अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
पृष्ठ 196, कुल 387 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकादशोऽध्यायः
अथातो दोषादिविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ।
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ॥
अब हम यहाँ से दोषों, धातुओं तथा मलों के विशेष ज्ञान को देने वाले अध्याय की व्याख्या करेंगे। ऐसा आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।
उपक्रम—रसभेदीय नामक अध्याय के समाप्त होने के बाद अब यहाँ दोषादिविज्ञानीय नामक अध्याय का आरम्भ किया जा रहा है। दोषादि शब्द में 'आदि' पद से धातु तथा मल का संग्रह किया गया है, क्योंकि धातु एवं मलों के दोष आधारस्वरूप होते हैं।
संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—च.सू. १२, १७-१८, २८; सु.सू. १५ एवं अ.सं.सू. १९ में देखें।
दोषधातुमला मूलं सदा देहस्य—
शरीर के आधार—वात आदि (पित्त-कफ) तीन दोष, रस से लेकर शुक्रपर्यन्त सात धातु तथा स्वेद (पसीना) आदि मल ये सब देह (शरीर) के सदा (जीवनभर) मूल (आधार) कहे जाते हैं।
—तं चलः । उत्साहोऽ्वासनश्चासन्वेष्टावेगप्रवर्तनैः ॥ १ ॥
सम्यग्गत्या च धातूनामक्षाणां पाटवेन च । अनुगृह्यात्यविकृतः, पित्तं पकृत्युष्मदर्शनैः ॥ २ ॥
क्षुतूहुरचिप्रभामेधाधीशौर्यतनुमादवैः । श्लेष्मा स्थिरत्वस्निग्धत्वसन्धिबन्धक्षमादिभिः ॥ ३ ॥
प्रकृतिस्य दोषों के कर्म—उस देह को प्रकृतिस्य वायु सदा उत्साहशक्ति, श्वास, प्रश्वास, चेष्टा (शरीर सम्बन्धी व्यवहार—उठना, बैठना, चलना, फिरना आदि), मल-मूत्र आदि वेगों की प्रवृत्ति, रस आदि धातुओं की उचित गति, श्रोत्र आदि इन्द्रियों की अपने-अपने विषयग्रहण की कुशलता से कृपा करता रहता है। इसी प्रकार प्रकृतिस्य पित्त इस देह के उपर सदा पाचन, उष्णता, दर्शन (देखना), श्रुख, प्यास, भोजन के प्रति रुचि, प्रभा (कात्ति), मेधा (धारण करने की क्षमता वाली बुद्धि), बुद्धि, शूरता, शरीर सम्बन्धी मुदुता द्वारा अनुग्रह करता है। प्रकृतिस्य कफ देह को सदा स्थिरता, स्निग्धता, दृढ़ सन्धिबन्धन तथा क्षमा आदि द्वारा अनुगृहीत करता है ॥ १-३ ॥
वक्तव्य—यह देह पञ्चमहाभूतों (पृथिवी, जल, तेज, वायु तथा आकाश) से निर्मित है। इनमें पृथिवी तत्त्व इस शरीर का आधार ही है और आकाश तत्त्व शरीर के रिक्त स्थानों का स्वरूप है। जैसे—कानों के तथा नाक के छिद्र एवं मुख-गुहा आदि आकाश तत्त्व के आशय हैं, इस दृष्टि से उक्त दोनों तत्त्व शरीर में प्रायः निष्क्रिय हैं। शेष तीन तत्त्व वायु, तेजस् तथा जल ये क्रमशः वात, पित्त, कफ धातुओं का कर्म करते हुए जीवनभर शरीर को धारण किये रहते हैं।
प्रीणनं जीवनं लेपः स्नेहो धारणपूरणं । गर्भोत्पादश्च धातूनां श्रेष्ठं कर्म क्रमात्मृतम् ॥ ४ ॥
रस आदि धातुओं के कर्म—रस आदि सात धातुओं के क्रमशः ये प्रमुख कर्म हैं—१. रस का प्रीणन, २. रक्त का जीवन, ३. मांस का लेपन अर्थात् अस्थिसमूह का लेपन कर उसे स्थिर बनाये रखना, ४. मेदस् का स्नेहन (सम्पूर्ण शरीर को स्निग्ध बनाये रखना), ५. अस्थि का धारण करना, ६. मज्जा का अस्थियों की पूर्ति करना (हड्डियों के भीतर जो स्निग्ध पदार्थ पाया जाता है वही मज्जा है, उसके अभाव में अस्थियों तथा अस्थिसन्धियों में पीड़ा का अनुभव होने लगता है) तथा ७. शुक्र का गर्भोत्पादन कर्म होता है ॥ ४ ॥