भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अष्टाङ्गहृदय

रक्तधातु के क्षय-लक्षण—रक्तधातु के क्षीण होने पर खट्टे पदार्थों तथा शीतल पदार्थों के सेवन करने की इच्छा, सिराओं में शिथिलता का हो जाना तथा शरीर में रूक्षता की प्रतीति होना—ये लक्षण होते हैं ॥ १७ ॥

मांसेऽक्षग्लानिगण्डस्फिकशुष्कतासन्धिवेदनाः ।

मांसधातु के क्षय-लक्षण—मांसधातु के क्षीण होने पर इन्द्रियों में दुर्बलता ( निरुत्साहता ), गालों तथा चूतड़ों का पिचक या सूख जाना और सन्धियों में पीड़ा का होना—ये लक्षण होते हैं।

मेदसि स्वपनं कट्याः प्लीहो वृद्धिः कृशाङ्गता ॥ १८ ॥

मेदोधातु के क्षय-लक्षण—मेदोधातु के क्षीण होने पर कमर में संज्ञाशून्यता, प्लीहा का बढ़ जाना तथा शरीर का दुबला हो जाना—ये लक्षण होते हैं ॥ १८ ॥

अस्थ्यस्थितोदः शदनं दन्तकेशनखादिषु ।

अस्थिधातु के क्षय-लक्षण—अस्थिधातु के क्षीण होने पर हड्डियों में पीड़ा, दांत, बाल एवं नखों का गिरना तथा टूटना—ये लक्षण होते हैं।

अस्थ्नां मज्जननि सौषिर्ष्यं भ्रमस्तिमिरदर्शनम् ॥ १९ ॥

मज्जाधातु के क्षय-लक्षण—मज्जाधातु के क्षीण होने पर हड्डियों में सुषिरता ( खोखलापन ), चक्करों का आना, आँखों के सामने अँधेरा छा जाना—ये लक्षण होते हैं ॥ १९ ॥

शुक्ले चिरात् प्रसिच्यते शुक्लं शोणितमेव वा । तोदोऽत्यर्थं वृषणयोर्मधू धूम्यातीव च ॥ २० ॥

शुक्रधातु के क्षय-लक्षण—शुक्रधातु के क्षीण होने पर स्त्री-सहवास काल में देर से शुक्र का निकल पाना अथवा शुक्र के स्थान में रक्तधातु का निकलना, वृषणों ( अण्डकोषों ) में अत्यन्त पीड़ा का होना, लिंग में से धुआँ-सा निकलना—ये लक्षण होते हैं ॥ २० ॥

पुरीये वायुरन्वाणि सशब्दो वेद्ययन्त्रिव । कुक्षीं भ्रमति यात्यूर्ध्वं हृत्पाश्चं पीडयन् भृशम् ॥ २१ ॥

पुरीषक्षय के लक्षण—पुरीष के क्षीण होने पर वातदोष गुड़गुड़ाहट शब्द करता हुआ मानो अंतर्द्वियों को लपेटता हुआ पेट भर में घूमता है, हृदय एवं पसलियों में अत्यन्त पीड़ा करता हुआ ऊपर की ओर जाता है ॥ २१ ॥

मूत्रेऽल्पं मूत्रयेत्कृच्छ्राद्विर्णं साध्रमेव वा ।

मूत्रक्षय के लक्षण—मूत्र के क्षीण होने पर मूत्र बहुत कम मात्रा में कष्ट के साथ निकलता है। उसका वर्ण विकारयुक्त होता है अथवा उसमें रक्त मिल जाता है।

स्वेदे रोमच्युतिः स्तब्धरोमता स्फुटनं त्वचः ॥ २२ ॥

स्वेदक्षय के लक्षण—स्वेद के क्षीण होने पर रोम ( रोये ) झड़ने लगते हैं अथवा सूअर के बालों े कड़े हो जाते हैं, त्वचा फटने लग जाती है ॥ २२ ॥

मलानामतिसूक्ष्माणां दुर्लक्ष्यं लक्ष्येतु क्षयम् । स्वमलायनसंशोषतोदशून्यत्वलाघवैः ॥ २३ ॥

अन्य मलों के क्षय-लक्षण—कान आदि के मलों के क्षीण होने पर ये कान आदि के मल अत्यन्त सूक्ष्म होते हैं, अतः इनका क्षय सरलता से मालूम नहीं किया जा सकता। फिर भी उनके क्षयों को कान, आँख आदि, जिनसे वे निकला करते हैं, के सूख जाने से तथा उनमें होने वाले तोद ( चुभन ) से, शून्यता से तथा लाघव ( हलकापन की प्रतीति ) से जान लेना चाहिए ॥ २३ ॥

दोषादीनां यथास्वं च विद्याद्वृद्धिक्षयीं भिषक् । क्षयेण विपरीतानां गुणानां वर्धनेन च ॥ २४ ॥

वृद्धिं मलानां सङ्गान्व्यं क्षयं चाति विसर्गतः ।