अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
‘यन्नाशे नियतं नाशो’—जिस ओजस् के नाश से निश्चित रूप से मृत्यु हो जाती है। ‘ओजस्’ तत्त्व के न रहने पर जीवित पुरुष को ‘जीवनमृत’ कहा जा सकता है, क्योंकि ओजस् के बिना उसमें पुरुषत्व का अभाव हो जाता है। यदि मर गया तो फिर कहना ही क्या है। आज का जिज्ञासु छात्र शबन्धेद के समय उस मृत देह में यदि ओजोघातु को खोजता है तो उसकी भूल है, क्योंकि वह केवल ओजस्वी पुरुष में ही रहता है, दूसरों में नहीं। ओजस् के गुणों का वर्णन सुश्रुत-सू. १५११ में देखें।
ओजोवृद्धौ हि देहस्य तुष्टिपुष्टिबलोदयः ॥ ४१ ॥
ओजोवृद्धि के लक्षण—जीवनीय द्रव्य आदि के सेवन करने से ओजस् की वृद्धि होने पर देह स्थित मन या देही प्रसन्न (सन्तुष्ट) रहता है, शरीर पुष्ट होकर बल (ओजस्) का उदय होता है ॥ ४१ ॥
वक्तव्य—आचार्य शाङ्कधर ने ओजस् को शुक्र का उपघातु स्वीकार किया है। यही कारण है कि ऊपर ४१वें श्लोक में ओजःक्षय-चिकित्सा में जिन द्रव्यों के सेवन करने का महर्षि वाग्भट ने निर्देश दिया है, उनसे पहले शुक्रघातु की पुष्टि होती है, उसके साथ-ही-साथ ओजस् की भी पुष्टि होती है।
यदत्रं द्वेष्टि यदपि प्रार्थयेताविरोधि तु। तत्तत्पजन् समश्रनंश्च तौ तौ वृद्धिक्षयो जयेत् ॥ ४२ ॥
वृद्धि-क्षय का चिकित्सासूत्र—जिस विरोधी अन्न (आहार) से मनुष्य द्वेष करता है अर्थात् जिस आहार का वह सेवन करना नहीं चाहता है, उसको छोड़ता हुआ उस-उस दोष, घातु एवं मल की वृद्धि को जीत लेता है अर्थात् उसे बढ़ने नहीं देता। जिस अविरोधी आहार का वह सेवन करना चाहता है और उसका सेवन करता हुआ मनुष्य उस-उस दोष, घातु, मल के क्षय पर वह विजय प्राप्त कर लेता है ॥ ४२ ॥
कुर्वते हि रुचिं दोषा विपरीतसमानयोः। वृद्धाः क्षीणाश्च भूयिष्ठं लक्षयन्त्यबुधास्तु न ॥ ४३ ॥
द्वेष एवं प्रार्थना का कारण—बढ़े हुए दोष प्रायः अपने से विपरीत गुणवाले आहारों के सेवन की इच्छा को प्रकट करते हैं और क्षीणता को प्राप्त हुए दोष प्रायः समान गुण वाले आहारों का सेवन करने की इच्छा रखते हैं। इस वास्तविकता को शास्त्र को न जानने वाले पुरुष नहीं समझ पाते, बुद्धिमान् इसे समझ जाते हैं ॥ ४३ ॥
वक्तव्य—उक्त परिभाषा के अन्तर्गत न केवल दोषों का ही समावेश होता है अपितु रस आदि घातुओं तथा पुरीष आदि मलों का भी समावेश कर लेना चाहिए। इस प्रसंग में च.शा. ६१ गद्य को देखें। अर्थात् शरीरस्थ घातुएँ समान गुण अथवा समान गुणबहुल आहार-विहार के निरन्तर सेवन करने से बढ़ती हैं और इसके विपरीत अथवा विपरीत गुणबहुल आहार-विहार से क्षीण होती हैं। दूसरा कारण यह भी है—‘सर्वदा सर्वभावानां सामान्यं वृद्धिकारणम्। ह्लासहेतुविशेषश्च, प्रवृत्तिरुभयस्य च’ ॥ (च.सू. १।४४) अर्थ स्पष्ट है। आप उक्त ४३वें पद्य का भाव इस प्रकार समझें—जब मानव भरपेट भोजन किया रहता है तब वह भोजन से द्वेष करता है और जब भोजन का क्षय हो जाता है, तब वह भोजन करने की इच्छा प्रकट करता है इत्यादि।
यथाबलं यथास्वं च दोषा वृद्धा वितन्वते। रूपाणि, जहति क्षीणाः, समाः स्वं कर्म कुर्वन्ते ॥ ४४ ॥
अवस्थानुसार दोषों के कर्म—बढ़े हुए दोष अपनी शक्ति के अनुसार अपने रूपों (लक्षणों) का विस्तार करते हैं। घटे हुए अर्थात् क्षीण दोष अपने लक्षणों (गुण-कर्मों) का त्याग करते हैं और सम दोष (इसी अध्याय के ४थे श्लोक के अनुसार) अपना-अपना कर्म करते रहते हैं ॥ ४४ ॥
य एव देहस्य समा विवृद्ध्यै त एव दोषा विषमा वधाय।
यस्मादतस्ते हितचर्यैव क्षयाद्विवृद्धेरिव रक्षणियाः ॥ ४५ ॥
इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसुतुभ्रिमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां
प्रथमे सूत्रस्थाने दोषादिविज्ञानीयो नामकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥