अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदोषभेदीयाध्यायः १२ ]
सूत्रस्थानम्
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अत्यासन्नातिदूरस्थं विप्रियं विकृतादि च । यदक्षणा बीक्ष्यते रूपं मिथ्यायोगः स दारुणः ॥ ३७ ॥ एवमत्युच्चपूत्यादीनिन्द्रियार्थान् यथाययम् । विद्यात्—
हीनयोग आदि का वर्णन—चक्षु ( नेत्र ) आदि इन्द्रियों का अपने रूप आदि विषयों के साथ थोड़ा संयोग अथवा संयोग का अभाव 'हीनयोग' कहा जाता है, अधिक योग को 'अतियोग' कहते हैं। चक्षुरिन्द्रिय द्वारा जो अतिसूक्ष्म, अधिक चमकीला, अतिभयानक, अतिसमीपस्थ, अतिदूरस्थ, अतिअप्रिय या अधिक विकार युक्त जो रूप देखा जाता है, वह चक्षुरिन्द्रिय का मिथ्यायोग कहा जाता है। यह अत्यन्त हानिकारक होता है। इसी प्रकार श्रोत्रेन्द्रिय, प्राणेन्द्रिय, रसनेन्द्रिय और स्पर्शनेन्द्रिय के भी अतियोग, हीनयोग, मिथ्यायोग की कल्पना कर लेनी चाहिए ॥ ३६-३७ ॥
—कालस्तु शीतोष्णवर्षाभेदात् त्रिधा मतः ॥ ३८ ॥
स हीनो हीनशीतादिरित्योगोऽतिलक्षणः । मिथ्यायोगस्तु निर्दिष्टो विपरीतस्त्वलक्षणः ॥ ३९ ॥
काल का वर्णन—काल तीन प्रकार का होता है—१. शीतकाल, २. उष्णकाल तथा ३. वर्षाकाल। जिस काल में उस ऋतु के थोड़े लक्षण दिखलायी पड़ते हैं, वह उस काल का हीनयोग है, जिसमें उस काल के अधिक लक्षण होते हैं, वह उस काल का अतियोग है और जिसमें उस काल के स्वाभाविक लक्षणों से विपरीत लक्षण होते हैं, वह उस काल का 'मिथ्यायोग' है ॥ ३८-३९ ॥
कायवाकृचित्भेदेन कर्मापि विभजते त्रिधा । कायादिकर्मणो हीना प्रवृत्तिर्हीनसंज्ञकः ॥ ४० ॥
अतियोगोऽतिवृत्तित्पु, वेगोदीरणधारणम् । विषमाङ्गक्रियारम्भपतनस्त्वलादिकम् ॥ ४१ ॥
भाषणं सामिभूक्तस्य रागद्वेषभयादि च । कर्म प्राणातिपातादि दशधा यच्च निन्दितम् ॥ ४२ ॥ मिथ्यायोगः समस्तोऽसाविह वाऽमुत्र वा कृतम् ।
कर्म का वर्णन—कर्म तीन प्रकार का होता है—१. कायकर्म, २. वाक्कर्म तथा ३. चित्तकर्म। कायकर्म आदि की स्वल्प वृत्ति का नाम 'हीनयोग', उसकी अत्यधिक वृत्ति का नाम 'अतियोग' एवं पूरीप आदि के वेगों को प्रेरित करना अथवा इनके वेगों को रोकना, हाथ-पैर आदि अंगों से विषम कर्म या कर्मों को करना, गिरना, फिसल जाना आदि कायकर्मों का मिथ्यायोग कहा गया है। आधा आहार निगला जा रहा हो, उस समय का बोलना वाक्कर्म का 'मिथ्यायोग' है। राग, द्वेष, भय तथा शोक आदि भाव 'चित्तकर्म' के 'मिथ्यायोग' हैं। प्राणातिपात ( आत्महत्या ) आदि कर्म, जिनका वर्णन अ.हू.सू. १।२२ में किया गया है, वे सब इस लोक अथवा उस लोक में किया गया काय, वाक् तथा चित्त के कर्मों का मिथ्यायोग है ॥ ४०-४२ ॥
वक्तव्य—इस विषय की चर्चा च.सू. ११, च.नि.१, च.शा. १।९८ में द्रष्टव्य है।
निदानमेतद्वोषाणां, कुपितास्तेन नैकधा ॥ ४३ ॥
कुर्वन्ति विविधान् व्याधीन् शाखाकोष्ठास्थिसन्धिषु ।
उपसंहार एवं रोगमार्ग—यह बात आदि दोषों के हीनयोग, अतियोग तथा मिथ्यायोग का निदान कह दिया गया है। ये बात आदि दोष कुपित हो जाने पर अनेक प्रकार के शाखागत, कोष्ठगत तथा अस्थिसन्धिगत रोगों को उत्पन्न कर देते हैं ॥ ४३ ॥
वक्तव्य—'शाखाकोष्ठास्थिसन्धिषु'—इनको महर्षि पुनर्वसु ने रोगमार्ग कहा है। देखें—'त्रयो रोग-मार्गाः' 'मार्ग आभ्यन्तरः' । ( च.सू. ११।४८ ) अर्थात् ये तीन रोगमार्ग हैं, जिनसे विविध प्रकार के रोगों का शरीर के भीतर प्रवेश होता है। इस प्रकरण में रक्त आदि धातुओं तथा त्वचा को भी शाखा संज्ञा प्रदान की गयी है।
शाखा रक्तादयस्त्वक् च बाहुरोगेनायनं हि तत् ॥ ४४ ॥
तदाश्रया मषव्यङ्गण्डालज्यर्बुदादयः । बहिर्भागाश्च दुर्निमगुलमशोफादयो गवाः ॥ ४५ ॥
१२ अ० ह०