अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
आदि कहा जाता है; ऐसे ही कार्यभेद से उसके भिन्न-भिन्न नाम हो जाते हैं, वैसी ही उक्त संज्ञाएँ बात आदि दोषों की भी निर्धारित की गयी हैं।
इति प्रायेण दोषाणां स्थानान्यविकृतात्मनाम् ॥ १८ ॥
व्यापिनासपि जानीयात्कर्मणि च पृथक्पृथक् ।
उपसंहार—यहाँ तक अविकृत अर्थात् प्रकृतिस्थ बात, पित्त तथा कफ नामक दोषों और उनके पाँच-पाँच भेदों के प्रमुख स्थानों एवं उनके कार्यो का वर्णन कर दिया गया है। यद्यपि उक्त बात आदि दोष सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होते हैं, फिर भी उनके उक्त कर्मों के कारण उनके मानवशरीर में भिन्न-भिन्न स्थानों को समझ लेना चाहिए ॥ १८ ॥
उष्णेन युक्ता रुक्षाद्या वायोः कुर्वन्ति सञ्चयम् ॥ १९ ॥
शीतेन कोपमुष्णेन शमं स्निग्धादयो गुणाः ।
बात के चय, कोप, शम का वर्णन—उष्णवीर्य से युक्त रुक्ष आदि गुण वातदोष का संचय करते हैं, शीतवीर्य से युक्त रुक्ष आदि गुण वातदोष को प्रकृपित करते हैं और उष्णवीर्य से युक्त स्निग्ध आदि गुण वातदोष का शमन करते हैं ॥ १९ ॥
वक्तव्य—रुक्ष आदि गुण—रुक्ष, शीत, खर, सूक्ष्म, चल तथा विशद इत गुणों वाले पदार्थों का सेवन करने से वातदोष की वृद्धि होती है, क्योंकि 'वृद्धिः समानैः सर्वेषाम्' अथवा 'सर्वदा सर्वभावानां सामान्यं वृद्धिकारणम्' आदि अनेक प्रमाण हैं। यह वृद्धि संचय तथा प्रकोप रूप से दो प्रकार की होती है। ध्यान दें—यदि रुक्ष आदि (उपर्युक्त) गुणों वाले द्रव्यों का सेवन उष्णवीर्य वाले द्रव्यों के साथ किया जायेगा तो उसका संचय तो होगा किन्तु प्रकोप नहीं होगा, इसका ध्यान सर्वत्र रखें।
शीतेन युक्तास्तीक्ष्णाद्याश्रयं पित्तस्य कुर्वते ॥ २० ॥
उष्णेन कोपं, मन्दाद्याः शमं शीतोपसंहिताः ।
पित्त के चय, कोप, प्रशम का वर्णन—शीतवीर्य से युक्त तीक्ष्ण आदि गुण वाले पदार्थ पित्तदोष का संचय करते हैं, उष्णवीर्य से युक्त तीक्ष्ण आदि गुण वाले पदार्थ पित्तदोष को प्रकृपित करते हैं और शीतवीर्य से युक्त मन्द आदि गुण वाले पदार्थ पित्तदोष का शमन करते हैं ॥ २० ॥
वक्तव्य—तीक्ष्ण आदि गुण—तीक्ष्ण, स्निग्ध, उष्ण, लघु, विन्न, सर तथा द्रव गुण वाले अम्ल, लवण तथा कटु रस वाले। उक्त गुणों वाले पदार्थों का सेवन यदि शीतवीर्य पदार्थों के साथ किया जाता है, तो पित्त का संचय होता है, किन्तु शीतवीर्य पदार्थों के कारण पित्त का प्रकोप नहीं होने पाता।
शीतेन युक्ताः स्निग्धाद्याः कुर्वते श्लेष्मणश्रयम् ॥ २१ ॥
उष्णेन कोपं, तेनेव गुणा रुक्षादयः शमम् ।
कफ के चय, कोप, प्रशम का वर्णन—शीतवीर्य से युक्त स्निग्ध आदि गुणवाले पदार्थ कफदोष का संचय करते हैं। उष्णवीर्य से युक्त स्निग्ध आदि गुण वाले पदार्थ कफदोष का प्रकोप करते हैं और उष्णवीर्य से युक्त रुक्ष आदि गुण वाले पदार्थ कफदोष का शमन करते हैं ॥ २१ ॥
वक्तव्य—स्निग्ध आदि गुण—स्निग्ध, शीत, गुरु, मन्द, श्लक्ष्ण, मुक्तन, स्थिर, मुदु, मधुर तथा पिच्छिल गुण वाले पदार्थों का सेवन करने से कफदोष का संचय तो होता है, किन्तु उसका प्रकोप नहीं होता, क्योंकि शीतवीर्य द्रव्यों के प्रभाव से कफदोष जमा रहता है और इसके विपरीत उष्णवीर्य वाले पदार्थों का सेवन करने से कफदोष पिघल कर कुपित हो जाता है।
चयो वृद्धिः स्वधान्येव प्रहेषो वृद्धिहेतुषु ॥ २२ ॥