अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदोषभेदीयाध्यायः १२ ]
सूत्रस्थानम्
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आलोचक पित्त का वर्णन—जो पित्त दृष्टिगण्डल में रहता है, उसे आलोचक पित्त कहते हैं। यह पित्त रूप (स्वरूप, आकार या वर्ण) को देखने में उपयोगी (सहायक) होता है।
—त्वकस्यं भ्राजकं भ्राजनात्त्वचः ॥ १४ ॥
भ्राजक पित्त का वर्णन—जो पित्त सबसे बाहरी अतएव प्रथम (अवभासिनी) त्वचा में रहता है वह त्वचा को कान्तियुक्त करता है, इसीलिए इसे 'भ्राजक पित्त' कहते हैं ॥ १४ ॥
वक्तव्य—त्वचागत द्रव में जो पीलापन दिखलायी देता है, यही भ्राजक पित्त है। इसी से त्वचा में चमकीलापन दिखलायी देता है।
श्लेष्मा तु पञ्चधा—
कफ का वर्णन—शरीर में कफ भी पाँच प्रकार का होता है—१. अवलम्बक, २. क्लेदक, ३. बोधक, ४. तर्पक तथा ५. श्लेषक—ये उसके नाम हैं।
—उरस्यः स त्रिकस्य स्ववीर्यतः । हृदयस्यान्नवीर्याच्च तत्स्य एवाम्बुक्कर्मणा ॥ १५ ॥
कफधात्मां च शेषाणां यत्करोत्यवलम्बनम् । अतोऽबलम्बकः श्लेष्मा—
अवलम्बक कफ का वर्णन—जो कफ उरःप्रदेश में रहता है वह अपनी शक्ति से त्रिकास्थि का तथा आहार से हृदय का अवलम्बन (सहारा) करता है और वहाँ (हृदय में) रहकर जलकर्म द्वारा आमाशय आदि दूसरे कफस्थानों की भी सहायता (अवलम्बन) करता है, अतएव इसे 'अवलम्बक' कहा जाता है ॥ १५ ॥
वक्तव्य—'पञ्चमहाभूतशरीरिसमवायः पुरुषः' । (सु.सू. १।२२) के अनुसार शरीर में स्थित जल तत्त्व 'कफ' की संज्ञा है। इसी को श्लेष्मा भी कहते हैं। देखें—सु.सू. २१।१४। इस प्रकार ये वात-पित्त-कफ क्रमशः यहाँ वायु, अग्नि एवं जल तत्त्वों के प्रतिनिधि हैं; इन्हीं से शरीर की उत्पत्ति होती है। देखें—'वातपित्तश्लेष्माण एव देहसम्भव हेतवः' । (सु.सू. २१।३) ध्यान रहे, जलतत्व में कुछ अंश पृथिवी तत्व का भी होता है, अतएव इसमें स्थिरता तथा गुठ्ठा बनी रहती है।
—यत्स्वामाशयसंस्थितः ॥ १६ ॥
क्लेदकः सोऽन्नसङ्गतक्लेदनात्—
क्लेदक कफ का वर्णन—जो कफ आमाशय में रहकर अपना कार्य करता है वह अन्न (आहार-समूह) को गीला करता है, अतः इसे 'क्लेदक' कहते हैं ॥ १६ ॥
—रसबोधनात् । बोधको रसनास्थायी—
बोधक कफ का वर्णन—जो कफ रसना (जीभ) में रहता है वह वहाँ रहकर मधुर आदि रसों का बोध कराता है, अतएव उसे 'बोधक' कहते हैं।
—शिरःसंस्थोऽक्षतर्पणात् ॥ १७ ॥
तर्पकः—
तर्पक कफ का वर्णन—जो कफ सिर (मस्तिष्क) में रहता है वह सभी ज्ञानेन्द्रियों का तर्पण करता है अर्थात् इन्द्रियों को अपने सहयोग से नुप्त करता है, अतएव इसे 'तर्पक' कहते हैं ॥ १७ ॥
—सन्धिंसंश्लेषाच्छ्लेषकः सन्धिषु स्थितः ।
श्लेषक कफ का वर्णन—जो कफ शरीर के सन्धिस्थलों में रहता है वह सन्धियों को सटाता है, अतः उसे 'श्लेषक' कहते हैं।
वक्तव्य—यहाँ एक-एक वात, पित्त, कफ के पाँच-पाँच नाम रखकर जो उनका परिचय दिया गया है, वह उनके कार्यक्षेत्रों के नाम हैं। जैसे एक ही व्यक्ति सम्बन्ध-विशेष से पिता, चाचा, मामा, भाई