अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदोषादिविज्ञानीयाध्यायः ११ ]
सूत्रस्थानम्
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वक्तव्य—सुश्रुत के अनुसार—१. रस—शरीर का प्रीणन तथा रक्त का पोषण करता है। २. रक्त—वर्ण की निर्मलता, मांस का पोषण तथा जीवन प्रदान करता है। ३. मांस—शरीर एवं मेदस् का पोषण करता है। ४. मेदस्—स्नेह-स्वेद उत्पन्न करता है, शरीर में दृढ़ता उत्पन्न कर अस्थियों का पोषण करता है। ५. अस्थियाँ—शरीर को धारण करती हैं। ६. मज्जा—प्रीति, स्नेह, बल, शुक्र का पोषण कर अस्थियों का भी पोषण करती है। ७. शुक्र—धैर्य, व्युति, प्रीति, देहबल, हर्षवीज ( स्त्रियों में ) तथा गर्भधारण कार्य में उपयोगी होता है। देखें—सु.सू. १५।४।
अवष्टम्भः पुरीपस्य मूत्रस्य क्लेदवाहनम्। स्वेदस्य क्लेदविधृतिः—
मलों के प्रमुख कर्म—पुरीप का कर्म—अवष्टम्भ ( बल की रक्षा करना, मलाशय को स्वस्थ रखना, वायु तथा अग्नि का धारण करना )। मूत्र का कर्म—क्लेद को बहा देना। स्वेद का कर्म—शरीर में गीलापन बनाये रखना। इसी के कारण त्वचा का स्पर्श सुकोमल होता है।
वक्तव्य—इनका शरीर में रहना और यथासमय मात्रानुसार निकलना शरीर के लिए उपकारक होता है। कहा भी है—‘मलायत्तं बलं पुंसां शुक्रायत्तं तु जीवितम्’। सुश्रुत ने कहा है—‘दोषधातुमलमूलं हि शरीरम्’। ( सु.सू. १५।३ ) अर्थात् प्रकृतिस्थ वात आदि दोषों का, रस आदि धातुओं का तथा पुरीप आदि मलों का शरीर में रहना ही शरीर का मूल ( आधार ) है। इसका सांगोपांग व्याख्यान सुश्रुत में यथास्थान देखें। संयोगवश गुण भी दोष हो जाते हैं और दोष भी गुण हो जाते हैं। शास्त्र एवं लोक का परिशीलन करें। एक सुभाषित—‘तात वाग्भट ! कि ब्रूयं विचित्रा कर्मणो गतिः । दुषधातुरिवात्यर्थ गुणो दोषाय कल्पते’ ॥
—बृद्धस्तु कुत्तेऽनिलः ॥ ५ ॥
कार्यकाण्योष्णकामत्वकम्पानाहशकुदुग्धान् । बलनिद्रेन्द्रियप्रश्रप्रापप्रमदीनताः ॥ ६ ॥
वातवृद्धि के लक्षण—विविध कारणों से बढ़ा हुआ वातदोष कुशता, नख-नेत्र आदि में कालापन, उष्ण आहार-विहार की इच्छा का होना, कैंपकंपी का होना, आनाह, पुरीप की स्वाभाविक गति में रुकावट, बलनाश, निद्रानाश, इन्द्रियों की शक्ति का क्षय या ह्रास, प्रलाप ( अंत-संत बकना ), चक्करों का आना तथा दीनता—इन लक्षणों को उत्पन्न करता है ॥ ५-६ ॥
पीतविष्मूत्रनेत्रत्वकक्षुतुइदाहाल्पनिद्रताः । पित्त—
पित्तवृद्धि के लक्षण—अनेक कारणों से बढ़ा हुआ पित्तदोष मल, मूत्र, नेत्र तथा त्वचा में पीलापन, भूख-प्यास की अधिकता, जलन का होना, नींद का कम आना—इन लक्षणों को पैदा कर देता है।
—श्लेष्माऽप्रिसदनप्रतेकालस्यगीरवम् ॥ ७ ॥
श्वेतशैत्यश्ल्याङ्गत्वं श्वासकासातिनिद्रताः ।
कफवृद्धि के लक्षण—अनेक कारणों से बढ़ा हुआ कफदोष मन्दाग्नि, लालास्राव, आलस्य, गुरुता, पुरीप आदि में सफेदी, शीतता ( जाड़ा लगना या शीतस्पर्श का अनुभव होना ), अंगों में शिथिलता ( ढीलापन ), श्वास, कास तथा निद्रा की अधिकता होना—इन लक्षणों को उत्पन्न कर देता है ॥ ७ ॥
वक्तव्य—यहाँ तक वात-पित्त-कफ के जिन लक्षणों का ऊपर वर्णन किया गया है, वे वात आदि दोषों के वृद्धि या प्रकोप के लक्षण हैं। इन्हें आप अ.हृ.नि. १।१४ से २२ तक देखें।
रसोऽपि श्लेष्मवत्—
रसवृद्धि के लक्षण—अनेक कारणों से बढ़ा हुआ रसधातु ऊपर कहे गये कफदोष की भाँति विकारों को उत्पन्न करता है।
—रक्तं विसर्पल्लीहविद्रधीन् ॥ ८ ॥
कुष्ठवाताम्रपिताम्रगुल्मोपकुशकामलाः । व्यङ्गप्रिनाशसम्भोरक्तत्वद्भेनमूत्रताः ॥ ९ ॥
११ अ० हू०