भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अष्टमोऽध्यायः

अथातो मात्राशितौयमध्यायं व्याख्यास्यामः ।

इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।

अब हम यहाँ से मात्राशितौय नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे, जैसा कि इस विषय में आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।

उपक्रम —इसके पहले ७।५३ में कहा गया है—‘आहारो वर्णितस्तत्र तत्र च वक्ष्यते’। अतएव इस ८वें अध्याय में उस आहार का किस प्रकार मात्रा के अनुकूल सेवन करना चाहिए, इस विषय की चर्चा की जा रही है, क्योंकि यहाँ जो मात्रा शब्द का प्रयोग किया गया है, इसका ताल्य है आहार का सम्यक्योग। यह अशन या आहार सात प्रकार का होता है—१. सकीर्णशन, २. विरुद्धाशन, ३. अमात्राशन, ४. अजीर्णशन, ५. समशन, ६. अध्यशन तथा ७. विषमाशन। इनमें दो के उदाहरण आगे इसी अध्याय में दिये जायेंगे।

संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत —च.सू. ५, च.सू. २७, च.वि. २, च.वि. १५, च.सि. १२, सु.सू. ४६, सु.उ. ५६ एवं अ.सं.सू. १० तथा ११ में देखें।

मात्राशी सर्वकालं स्यान्मात्रा ह्यग्रेः प्रवर्तिका । मात्रां द्रव्याण्यपेक्षन्ते गुरुण्यपि लघून्यपि ॥ १ ॥

आहार-मात्रा का वर्णन —मनुष्य को सदा मात्रा के अनुसार आहार (भोजन) करना चाहिए, क्योंकि उचित मात्रा में किया गया भोजन जठराग्नि को प्रदीप्त करता है। मात्रा का निर्धारण गुरु तथा लघु द्रव्यों को देखकर करना चाहिए, जैसा आगे कहा जायेगा ॥ १ ॥

वक्तव्य —मात्रा का विचार च.सू. ५।४ में संक्षेप से नेपे-तुले शब्दों में किया गया है। इसके आगे च.वि. २।३ में कुछ विशेष ढंग से इसे कहा है—‘आहार करते समय पुरुष को आमाशय की खाली जगह को तीन भागों में इस प्रकार बाँट देना चाहिए; यथा—एक भाग को ठोस आहार-द्रव्यों के लिए, एक भाग द्रव द्रव्यों के लिए और एक भाग वात, पित्त तथा कफ के लिए रखें’। वामभट ने इसी विषय को प्रकारान्तर से आगे कहा है—‘अग्नेन कुक्षेर्द्विषी पानेनैकं प्रपूरयेत् । आश्रयं पवनादीनां चतुर्यमवशेषयेत्’। (अ.हृ.सू. ८।४६) अर्थात् ‘भोजन करते समय आमाशय के दो भागों को रोटी, दाल, भात आदि से भर ले, तीसरे भाग को पेय पदार्थों से भर ले और शेष चौथे भाग को वात-पित्त-कफ की क्रिया के लिए सुरक्षित रखें’। इसके पहले भी श्रीवृद्धावभट ने मात्रा का विचार करते हुए कहा है—‘मात्रा’...‘चाहारराशिः’। (अ.सं.सू. १०।९) अर्थात् ‘मात्रा वह है, जो आहार के सभी पदार्थों के परिमाण से तथा प्रत्येक द्रव्य के गुरु-लघु आदि गुणों के समुदाय से ‘आहारराशि’ कही जाती है’। इसके आगे फिर वृद्धावभट ने अ.सं.सू. ११।३-५ में आहार-मात्रा का विस्तृत वर्णन किया है। सु.सू. ४६ के उत्तरार्ध में इस विषय को सूत्र रूप में कहा गया है।

गुरुणामर्धसौहित्यं लघूनां नातिवृत्तता । मात्राप्रमाणं निर्दिष्टं सुखं यावद्भिजीर्यति ॥ २ ॥

मात्रा में गुरु-लघु विचार —गुरु भोजन-पदार्थों को आधी तृप्ति हो जाने पर खाना छोड़ दें और लघु भोजन-पदार्थों को भी अधिक तृप्त होने तक न खायें। वास्तव में भोजन की उचित मात्रा वही है, जो सुखपूर्वक पच जाय ॥ २ ॥

भोजनं हीनमात्रं तु न बलोपचयीजसे । सर्वेषां वातरोगाणां हेतुतां च प्रपद्यते ॥ ३ ॥