अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदोषादिविज्ञानायाध्यायः ११ ]
सूत्रस्थानम्
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वृद्धि-क्षय का दूसरा स्वरूप—बढ़ा हुआ रसधातु रक्तधातु को बढ़ा सकता है या बढ़ा देता है, इसी प्रकार अन्य धातुओं को भी समझें। ऐसे ही क्षीण रसधातु रक्त को भी क्षीण कर सकता है या कर देता है। इसी क्रम से अन्य धातुओं को भी समझें। इन सभी धातुओं को तुष्ट करने वाला 'अन्नपानरस' होता है। अतएव आगे कहा गया है—'तेषां क्षयवृद्धौ शोणितनिमित्ते'। (सु.सू.—१४२१) अर्थात् रक्त से लेकर शुक्ल तक के धातुओं की क्षय-वृद्धि का निमित्त कारण रक्त है।
दोषा दुष्टा रसेर्धातून् दूषयन्त्युभये मलान्॥ ३५॥
अधो द्वे, सप्त शिरसि, खानि स्वेदबहानि च। मला मलायनानि स्युर्थयास्व तेष्वतो गदाः॥ ३६॥
दोष, धातु, मल एवं द्रोतों की दुष्टि—वात आदि दोष मधुर आदि छः रसों द्वारा दुष्ट होकर रस आदि सात धातुओं को दूषित कर देते हैं और वे दोनों (दोष एवं धातु) पुरीष आदि मलों को दूषित कर देते हैं। वे मल अपने-अपने मलमार्गों को दूषित कर देते हैं, जिनके फलस्वरूप उन स्थानों में विविध प्रकार के रोग हो जाते हैं।
मलायनो न्ना परिचय—नीचे के भाग में दो (१. मल एवं २. मूलमार्ग), शिरःप्रदेश में सात (कानों के द्रोत २, नासारन्ध्र २, नेत्र २ तथा मुख १) तथा स्वेदवाही असंख्य रोमकूप॥ ३५-३६॥
वक्तव्य—'यथास्व' अर्थात् जो जिसका स्थान है, उस-उस में उससे सम्बन्धित रोग होते हैं। वातज रोग वायु के, पित्तज रोग पित्त के तथा कफज रोग कफ के स्थानों (आशयों) में। रस आदि धातुओं के रोग उन-उन धातुओं में होते हैं। मलों के रोग अपने मलायनो में होते हैं।
ओजस्तु तेजो धातूनां शुक्रान्तानां परं स्मृतम्। हृदयस्थमपि व्यापि देहस्थितिनिबन्धनम्॥ ३७॥ स्निग्धं सोमात्मकं शुद्धमीषल्लोहितपीतकम्। यत्राशे नियतं नाशो यस्मिंस्तिष्ठति तिष्ठति॥ निष्पद्यन्ते यतोः भावा विविधा देहसंश्रयाः।
ओजस् का वर्णन—रस से शुक्र-पर्यन्त समस्त धातुओं का सर्वश्रेष्ठ तेजस् 'ओजस्' है। वह हृदय में स्थित रहने पर भी सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त रहता है। वह शरीर-स्थिति का आधार है। वह स्निग्ध, सोमगुणयुक्त, शुद्ध तथा लाल-पीला वर्ण वाला है। जिसका नाश होने पर मनुष्य की मृत्यु हो जाती है और जिसके रहने पर मनुष्य जीवित रहता है। जिसके रहने के कारण विविध प्रकार के कान्ति, पराक्रम आदि भाव मनुष्य में देखे जाते हैं॥ ३७-३८॥
ओजः क्षीयेत कोपशुद्ध्यानशोकश्रमादिभिः॥ ३९॥
विभेति दुर्बलोऽभीक्षणं ध्यायति व्यथितेन्द्रियः। दुःच्छायो दुर्भना रूक्षो भवेत्क्षामश्च तत्क्षये॥ जीवनीयोपधक्षीररसाद्यास्तत्र भेषजम्।
ओजःक्षय के कारण—क्रोध, भूख, चिन्ता, शोक तथा परिश्रम आदि कष्टों से ओजस् का क्षय हो जाता है।
ओजःक्षय के लक्षण—इसके क्षीण होने पर मनुष्य दूसरों से डरता है, दुर्बल हो जाता है, बार-बार अधिक चिन्ता करने लगता है, उसकी इन्द्रियाँ दुःखित हो जाती हैं, वह कान्ति रहित हो जाता है, उसका मन दुःखी हो जाता है, शरीर रूक्ष हो जाता है और वह कुश (दुबला) हो जाता है।
ओजःक्षय की चिकित्सा—इसमें जीवनीय गण में परिगणित द्रव्यों का सेवन, दूध का सेवन, मांसरस आदि बलवर्धक द्रव्यों का निरन्तर सेवन करते रहना चाहिए; यही इसकी उत्तम चिकित्सा है॥ ३९-४०॥
वक्तव्य—सुश्रुत ने इसका वर्णन विस्तार से किया है। देखें—सु.सू.१५।१९ से ३१ तक तथा च.सू.१७।७३-७७। आगे चलकर सुश्रुत ने ओजस् को 'बल' संज्ञा दी है। देखें—'त्रयो दोषा बलस्योक्ताः'। (सु.सू. १५।२५) इसके पहले २०वें गद्य में भी इसे 'बल' कहा गया है।