भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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मात्राशितौप्याध्यायः ८ ]

सूत्रस्थानम्

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भोजन कर लिया जाता है, उसे 'अध्याशन' कहते हैं। असमय में अधिक या थोड़ा जो भोजन किया जाता है, उसे 'विषमाशन' कहते हैं। ये तीनों प्रकार के 'अशन' घोर (कष्टकारक) रोगों को उत्पन्न कर देते हैं अथवा मृत्युकारक होते हैं ॥ ३३-३४ ॥

बक्तव्य— चरक-विमानस्थान १।२५ में निर्दिष्ट विधियों के विपरीत ये तीनों अशन हैं; अतएव ये हानिकारक होते हैं। 'समशन' शब्द उक्त अर्थ में आयुर्वेद ने स्वीकार किया है, अन्यत्र इसका अर्थ—'सम्यक् अशन' भी हो सकता है। आहार जीवन को धारण करने वाले उपस्तम्भों में सर्वप्रथम है, अतः इसका विधिवत् सेवन करना ही चाहिए। उक्त तीनों प्रकार के अशन आहार की विकृतियाँ हैं। सुश्रुत में आहार-विधि का उत्तम वर्णन किया है। आप भी देखें, पढ़ें तथा इसे व्यवहार में लायें—सु.सू. ४६।४४ से ४९५ तक और देखें—अ.सं.सू. ११।६३।

काले सात्त्व्यं शुचि हितं स्निग्धोष्णं लघु तन्मनाः ॥ ३५ ॥

षड्रसं मधुरप्रायं नातिद्रुतबिलम्बितम्। स्नातः भुद्धान् विविक्तस्थो धीतपादकरानतः ॥ ३६ ॥

तर्पयित्वा पितॄन् देवानतिथीन् बालकान् गुरुन्। प्रत्यवेक्ष्य तिरश्चोऽपि प्रतिपन्नपरिग्रहान् ॥

समीक्ष्य सम्यगात्मानमतिन्द्रव्रवन् द्रवम्। इष्टमिष्टैः सहशनीयाच्छुचिभक्तजनहृतम् ॥ ३८ ॥

शास्त्रीय भोजन-विधि— उचित समय पर, सात्त्व्य (प्रकृति के अनुकूल), पवित्र, स्वास्थ्यवर्धक, स्निग्ध, गरमागरम, लघु (सुपाच्य), मन लगाकर, छः रसों से युक्त, जिसमें मधुररस वाले पदार्थ अधिक हों; इस प्रकार के भोज्य पदार्थों को न बहुत जल्दी और न बहुत देर करके खाना चाहिए। स्नान करके, भूख लग जाने पर, एकान्त में बैठकर, हाथ, मुख तथा पैरों को धोकर, पितरों, देवताओं, अतिथियों, बच्चों तथा बूढ़ों को तृप्त करकर, पशु-पक्षियों का ध्यान देकर, अतिथियों एवं परिवारजनों के भोजन की व्यवस्था करके; अपने शरीर की वर्तमान स्थिति का विचार करता हुआ, भोजन की निन्दा न करता हुआ मौन होकर मित्रों के साथ बैठकर, पवित्र सेवकों द्वारा परोसा गया रुचिकर एवं द्रवप्राय भोजन का सेवन करे ॥ ३५-३८ ॥

बक्तव्य— श्लोक की रचना में पदों को व्यवस्थित करने की एक समस्या होती है, उन्हें व्यवस्थित करने के लिए अन्यत्र का सहारा लेना पड़ता है। इस दृष्टिकोण से आप उक्त पद्यों को देखें—'स्नातः विविक्तस्थः देवान् (ऋषीन्) पितॄन् तर्पयित्वा, अतिथीन् बालकान् गुरुन् च तर्पयित्वा, प्रतिपन्नपरिग्रहान् तिरश्चोऽपि प्रत्यवेक्ष्य सम्यक् आत्मानं समीक्ष्य'... 'धीतपादकरानतः इष्टैः सह शुचिभक्तजनहृतं इष्टं, द्रवं च अशनीयात्'।

भोजनं तुणैकेशादिजुष्टमुष्णीकृतं पुनः। शाकावराश्रभूयिष्ठन्त्युष्णलवणं त्यजेत् ॥ ३९ ॥

त्याज्य भोजन— जिस भोजन में तिनके, केश (बाल), मक्खी आदि पड़े हों, जो फिर से गरम किया गया हो अर्थात् जो एक बार ठण्डा हो चुका हो, जिसमें शाक अथवा कुत्सित (निर्वीर्य) अन्न अधिक मात्रा में डाले गये हों, जो अत्यन्त गरम हो या उष्णवीर्य हो या जिसमें अधिक नमक पड़ा हो, ऐसे भोजन-पदार्थों का परित्याग कर देना चाहिए ॥ ३९ ॥

किलाटवधिकूर्चकाक्षारशुक्ताममूलकम्। कृशशुष्कवराहविगोमत्सम्यमहिषामिषम् ॥ ४० ॥

माषनिष्पावशालूकबिसपिष्टबिरुद्धकम्। शुष्कशाकानि यवकान् फाणितं च न शीलयेत् ॥

असेवनीय आहार— किलाट, दही, कूर्चका, क्षार, शुक्त, कच्छी मूली, कृश प्राणी का मांस, सुखाया गया मांस, सूअर, गाय, मछली तथा भैंस का मांस, उड़द, निष्पाव (उबले हुए धान्य), शालुककन्द, विसकन्द, पीठी के द्वारा निर्मित पदार्थ, अंकुरित अन्न, सुखाये गये शाक, यवक (जई) नामक अन्न एवं राब—इनका अधिक मात्रा में निरन्तर सेवन न करे ॥ ४०-४१ ॥

शीलयेच्छालिगोधूमवषष्ठिकजाङ्गलम्। सुनिषण्णकजीवन्तीबालमूलकवास्तुकम् ॥ ४२ ॥

पथ्यामलकमृद्वीकापटोलीमुद्गशर्कराः। घृतद्विष्योदकक्षीरसौद्रवादिसैन्धवम् ॥ ४३ ॥