अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
ने इसे अन्य आमदोषों से अतिकष्टसाध्य कहा है। अतएव इसका नाम भी विलम्बिका (लीचड़ रोग) रखा है। महर्षि वामदेव ने इस आमदोष के लिए 'लीन' शब्द (सट जाने वाला) का युक्तियुक्त प्रयोग किया है।
अश्रद्धा हृद्व्यथा शुद्धेऽप्युद्गारे रसशेषतः । शयीत किञ्चिदेवात्र सर्वश्रानाशितो दिवा ॥ २९ ॥
स्वप्यादजीर्णी, सज्जातबुभुक्षोऽद्यान्मिन्तं लघु।
रसशेषाजीर्ण-चिकित्सा—रसशेषाजीर्ण में आहार के पच जाने पर भी जब रस का परिपाक नहीं हो पाता है, तब ये लक्षण होते हैं—उद्गारों (डकारों) के शुद्ध आने पर भी रस के अपक्व रह जाने से भोजन के प्रति असन्धि तथा हृदय में पीड़ा होती रहती है।
उपचार—इस दशा में दिन में कुछ खाये-पीये बिना थोड़ा सो जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त अन्य अजीर्णरोगी भी दिन में सो जायें और भलीभाँति भूख लगने पर थोड़ी मात्रा में लघु (सुपच) आहार का सेवन करें ॥ २९ ॥
विवग्धोऽतिप्रवृत्तिर्वा ग्लानिर्माश्रुतमूकता ॥ ३० ॥
अजीर्णलिङ्गं सामान्यं विष्टम्भो गौरवं भ्रमः ।
अजीर्ण का सामान्य लक्षण—अजीर्ण के सामान्य लक्षण इस प्रकार हैं—मल का खुलकर न होना अथवा अधिक (अतिसार के रूप में) निकलना, ग्लानि (मन का मलिन रहना), वायु का अनुलोम न होना अर्थात् ठीक ढंग से डकार एवं अपानवायु के रूप में न निकल पाना, विष्टम्भ (आमाशय में स्वाभाविक गति का न होना), पेट तथा सम्पूर्ण शरीर में भारीपन का होना एवं चक्करों का आना ॥ ३० ॥
न चातिमात्रमेवात्रामादोपाय केवलम् ॥ ३१ ॥
द्विष्टविष्टम्भिदग्धामगुरुक्षहिमाशुचि । विदाहि शुष्कमत्यम्बुलुप्तं चात्रं न जीर्यति ॥ ३२ ॥
उपतप्तेन भुक्तं च शोकक्रोधक्षुदादिभिः ।
अजीर्ण के विविध कारण—केवल अधिक मात्रा में खाया हुआ आहार ही आमदोष का कारण नहीं होता है, अपितु इसके अन्य अनेक कारण हैं। यथा—द्विष्ट (जिसे खाने की इच्छा न हो), विष्टम्भकारक, जला हुआ, आम (भलीभाँति न पका हुआ), गुरु (देर में पचने वाला), रूक्ष (स्नेह रहित), शीत (बासी), अपवित्र, विदाहकारक, अत्यन्त सूखा, अधिक पानी पीने से अथवा थोड़ा भी जल न पीने से खाया हुआ भोजन नहीं पचता। बड़ी देर से भूख लगने के बाद में खाया हुआ भोजन भी नहीं पचता तथा शोक, क्रोध आदि से पीड़ित होने के बाद में खाया हुआ भोजन भी ठीक प्रकार से नहीं पचता ॥ ३१-३२ ॥
वक्तव्य—'क्षुदादिभिः'—यहाँ प्रयुक्त आदि शब्द से काम, क्रोध, लोभ, मोह, लज्जा, अपमान, तिरस्कार, भय और घबड़ाहट की स्थिति में खाया गया आहार समुचित प्रकार से नहीं पचता है। ऊपर की चतुर्थ पंक्ति का अर्थ इस प्रकार करना चाहिए—'शोकक्रोधक्षुदादिभिः उपतप्तेन (पुंसा) भुक्तम्'। शोक, क्रोध आदि मानसिक विकृतियाँ भोजन करते समय जो तन्मयता होती चाहिए, उसमें बाधा पहुँचाती हैं, क्योंकि चरक का आदेश है—'तन्मना भुज्यते' (च.वि. १।२५)। इसके अतिरिक्त इस अध्ययन में भोजन कैसे करना चाहिए, इसका विधिपूर्वक वर्णन किया है, इसे पढ़कर तब भोजन करें। आज भी जो अनशन किया करते हैं, उन्हें पहले फलों का रस ही दिया जाता है, न कि पूर्ण भोजन।
मिश्रं पथ्यमपथ्यं च भुक्तं समशनं मतम् ॥ ३३ ॥
विद्यादध्यशतं भूयो भुक्तस्योपरि भोजनम् । अकाले बहु चाल्यं वा भुक्तं तु विषमाशनम् ॥ ३४ ॥
त्रीण्यप्येतानि मृत्युं वा घोरान् व्याधीन् सुजन्ति वा ।
समशन आदि के लक्षण—पथ्य (हितकर) तथा अपथ्य (अहितकर) प्रकार के भोजनों को मिलाकर जो खाया जाता है, उसे 'समशन' कहते हैं। अभी भोजन किया है, वह पचा नहीं तब तक जो पुनः