भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अष्टाङ्गहृदये

समानवायु का वर्णन—समानवायु पाचकाग्नि के समीप रहता है। यह कोष्ठप्रदेश में चारों ओर घूमता रहता है। यह आमाशय से अन्न को लेता है, फिर उसे पचाता है, उसकी विवेचना करता है और उस पके हुए आहार में से रस, मल तथा मूत्र को अलग-अलग करके उन्हें वयास्थान छोड़ देता है ॥८॥

अपानोऽपानगः श्रोणिबस्तिमेद्वोरुगोचरः । शुकार्तवशकृन्मूत्रगर्भनिष्क्रमणक्रियः ॥९॥

अपानवायु का वर्णन—अपानवायु प्रधानरूप से अपान (गुद) प्रदेश में रहता है। सामान्य रूप से कमर, बस्ति (मूत्राशय एवं मूत्रवाही श्रोतों), मेहन (मूत्रमार्ग) तथा ऊरुओं में पाया जाता है और यही शुक्र, आर्तव, मल, मूत्र, गर्भाशय से गर्भ को समय पर बाहर निकालना भी इसी का कार्य है ॥९॥

पित्तं पञ्चवात्सकं—

पित्त के पाँच भेद—पित्त के पाँच भेद इस प्रकार हैं—१. पाचक, २. रंजक, ३. साधक, ४. आलोचक तथा ५. भ्राजक।

—तत्र पञ्चमाशयमध्यगम्। पञ्चभूतात्सकत्वेऽपि यत्तैजसगुणोदयात् ॥१०॥

त्यक्तद्रवत्वं पाकादिकर्मणाऽनलशब्दितम्। पचत्यन्नं विभजते सारकिट्टौ पृथक् तथा ॥११॥

तत्रस्थमेव पित्तानां शेषाणामप्यनुग्रहम्। करोति बलदानेन पाचकं नाम तत्समूतम् ॥१२॥

पाचक पित्त का वर्णन—उक्त पाँच पित्तों में जो पित्त पञ्चमाशय तथा आमाशय के मध्यभाग (क्षुद्रान्न) में गतिशील होता है और जो पञ्चमहाभूतात्सक होने पर भी तैजस् (आग्नेय) गुण की प्रधानता के कारण जिसने अपना द्रव स्वरूप छोड़ कर कठिन (अग्नि) रूप धारण कर लिया है और पाचन आदि कर्मों को करने के कारण जो अग्नि संज्ञा को धारण कर लिया है। जो खाये हुए आहार को पचाता है तथा सार (रस) एवं किट्ट (मल-मूत्र) को विभाजित करता है। वही रहकर रंजक आदि पित्तों को जो शक्ति प्रदान करके उनके ऊपर कृपा करता है, उसे 'पाचक पित्त' कहते हैं ॥१०-१२॥

आमाशयाश्रयं पित्तं रंजकं रसरंजनात्।

रंजक पित्त का वर्णन—जो पित्त आमाशय में रहता है, वह रस को रंग देने के कारण रंजक पित्त कहा जाता है।

वक्तव्य—सुश्रुत के अनुसार—'स खलु आप्यो रसो यकृत्-प्लीहानी प्राप्य रागमुपैति'। (सु.सू. १४४) अर्थात् शरीर का पोषक रसघातु ही यकृत-प्लीहा में पहुँचकर ललिमा को प्राप्त हो जाता है। और भी देखें—'यत्तु यकृत्प्लीहोः पित्तं तस्मिन् रंजकोऽग्निरिति संज्ञा'। (सु.सू. २१॥१०) अर्थात् जो पित्त यकृत-प्लीहा में रहता है, उसका नाम 'रंजक पित्त' है। इस दृष्टि से महर्षि वाग्भट का यह पाठ 'आमाशयाश्रयं पित्तं रंजकं' समुचित प्रतीत नहीं होता। यहाँ वाग्भट का उक्त कथन आधुनिक विचारों से प्रभावित है, ऐसा लगता है। देखें—यह आमाशयाश्रय पित्त 'हाइड्रोक्लोरिक अम्ल' नामक वह आमाशयिक रस है जो पित्त की भाँति खाये हुए आहार को पचाने में सहायक होता है और उसके मिश्रण से यकृत-प्लीहा में पहुँचने पर वही रस राग को पाकर रक्त का रूप धारण कर लेता है। यही चरितार्थता है वाग्भट के उक्त वचनों की।

बुद्धिमेधाभिमानाद्यैरभिप्रेतार्थसाधनात् ॥१३॥

साधकं हृन्नतं पित्तं—

साधक पित्त का वर्णन—जो पित्त हृदय में रहता है, उसे 'साधक पित्त' कहते हैं। यह पित्त बुद्धि, मेधा, अभिमान (अहंकार) आदि द्वारा इच्छित पदार्थों की सिद्धि करता है ॥१३॥

—रूपालोचनतः स्मृतम्। दूकस्थमालोचकं—