भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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मात्राशितौषध्यायः ८ ]

सूत्रस्थानम्

१३९

एवमन्यानिप व्याधीन् स्वनिदानविपर्ययात् ॥ २२ ॥

चिकित्सेदनुबन्धे तु सति हेतुविपर्ययम् । त्यक्त्वा यथायथं वैद्यो युज्यादव्याधिविपर्ययम् ॥ २३ ॥

हेतुविपरीत आदि चिकित्सा—इसी प्रकार ज्वर आदि अन्य रोगों की भी अपने-अपने निदान ( हेतु ) के विपरीत चिकित्सा करे । यदि ऐसा करने पर भी रोग शान्त न हो तो उसे छोड़कर चिकित्सक यथोचित अवसर देखकर व्याधिविपरीत औषध-योगों का प्रयोग करे ॥ २२-२३ ॥

तदर्थकारि वा, पक्वे दोषे त्विद्धे च पावके । हितमभ्यञ्जनस्नेहपानबस्त्यादि युक्तितः ॥ २४ ॥

विपरीतार्थकारी चिकित्सा—अथवा विपरीतार्थकारी चिकित्सा-विधि का प्रयोग करना चाहिए । जब इस प्रकार दोष का पावन हो जाता है और जठराग्नि प्रदीप्त हो जाती है, तो विधिपूर्वक अभ्यञ्जन ( तैलमर्दन ), स्नेहपान तथा बस्ति आदि का प्रयोग करना चाहिए ॥ २४ ॥

बक्तव्य—‘तदर्थकारि’—तत् अर्थात् निदान, व्याधिविपर्यय द्वारा साध्य, जो ‘अर्थ’ रोगशान्तिरूप लक्षण को करने का स्वभाव है, जिसका इस प्रकार की चिकित्सा अथवा जैसे मदात्यय रोग में पुनः मद्यपान कराना, अतिसार में विरेचन कराना आदि । ‘बस्त्यादि’—यहाँ आदि शब्द से रसायन आदि चिकित्सा-विधियों की ओर संकेत है ।

अजीर्णं च कफादामं तत्र शोफोऽक्षिगण्डयोः । सद्योभुक्त इबोद्गारः प्रसेकोक्त्तलेशगौरवम् ॥ २५ ॥

आमाजीर्ण के लक्षण—कफदोष के प्रकोप से आमाजीर्ण होता है । इसके लक्षण—आँखें तथा गालों पर शोथ, तत्काल खाये हुए आहार के अनुरूप उद्गारों ( डकारों ) का आना, लालाझाव, जो मिचलाना तथा शरीर में भारीपन—ये लक्षण होते हैं ॥ २५ ॥

विष्टब्धमनिलाच्चूलविबन्धाधमानसादकृत ।

विष्टब्धाजीर्ण के लक्षण—वातदोष के प्रकोप से विष्टब्धाजीर्ण होता है । इसमें पेट में शूल, मल-मूत्र एवं अपानवायु के निकलने में रुकावट, अफरा एवं शरीर में दीलापन—ये लक्षण होते हैं ।

पिताद् विदग्धं तुण्मोहभ्रमाम्लोद्गारदाहवत् ॥ २६ ॥

विदग्धाजीर्ण के लक्षण—पित्तदोष के प्रकोप से विदग्धाजीर्ण होता है । इसमें बार-बार प्यास लगना, मोह ( बेहोशी ), चक्करों का आना, खट्टे डकारों का आना एवं जलन का होना—ये लक्षण होते हैं ॥ २६ ॥

लङ्घनं कार्यमामे तु, विष्टब्धे स्वेदनं भृशम् । विदग्धे वमनं, यद्वा यथावस्थं हितं भवेत् ॥ २७ ॥

चिकित्सा-सूत्र—आमाजीर्ण में रोग के अनुसार पूर्ण लंघन ( उपवास ) करे या लघुभोजन करे । विष्टब्धाजीर्ण में बार-बार पेट के ऊपर स्वेदन करे, इससे वातदोष का अनुलोमन होता है । विष्टब्धाजीर्ण में तब तक वमन कराना चाहिए जब तक वमन में पित्त का दर्शन न हो जाय । अन्य लक्षणों की शान्ति के लिए परिस्थिति के अनुसार समयोचित चिकित्सा करनी चाहिए ॥ २७ ॥

गरीयसो भवेल्लीनादामादेव विलम्बिका । कफवातानुबद्धाऽऽमलिङ्ग तत्समसाधना ॥ २८ ॥

विलम्बिका के लक्षण—भयावह आमदोष जो लीन ( छिपा ) रहता है, उसी से यह विलम्बिका रोग हो जाता है । इसमें कफ एवं वात दोष युक्त आमाजीर्ण के लक्षण होते हैं और ऊपर कहे गये कफ-वात-दोष सम्बन्धित अजीर्णों के समान ही इसकी भी चिकित्सा होती है ॥ २८ ॥

बक्तव्य—‘लीन’ शब्द की चरितार्थता—वमन-विरेचन से सामान्य आमदोष निकल जाता है, ऐसा ऊपर कहा गया है, किन्तु यह आमदोष उक्त उपायों से भी नहीं निकल पाता, अतएव इसे लीन ( सटा हुआ ) कहा गया है । सूश्रुत ने इसका वर्णन इस प्रकार किया है—‘दुष्टं तु भुक्तं कफमाक्षताभ्यां प्रवर्तते नोर्ध्वमध्य यस्य । विलम्बिकां तां भृशदुश्चिकित्सामाचक्षते शास्त्रविदः पुराणाः’ ॥ ( मु. उ. ५६९ ) सुश्रुत