो, विपरीतं विरुक्षणम्॥१॥

स्नेहन एवं रक्षण वर्णन—जो औषधद्वय गुरु, शीत, सर, स्निग्ध, मन्द, सुधम, मुद्र एवं द्रव होता है वह प्रायः स्नेहन होता है। जो औषध उक्त गुणों के विपरीत होता है, वह प्रायः रक्षण होता है॥१॥

वक्तव्य—भगवान् पुनर्वसु ने चरकसंहिता-सूत्रस्थान २२।११, १५-१६ में स्नेहन एवं रक्षण द्रव्यों का वर्णन किया है। स्नेह के सेवन की अनुशंसा सुश्रुत ने भी चिकित्सास्थान ३१।३ में की है, इन स्थलों का अवलोकन कर लें।

सर्पिर्मज्जा वसा तैलं स्नेहेषु प्रवरं मतम्। तत्रापि चोत्तमं सर्पिः संस्कारस्यानुवर्तनात्॥२॥

माधुर्यादविदाहित्वाज्जन्माद्येव च शीलनात्।

चार प्रकार के स्नेह—घी, मज्जा, वसा तथा तेल—ये चारों स्नेहों में उत्तम माने गये हैं।

घृत की प्रधानता—उक्त चार प्रकार के स्नेहों में घी सर्वश्रेष्ठ होता है, क्योंकि यह संस्कार के अनुकूल कार्य करता है। यह मधुर होता है, यह विदाहकारक नहीं होता। इसका सेवन जन्मकाल से ही किया जाता है॥२॥

वक्तव्य—उक्त स्नेहों का स्थावर-जंगम भेद से वर्गीकरण—तिलतैल, सार्षप तैल, एण्ड तैल आदि स्थावर स्नेह कहे जाते हैं। घी, वसा, मज्जा की योनि जंगम है, क्योंकि इनकी प्राप्ति जीवित तथा मृत प्राणियों से होती है। घी नामक स्नेह की उत्तमता का कारण एक और भी है कि इसका सेवन जन्मकाल से आरम्भ हो जाता है अथवा कर दिया जाता है। इसके लिए आप देखें—सु.शा. १०।१२, १३, १५ तथा ६८, ६९, ७०। इसके सेवन से शरीर, मेधा, बल एवं बुद्धि बढ़ती है।

पित्तज्नास्ते यथापूर्वमितरन्ना यथोत्तरम्॥३॥

स्नेहों के प्रमुख गुण—ये चारों स्नेह अन्त से आरम्भ की ओर उत्तम पित्तशामक होते हैं तथा उत्तरोत्तर कफ एवं वात दोष का शमन करने में उत्तम होते हैं॥३॥

घृतातैलं गुरु वसा तैलान्मज्जा ततोऽपि च।

उत्तरोत्तर गुरुता—घी से तेल, तेल से वसा तथा वसा से मज्जा ये उत्तरोत्तर पावन में गुरु होते हैं।

द्वाम्भ्यां त्रिभिश्चतुर्भिस्तैर्यमकस्त्रिवृतो महान्॥४॥