अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदोषादिविज्ञानीयाध्यायः ११ ]
सूत्रस्थानम्
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वृद्धि एवं क्षय निर्देश—वात आदि दोषों, रस आदि धातुओं तथा पुरीष आदि मलों की वृद्धि एवं क्षय को चिकित्सक इस प्रकार जानें—दोष आदि के विपरीत गुणों एवं कर्मों के क्षय से उनकी वृद्धि समझे और उनके विपरीत गुणों को बढ़ता हुआ देखकर उनका क्षय समझे। मलों के संग ( भीतर रुक जाने ) से मलों की वृद्धि समझे और मलों के अधिक निकल जाने से उन ( मलों ) का क्षय समझे ॥ २४ ॥
मलोचितत्वाद्देहस्य क्षयो वृद्धेस्तु पीडनः ॥ २५ ॥
पुरीषादि मलों का महत्त्व—पुरीष आदि मल शरीर के लिए उचित ( उपयोगी ) होते हैं। अतएव उन ( मलों ) के क्षय अथवा वृद्धि होने से अधिक कष्ट होता है ॥ २५ ॥
वक्तव्य—आप अतिसाररोग में देखें—इसमें मल का क्षय होना आरम्भ होते ही हट्टा-कट्टा पुरुष भी देखते-देखते धराशायी हो जाता है। अतएव सुश्रुत ने कहा है—‘दोषधातुमलमूलं हि शरीरम्’ ( सु.सू. १५।३ ) इसका व्याख्यान वहीं देख लें।
तत्रास्थनि स्थितो वायुः, पित्तं तु स्वेदरक्तयोः । श्लेष्मा शेषेषु, तेनैषामाश्रयाश्रयिणां मिथः ॥
यदेकस्य तदन्यस्य वर्धनक्षपणौषधम् । अस्थिमास्तयोर्नैवं, प्रायो वृद्धिं तर्पणात् ॥ २७ ॥
श्लेष्मणाऽनुता तस्मात् सङ्घस्तद्विपर्ययात् । वायुनाऽनुताऽस्मान्च वृद्धिक्षयसमुद्भवान् ॥
विकारात् साधयेच्छीघ्रं क्रमाल्लङ्घनबृंहणैः ।
वात आदि के विशिष्ट स्थान—अस्थियों में वातदोष, स्वेद एवं रक्त में पित्तदोष और शेष रस तथा मांस आदि धातुओं में कफदोष रहता है। अतएव वात आदि दोषों तथा रस आदि धातुओं में आश्रय एवं आश्रयी सम्बन्ध है। यही कारण है कि आश्रय ( अस्थि आदि ) एवं आश्रयी ( वात आदि ) की आपस में जो औषधि एक ( आश्रय ) को बढ़ाती है, वह दूसरे आश्रयी ( वातदोष ) को भी बढ़ाती है। इसी प्रकार जो औषधि या आहार-विहार एक को क्षीण करती है, वह दूसरे को भी क्षीण करती है। परन्तु अस्थि आश्रय और वायु आश्रयी में उक्त लक्षण चरितार्थ नहीं होता, क्योंकि वृद्धि में तर्पण ( तृप्ति ) क्रिया की प्रधानता रहती है, वह क्रिया कफदोष के अनुकूल होती है। इसलिए वृद्धि के कारण होने वाले रोगों में लंघन अर्थात् अपतर्पण से और क्षय से उत्पन्न होने वाले रोगों में रोगशान्ति के लिए बृंहणक्रिया करनी चाहिए, जिससे शीघ्र ही विकारों की शान्ति हो सके ॥ २६-२८ ॥
वायोरन्यत्र, तज्जास्तु तैरबोक्त्रमयोजितैः ॥ २९ ॥
वातजरोग-प्रतिकार—वायुजनित विकारों में उक्त परिभाषा अनुकूल नहीं होती है। वातज रोगों अर्थात् वातवृद्धि से उत्पन्न रोगों की चिकित्सा लंघन ( अपतर्पण ) से करनी चाहिए ॥ २९ ॥
वक्तव्य—उक्त २६ से २८ तक के पद्यों का भाव स्पष्ट करने की दृष्टि से च.सू. २२ तथा २३ अध्यायों का अध्ययन करें। कहने का तात्पर्य यह है कि सन्तर्पणविधि से शरीर एवं रस आदि धातुओं की वृद्धि होती है। साथ ही वातदोष का क्षय होता है और अपतर्पण ( लंघन ) से सभी का क्षय होता है, किन्तु वातदोष की वृद्धि होती है। यही कारण है कि अस्थि आश्रय और वातदोष आश्रयी की चिकित्सा समान नहीं होती है। आगे चलकर श्रीवाग्भट ने अ.हू.सू.१४।७ में इसी विषय की व्याख्या की है, उसे अवश्य देखें।
विशेषाद्वक्तवृद्धयुत्थानं रक्तसूतिविरचनैः । मांसवृद्धिभवान् रोगान् शत्रुक्षारारित्रिकर्मभिः ॥ ३० ॥
स्थौल्यकाशयंपचारणे मेदोजानस्थिसङ्घयात् । जातान्क्षीरघृतेस्तित्कसंयुतेर्वस्तिभित्तया ॥ ३१ ॥
विद्ववृद्धिजनतीसारक्रियया, विट्क्षयोद्भवान् । मेपाजमध्यकुल्माषयवमाषद्वयादिभिः ॥ ३२ ॥
मूत्रवृद्धिक्षयोत्थांश्च मेहकृच्छ्रचिकित्सया । व्यायामाभ्यजन्नस्वेदमद्यैः स्वेक्षयोद्भवान् ॥ ३३ ॥
वृद्धरक्तादि की चिकित्सा—विशेष कर के रक्तधातु की वृद्धि होने से उत्पन्न रोगों को रक्तप्रावण तथा विरचन योगों से शान्त करें। मांसधातु की वृद्धि से होने वाले रोगों की चिकित्सा शत्रुकर्म, क्षारकर्म तथा अत्रिकर्म है। मेदोधातु की वृद्धि से उत्पन्न हुए रोगों की चिकित्सा कुशताकारक योगों से करनी चाहिए।