अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमात्राशिलीयाध्यायः ८ ]
सूत्रस्थानम्
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अलसक का वर्णन—यह रोग विशेष करके दुर्बल, मन्द अग्निवाले, वात, मूत्र तथा मल के वेगों को रोकने वाले पुरुष को होता है। इसमें खाया गया आहार वात द्वारा पीड़ित एवं कफ के कारण आमाशय में रोका गया स्वयं वह गतिहीन हो जाता है। वात आदि दोषों द्वारा हिलाया-डुलाया जाने पर भी वह आमाशय में शल्य के रूप में स्थित रहता है तथा कष्टकारक शूल आदि विकारों को तो करता है, किन्तु इसमें वमन-विरेचन नहीं होते, अतः इस रोग को अलस या अलसक कहते हैं॥ १०-११॥
—अत्यर्थदुष्प्रास्तु दोषा दुष्प्रामबद्धाः। यान्तस्तियर्क्तुं सर्वं दण्डवत्तस्मभ्यन्ति चेत्॥ १२॥ दण्डकालसकं नाम तं त्यजेदाशुकारिणम्।
दण्डालसक का वर्णन—ऊपर कहे गये कारणों से वात आदि दोष अत्यन्त कुपित तथा दूषित होकर आम (अपचय) अन्न द्वारा मुख एवं गुद मार्ग के रुक जाने के कारण ये तिर्यग्वाही अर्थात् रसवाही प्रोटों द्वारा समस्त शरीर में फैलकर सम्पूर्ण शरीर को दण्ड (डण्डा) के समान जड़ कर देते हैं। अतः इस रोग को दण्डालसक कहते हैं। यह रोग शीघ्र मारक होता है, इसकी चिकित्सा करना छोड़ देनी चाहिए॥ १२॥
वक्तव्य—अ.सं.सू. ११५१ में विस्चिका के असाध्य लक्षणों का वर्णन किया है। इनका अवलोकन कर लें।
विरुद्धाध्यशनाजीर्णशीलिनो विषलक्षणम्॥ १३॥
आमदोषं महाघोरं वज्येद्विषसंज्ञकम्। विषरूपाशुकारित्वाद्विरुद्धोपक्रमत्वतः॥ १४॥
आमविष का वर्णन—विरुद्धअशन (अ.हृ.सू.७।३१), अध्यशन (इसी अध्याय का ३४वाँ पद्य) तथा अजीर्ण अवस्था में भी आहार करने वाले पुरुष का आमदोष अत्यन्त कष्टदायक होता है, इसीलिए इसे 'आमविष' कहते हैं। यह विष के समान अपना शीघ्र प्रभाव दिखलाता है और इसकी यदि चिकित्सा की जाती है तो उसका प्रभाव भी विपरीत ही होता है॥ १३-१४॥
वक्तव्य—'विरुद्धोपक्रमत्व'—यह आमविष विष के समान गुणों वाला होता है, अतः विष की शीत प्रधान चिकित्सा की जाती है और आमदोष में उष्ण उपचार करने का विधान है, अतएव यह विरुद्धोपक्रम होता है, जिससे सफलता नहीं मिल पाती। चरक ने भी उक्त विषय का प्रतिपादन इस प्रकार किया है—'विरुद्धाध्यशनाजीर्णशनीलिनाः पुनरामदोषमामविषमित्यावक्ष्यते भिषजः'। (च.वि. १।१२) ठीक इसी का पद्यानुवाद श्रीवामट ने किया है। यद्यपि विषरोगी की चिकित्सा की जाती है, वह नीरोग भी होता है, किन्तु यहाँ (आमविष में) परिस्थिति का भेद है, अतएव यह विरुद्धोपक्रम होता है। इस आमविष का जब प्रकोप होता है तो ऐंठन या मरोड़ के साथ चावल के धोअन का जैसा वमन या विरेचन होता देखा जाता है। प्रायः इसका स्वरूप 'आमालिसार' जैसा होता है।
अथाममलसोभूतं साध्यं त्वरितमृलिल्लेखेत्। पीत्वा सोप्रापदुर्फलं वार्युष्णं योजयेत्ततः॥ १५॥
स्वेदनं फलवर्ति च मलवातानुलोमनीम्। नाम्यमानानि चाङ्गानि भृशं स्विन्नानि वेष्टयेत्॥ १६॥
आमदोष की चिकित्सा—जब आमदोष अलसक के रूप में परिणत हो गया हो और साध्यता के लक्षणों से युक्त हो, तब उसे बाल्यवच, पटु (नमक) एवं फल (मैनफल) को गरम पानी में मिलाकर पिलायें, जिससे शीघ्र ही वमन हो अर्थात् उस रोगी को यह वमनकारक पेय पिलाकर शीघ्र वमन करायें। उसके बाद उसे स्वेदन करायें और फिर उसे मल तथा अपानवायु को अनुलोम कराने वाली फलवर्ति का प्रयोग करायें। यदि इस समय आमदोष की विकृति के कारण उसके अंगों में सिकुड़न आ रही हो तो उन्हें पर्याप्त स्वेदन कराकर वस्त्र आदि से कसकर बाँध दें॥ १५-१६॥
वक्तव्य—'फलवर्ति' नामक जिस योग की चर्चा खारणदि ने यहाँ की है, वह इस प्रकार है—'शूले तु स्तिमिते सामे स्वेदः शस्तो मुद्गर्मुहुः। ह्युष्णोः कटुकैः पांशुकीरषिकतादिभिः॥ पिपल्योऽगारधूमश्र मदनं