अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
कालस्वभाव का वर्णन—यह सब काल (ऋतु) का स्वभाव है अथवा उसका प्रभाव है और यह आहार-विहार के प्रभाव से तत्काल या असमय में भी बात आदि दोषों का चय (संचय), प्रकोप अथवा प्रशम हो जाता है और कभी उक्त कालों में बात आदि दोषों का चय, कोप, प्रशम नहीं भी होता॥ २८॥
वक्तव्य—इन विषयों का विस्तृत वर्णन—सु.सू. ६ सम्पूर्ण में देखें।
व्याप्नोति सहसा देहमापादतलमस्तकम्॥ २९॥
निवर्तते तु कुपितो मलोऽल्पान् जलोघवत्॥
दोषों की व्याप्ति एवं निवृत्ति—कुपित हुआ दोष पैरों से लेकर चोटी तक अर्थात् सम्पूर्ण शरीर में सहसा (एकाएक) फैल जाता है, परन्तु जब वह शान्त होता है तो धीरे-धीरे पानी के बहाव की भाँति। वास्तव में यह स्थिति वातज विकारों की ही होती है, अन्य की नहीं॥ २९॥
नानारूपैरसङ्ख्येयैर्विकारैः कुपिता मलाः॥ ३०॥
तापयन्ति तन् तु तस्मात्तद्वेत्वाकृतिसाधनम्। शक्यं नैकैकशो वक्तुमतः सामान्यमुच्यते॥ ३१॥
निदान, रूप, चिकित्सा वर्णन—अपने प्रकोपक कारणों से कुपित हुए अनेक लक्षणों वाले वात आदि दोष अनशिनत रोगों द्वारा शरीर को पीड़ित कर देते हैं, अतएव प्रत्येक रोग के निदान, आकृति (पूर्वरूप तथा रूप) तथा साधन (चिकित्सा) का वर्णन यहाँ (सूत्रस्थान में) नहीं किया जा सकता, इसलिए यहाँ उनका सामान्य वर्णन कर दिया गया है॥ ३०-३१॥
दोषा एव हि सर्वेषां रोगाणामेककारणम्। यथा पक्षी परिपतन् सर्वतः सर्वमप्यहः॥ ३२॥
छायामत्येति नात्सीयां यथा वा कृत्स्नमप्यदः। विकारजातं विविधं त्रीन् गुणात्रातिवर्तते॥ ३३॥
तथा स्वधातुवैषम्यनिमित्तमपि सर्वदा। विकारजातं त्रीन् दोषान्—
रोगों की उत्पत्ति के कारण—सभी प्रकार के रोगों की उत्पत्ति के एक मात्र कारण वात आदि दोष ही हैं। जैसे—पक्षी दिनभर चारों ओर उड़ता हुआ भी अपनी छाया का अतिक्रमण नहीं कर पाता, अथवा (नूसरा उदाहरण देते हैं—) यह विकार-समूह अनेक प्रकार का होता हुआ भी सत्त्व, रजस् और तमस् इन तीनों गुणों का अतिक्रमण नहीं कर पाता; उसी प्रकार शरीर में स्थित वात आदि दोषों, रस आदि धातुओं तथा पुरोष आदि मलों की विषमता से उत्पन्न यह विकार (रोग) समूह वात आदि दोषों का भी अतिक्रमण नहीं कर सकता॥ ३२-३३॥
—तेषां कोपे तु कारणम्॥ ३४॥
अयैरसात्यैः संयोगः कालः कर्म च दुष्कृतम्। हीनातिमिथ्यायोगेन भिद्यते तत्पुनस्त्रिधा॥ ३५॥
दोषों के प्रकोप का कारण—उक्त वात आदि दोषों के कारण हैं—असात्य (प्रतिकूल) अर्थों (विषयों) के साथ इन्द्रियों का संयोग, काल (शीत, उष्ण आदि का प्रभाव) तथा दुष्कृत कर्मों का प्रभाव। फिर इन कारणों के भी तीन भेद होते हैं—हीनयोग, अतियोग और मिथ्यायोग॥ ३४-३५॥
वक्तव्य—महर्षि सुश्रुत ने इस सम्पूर्ण विषय को इस प्रकार कहा है—‘सर्वेषां’...‘व्याधिरिति’। (सु.सू. २४४) अर्थात् सब रोगों के मूल कारण वात, पित्त, कफ ही हैं। क्योंकि सभी रोगों में वात आदि दोषों के लक्षण दिखायी देते हैं तथा तदनुसार चिकित्सा करने से लाभ होता है। शास्त्र भी इस बात का समर्थन करता है। जिस प्रकार महत् आदि २४ तत्त्व जगत् रूप में स्थित होते हुए भी सत्त्व, रजस्, तमस् तत्वों से अलग नहीं होते, वैसे ही रोगों की भी स्थिति है। दोषों द्वारा रसादि धातुओं के दूषित होने से रस आदि की दूष्य संज्ञा हो जाती है। दोषज रोगों में यह रसज तथा यह रक्तज रोग है, इस प्रकार का व्यवहार होता ही है।
हीनोऽर्थेनन्दिश्यत्याल्पः संयोगः स्वेन नैव वा। अतियोगोऽतिसंसर्गः सूक्ष्मभासुरभैरवम्॥ ३६॥