अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंवोषादिविज्ञानीयाध्यायः ११ ]
सूत्रस्थानम्
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मूत्रं तु बस्तिनिस्तोदं कृतेऽप्यकृतसंज्ञताम् ॥ १३ ॥
मूत्रवृद्धि के लक्षण—विविध कारणों से बड़ा हुआ मूत्र बस्तिप्रदेश (मूत्राशय, मूत्रवहस्रोतस् तथा वृक्कों) में निस्तोद (जुभने की-सी पीड़ा) करता है। पेशाब (मूत्रत्याग) कर लेने पर भी ऐसा लगता है, मानो पेशाब नहीं किया हो। १३ ॥
स्वेदोऽतिस्वेदवर्गन्यकण्डूः—
स्वेदवृद्धि के लक्षण—विविध कारणों से बड़ा हुआ स्वेद (पसीना) शरीरभर में दुर्गन्ध तथा कण्डू (खुजली) पैदा कर देता है।
—एवं च लक्षयेत्। दूषिकादीनपि मलान् बाहुल्यगुरुतादिभिः ॥ १४ ॥
अन्य मलवृद्धि के लक्षण—इसी प्रकार अन्य शारीरिक मलों की वृद्धि के लक्षण भी होते हैं—दूषिका (नेत्रमल), आदि शब्द से नासिकामल, कर्णमल का ग्रहण भी कर लेना चाहिए। इन मलों के बड़ जाने से उन-उन मलमार्गों में भारीपन प्रतीत होता है। इस लक्षण को देखकर उनकी वृद्धि समझनी चाहिए ॥ १४ ॥
वक्तव्य—सुश्रुत ने ऊपर कहे गये मलों के अतिरिक्त आर्तव (मासिकधर्म), गर्भ तथा स्तन्य (स्तनों में होने वाले दूध) की भी गणना की है। देखें—सू.सू. १५।५। इनकी वृद्धि होने पर जो लक्षण होते हैं, उन्हें देखें—सू.सू. १५।१६। इसी के आगे इन बड़े हुए दोष, धातु तथा मलों को प्रकृतिस्थ करने के लिए संशोधन, संशमन आदि चिकित्साविधियों का निर्देश किया है। उक्त दोष, धातु एवं मलों की वृद्धि किस प्रकार होती है, इसका उत्तर देते हुए सुश्रुत कहते हैं—‘अपने कारणों को बढ़ाने वाले द्रव्यों का निरन्तर अधिक उपयोग करते रहने से’ और इन बड़े हुए दोष, धातु एवं मलों को प्रकृतिस्थ करने के लिए इनके प्रतिकूल द्रव्यों का क्रमशः सेवन करना चाहिए, क्योंकि ‘सामान्यतः क्रियायोगो निदानपरिवर्जनम्’। यह सूत्र रूप में इनकी चिकित्सा का वर्णन है।
लिङ्गं क्षोण्डनिलेऽङ्गुल्यं सादोऽल्पं भाषितेहितम्। संज्ञामोहस्तथा स्लेष्मवृद्ध्युक्तामयसम्भवः ॥
वातदोष के क्षय-लक्षण—वातदोष के क्षीण होने पर अर्थात् उसके सम अवस्था से क्षीण होने पर शरीरावयवों में थोड़ी शिथिलता, बोलने तथा शारीरिक चेष्टाओं में कमी, संज्ञामोह (ठीक न समझ पाना) तथा कफदोष के बढ़ने से होने वाले रोगों की उत्पत्ति का होना—ये लक्षण होते हैं ॥ १५ ॥
पित्ते मन्दोऽनलः शीतं प्रभाहानिः—
पित्तदोष के क्षय-लक्षण—पित्तदोष के क्षीण होने पर जठराग्नि की मन्दता, शीतता का अनुभव होना अथवा शरीर का शीतस्पर्श युक्त हो जाना तथा प्रभा (कान्ति) की कमी का होना—ये लक्षण होते हैं।
—कफे भ्रमः। स्लेष्माशयानां शून्यत्वं हृद्वद्वः शलथसन्धिता ॥ १६ ॥
कफदोष के क्षय-लक्षण—कफदोष के क्षीण होने पर भ्रम (चक्करों का आना), श्लेष्माशयों (सिर तथा उरसू आदि) में खालीपन का अनुभव होना, हृदय में कैपकैपी; पाठभेद—‘हृद्वादः’ के अनुसार हृदय सम्बन्धी रोग तथा सन्धियों में डीलापन—ये लक्षण होते हैं ॥ १६ ॥
रसे रौक्ष्यं श्रमः शोषो ग्लानिः शब्दासहिष्णुता।
रसधातु के क्षय-लक्षण—रसधातु के क्षीण होने पर शरीर में रूखापन, थकावट, शोष (सूखना), ग्लानि (हर्षक्षय) तथा शब्द के प्रति असहनशीलता (किसी की बात-चीत सुनने तथा सहने की इच्छा का न होना)—ये लक्षण होते हैं ॥ १६ ॥
रक्तेऽम्लशिशिप्रीतिशिराशैथिल्यरूक्षताः ॥ १७ ॥