अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
सेवनीय आहार—शालिधान्य, गेहूँ, जौ, साँठी, जांगल देश के प्राणियों के मांस, सुनिषण्णक, जीवन्ती, मुलायम मूली, बथुआ, हरीतकी, आँवला, मुनक्ता, परबल, मूँग, चीनी, घृत, दिव्योदक ( गंगा का जल ), दूध, मधु, दाडिम ( अनार ) तथा संधानमक—इन द्रव्यों का सदा सेवन करें ॥ ४२-४३ ॥
त्रिफलां मधुसर्पिभ्यां निशि तैत्रबलाय च । स्वास्थ्यानुवृत्तिकृद्यच्च रोगोच्छेदकरं च यत् ॥ ४४ ॥
रात में सेवनीय पदार्थ—द्रुष्टि की शक्ति को बढ़ाने के लिए रात में मधु तथा घी में मिलाकर त्रिफला का सेवन करें। जो-जो द्रव्य स्वास्थ्य की रक्षा करने वाला तथा रोगनाशक हो उस-उस का भी निरन्तर सेवन करें ॥ ४४ ॥
बिसेक्षुमोचचोचाग्रमोदकोत्कारिकादिकम् । अद्यादव्यं गुरु स्निग्धं स्वादु मन्दं स्थिरं पुरः ॥
विपरीतमतश्रान्ते मध्येऽम्ललवणोत्कटम्।
अन्य पदार्थों को खाने की विधि—विस ( कमलकन्द ), ईब, केला, चोच ( नारियल, तालफल, बड़हर या कटहर ), आम, लड्डू, उत्कारिका ( लपसी या हलुआ ) तथा अन्य गुरु, स्निग्ध, स्वादु, मन्द एवं स्थिर पदार्थों को भोजन के आरम्भ में खाना चाहिए। उक्त द्रव्यों के विपरीत गुण वाले आहार-द्रव्यों को अन्त में खाये और बीच में अम्ल तथा लवण रस-प्रधान द्रव्यों का सेवन करें ॥ ४५ ॥
बक्तव्य—उक्त विवेचन का निष्कर्ष यह निकला कि वातशामक भोजन-द्रव्यों का प्रयोग प्रारम्भ में, कफशामक द्रव्यों का अन्त में और अग्निवर्धक द्रव्यों का प्रयोग भोजन के मध्य में करना चाहिए। अर्थात् लवण आदि रसों के अन्त में 'मधुरेण समापयेत्' सूक्ति का अनुसरण करें और मधुररस-प्रधान आहार द्रव्यों के अन्त में 'भोजनान्ते पिबेत् तक्रम्' का स्मरण अवश्य कर लेना चाहिए, क्योंकि 'न तक्रसेवी व्यथते कदाचित्'।
अत्रेन कुक्षेद्वीवंशो पानेनैकं प्रूरयेत् ॥ ४६ ॥
आश्रयं पवनादीनां चतुर्थमवशेषयेत्।
आमाशय के चार भाग—कुक्षि ( आमाशय ) को चार भागों में बाँटकर उसके दो भागों को अन्न ( दाल, भात, रोटी, तरकारी आदि ) से भर लें, एक अर्थात् तीसरे भाग को पेश पदार्थों ( दूध, काँजी, जल आदि ) से भर लें और शेष चौथे भाग में वात-पित्त-कफ दोष अपनी क्रिया कर सकें, इसके लिए खाली छोड़ दें ॥ ४६ ॥
बक्तव्य—यह पद्य अविकलरूप से अ.सं.सू. १०।५५ में भी आया है। चरक में कुक्षि के तीन भाग करने को कहा है, यह अपनी व्यवस्था है। देखें—च.वि. २।३। इनके अनुसार भक्ष्य एवं पेश आदि को दो भागों में और एक भाग दोषों की गति के लिए छोड़ना चाहिए। इस विधि से अजीर्ण आदि रोग नहीं हो पाते। उक्त पद्य अन्यत्र इस प्रकार देखा जाता है—'द्वौ भागौ पूरयेदत्र तोयमेकेन पूरयेत्। माहृतस्य प्रचाराथं चतुर्थमवशेषयेत्' ॥ आशय दोनों का समान है। उक्त प्रकार के कुक्षि-विभाजन से 'अर्धसौहित्यं' तथा 'नातितुप्तता' का अनुमान सुखपूर्वक लगाया जा सकता है।
अनुपानं हिमं वारि यवगोधूमयोर्हितम् ॥ ४७ ॥
दन्ति मद्ये विषे क्षौद्रे, कोष्णं पिष्टमयेषु तु। शाकमुद्गादिविकृतो मस्तुतक्राम्लकाजिकम् ॥ ४८ ॥
सुरा कृशानां पुष्टचर्यं स्थूलानां तु मधूदकम्। शोषे मांसरसो, मद्यं मासे स्वल्पे च पावके ॥ ४९ ॥
व्याध्यापिधाध्वभाष्यस्त्रीलङ्घनातपकर्मभिः। क्षीणे वृद्धे च बाले च पयः पथ्यं यथाऽमृतम् ॥
विविध प्रकार के अनुपान—गेहूँ तथा जौ का, दही, मद्य, विष या विषयुक्त औषध-द्रव्यों तथा मधु का अनुपान शीतल जल है। पीठी आदि से बने हुए ( कलौडी आदि ) भक्ष्य पदार्थों का अनुपान गुनगुना जल है। विविध प्रकार के शाकों, मूँग, उड़द आदि द्वारा बनाये गये बड़ा आदि पदार्थों का अनुपान मस्तु