भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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वोषभेदीयाध्यायः १२ ]

सूत्रस्थानम्

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रहता है और पाँचवीं त्वचा का नाम 'वेदनी' है, इसी को स्पर्शनेन्द्रिय भी कहते हैं। वास्तव में बात का स्थान यही है, इसी से शीत-उष्ण स्पर्श का ज्ञान होता है।

उरःकण्ठशिरःक्लोमपर्वण्यामाशयो रसः । मेदो घ्राणं च जिह्वा च कफस्य, सुतरामुरः ॥ ३ ॥

कफ के प्रमुख स्थान—उरु ( छाती ), कण्ठ, सिर, क्लोम, पर्व ( सन्धियों ), आमाशय, रसधातु, मेदोधातु, घ्राण ( नासिका ) तथा जीभ ये सब कफ के स्थान हैं। प्रमुख रूप से कफ का स्थान उरुस् है ॥ ३ ॥

वक्तव्य—सुश्रुत ने शरीरसंख्याव्याकरण नामक ५वें अध्याय के ५वें गद्य में जो त्वचा से स्रोतों तक के अवयवों की गणना की है, उसमें हृदय तथा फुफ्फुस आदि का समावेश किया गया है। अष्टाङ्गहृदय में इसका वर्णन शारीरस्थान अध्याय ३ में देखें। ये सब कफ के स्थान हैं।

प्राणदिभेदात्पञ्चात्मा वायुः—

बात के पाँच भेद—प्राण, उदान, व्यान, समान तथा अपान भेद से यह बात पाँच प्रकार का होता है।

—प्राणोऽत्र मूर्धगः । उरःकण्ठचरो बुद्धिहृदयेन्द्रियचित्तधृक् ॥ ४ ॥

छीवनक्षत्रयुद्धारनिःश्वासान्नप्रवेशकृत् ।

पाँच बातों का वर्णन—उक्त पाँच बातों में प्राण नामक वायु शिरःप्रदेश में गतिशील रहता है। कण्ठ तथा उरःप्रदेश में उदानवायु विचरण करता हुआ बुद्धि, हृदय, सभी इन्द्रियों एवं मन को धारण करता है। यह छीवन ( थूकना तथा लालासाव ), छींक, उद्गार, निःश्वास तथा अन्नप्रवेश ( मुख से अन्न को भीतर ) की ओर ढकैलना कर्मों को करता है ॥ ४ ॥

वक्तव्य—चरक ने 'उत्तमाङ्ग' शिरःप्रदेश का वर्णन इस प्रकार किया है—'प्राणाः प्राणभूता यत्र श्रिताः सर्वेन्द्रियाणि च । यदुत्तमाङ्गमङ्गानां शिरस्तदभिधीयते' ॥ ( च.सू. १७।१२ ) अर्थात् जहाँ प्राणियों के प्राण तथा सभी इन्द्रियाँ आश्रित रहती हैं और जो सभी अंगों में उत्तम अंग है, उसे सिर कहते हैं। सुश्रुत ने जबु के ऊपरी भाग में स्थित गरदन सहित अंगों को सिर कहा है और यह ३७ मर्मा का अधिष्ठान है। देखें—'जबुण'***अधिपतिरिति' । ( सु.शा. ६।६ )

उरःस्थानमुदानस्य नासानाभिंगलांश्चरेत् ॥ ५ ॥

वाक्प्रवृत्तिप्रयत्नोर्जाबलवर्णस्मृतिक्रियः ।

उदानवायु का वर्णन—उदानवायु का प्रमुख स्थान उरुस् ( छाती ) है। वह वायु नासिका ( नाक ), नाभि ( इसका परिचय श्लोक २ के वक्तव्य में ऊपर दिया गया है ) तथा गल ( कण्ठ ) प्रदेश में विचरण करता रहता है। वाक्प्रवृत्ति ( वाणी का निकलना ), प्रयत्न ( कर्म करने के प्रति उत्साह ), ऊर्जा ( शक्ति ), बल, वर्ण और स्मृति ये सब क्रियाएँ उसी वायु के अधीन हैं ॥ ५ ॥

व्यानो हृदि स्थितः कृत्स्नदेहचारी महाजवः ॥ ६ ॥

गत्यपक्षेपणोत्क्षेपनिमेषोन्मेषणादिकाः । प्रायः सर्वाः क्रियास्तस्मिन् प्रतिबद्धाः शरीरिणाम् ॥

व्यानवायु का वर्णन—व्यानवायु का प्रमुख स्थान हृदय है। यह वायु सम्पूर्ण शरीर में विचरण करता रहता है, क्योंकि यह अत्यन्त वेगवान् होता है। गति ( घूमते रहना ), अपक्षेपण ( अंगों को नीचे की ओर ले जाना ), उत्क्षेपण ( ऊपर की ओर ले जाना ), निमेष ( आँख बन्द करना ), उन्मेष ( आँख खोलना ), आदि शब्द से जैभाई आदि का ग्रहण—ये सभी क्रियाएँ व्यानवायु के अधीन होती हैं ॥ ६-७ ॥

वक्तव्य—व्यानवायु के जिन कर्मों की यहाँ चर्चा की गयी है, उनसे भी महत्त्वपूर्ण वर्णन शारीरस्थान ३।६८ में इनका किया है, उसका अवलोकन अवश्य कर लें।

समानोऽग्रिमसौपस्यः कोष्ठे चरति सर्वतः । अन्नं गृह्णाति पचति विवेचयति मुञ्चति ॥ ८ ॥