भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अष्टाङ्गहृदये

हीन मात्रा वाले आहार से हानि—हीन ( कम ) मात्रा वाला भोजन बल, शरीरपुष्टि तथा ओजस् को नहीं बढ़ाता है और इस प्रकार का भोजन सभी प्रकार की वातव्याधियों की उत्पत्ति का कारण होता है॥ ३॥

अतिमात्रं पुनः सर्वांनाशु दोषान् प्रकोपयेत्।

अधिक मात्रा वाले आहार से हानि—मात्रा से अधिक किया गया आहार वात आदि सभी प्रकार के दोषों को शीघ्र ही प्रकृपित कर देता है।

पीड्यमाना हि वाताद्या युगपत्तेन कोपिताः॥ ४॥

आमेनात्रेन दुष्टेन तदेवाविश्य कुर्वते। विष्टम्भयन्तोऽलसकं च्यावयन्तो विसूचिकाम्॥ ५॥

अधरोत्तरमार्गाभ्यां सहस्रैवाजितात्मनः।

विसूचिका के लक्षण—ऊपर कहे गये अतिमात्रा वाले आहार का सेवन कर लेने से पीड़ित वात आदि दोष उस आम ( न पचे हुए ) तथा दूषित आहार से एक साथ कृपित होकर एवं उसी आहार में मिलकर आमाशय की गति को रोककर 'अलसक' नामक रोग को पैदा कर देते हैं। उस अजितात्मा पुरुष के ऊपर तथा नीचे के मार्ग से अर्थात् मुख एवं गुद मार्ग से क्रमशः वमन तथा अतिसार के रूप में आहार पदार्थ को निकालते हुए 'विसूचिका' नामक रोग को पैदा कर देते हैं॥ ४-५॥

प्रयाति नोर्ध्वं नाधस्तादाहारो न च पच्यते॥ ६॥

आमाशयेऽलसीभूतस्तेन सोऽलसकः स्मृतः।

अलसक की परिभाषा—अलसक रोग होने के पहले जो आहार खाया गया था, वह न तो ऊपर ( मुख ) की ओर से निकलता है और न नीचे ( गुदमार्ग ) से निकलता है, न वह पचता ही है। वह आमाशय में आलसी की भाँति पड़ा रहता है, अतएव इस रोग को 'अलसक' कहा जाता है॥ ६॥

विविधैर्वेदनोद्भेदाभ्याद्विभुशकोपतः॥ ७॥

सूचीभिरिव गात्राणि विध्यतीति विसूचिका।

विसूचिका की परिभाषा—वात आदि दोषों के अत्यन्त प्रकृपित हो जाने के कारण अनेक प्रकार की वेदनाओं की उत्पत्ति होने से जो बार-बार सूर्य की भाँति शरीरावय को बंधती रहती है, उसे 'विसूचिका' कहते हैं॥ ७॥

वक्तव्य—'विसूचिका' शब्द में श, ष, स इन तीनों का प्रयोग यत्र-तत्र देखा जाता है। जैसे—कलश, कलस आदि। विसूचिका—इसमें आम आहार वमन एवं विरेचन के रूप में बार-बार निकलता रहता है। अलसक—इसमें आम आहार आमाशय में पड़ा ही रहता है और वह पचता भी नहीं। इसका उक्त नाम इसके लक्षणों के अनुरूप है।

तत्र शूलप्रमानाहकम्पस्तम्भादयोऽनिलात्॥ ८॥

पिताञ्च्वरातिसारान्दर्हातृष्टुप्रलयायः। कफाच्छर्द्वज्जगुरुतावाक्सङ्घोषिनादयः॥ ९॥

विसूचिका के लक्षण—वातदोष से शूल, चक्करों का आना, आनाह, कैंपकैपी का होना तथा स्तम्भ ( जड़ता ) ये लक्षण होते हैं। पित्तदोष से ज्वर, अतिसार, भीतर से जलन, बार-बार प्यास का लगना एवं प्रलाप ( अंत-संत बकाना ) ये लक्षण होते हैं। कफदोष से छर्दि ( वमन ), शरीर के अवयवों में भारीपन, बोलने में रुकावट तथा लार का चूना ये लक्षण होते हैं॥ ८-९॥

विशेषादुर्बलस्याल्पवहेर्वगविधारिणः। पीडितं मारुतेनात्रं श्लेष्मणा रुद्धमन्तरा॥ १०॥

अलसं क्षोभितं दोषैः शल्यत्वेनैव संस्थितम्। शूलादीन् कुस्ते तीव्रांश्चर्द्वतीसारवर्जितान्॥ ११॥

सोऽलसः—