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अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

अष्टमोऽध्यायः

अथातो मात्राशितौयमध्यायं व्याख्यास्यामः ।

इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।

अब हम यहाँ से मात्राशितौय नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे, जैसा कि इस विषय में आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।

उपक्रम —इसके पहले ७।५३ में कहा गया है—‘आहारो वर्णितस्तत्र तत्र च वक्ष्यते’। अतएव इस ८वें अध्याय में उस आहार का किस प्रकार मात्रा के अनुकूल सेवन करना चाहिए, इस विषय की चर्चा की जा रही है, क्योंकि यहाँ जो मात्रा शब्द का प्रयोग किया गया है, इसका ताल्य है आहार का सम्यक्योग। यह अशन या आहार सात प्रकार का होता है—१. सकीर्णशन, २. विरुद्धाशन, ३. अमात्राशन, ४. अजीर्णशन, ५. समशन, ६. अध्यशन तथा ७. विषमाशन। इनमें दो के उदाहरण आगे इसी अध्याय में दिये जायेंगे।

संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत —च.सू. ५, च.सू. २७, च.वि. २, च.वि. १५, च.सि. १२, सु.सू. ४६, सु.उ. ५६ एवं अ.सं.सू. १० तथा ११ में देखें।

मात्राशी सर्वकालं स्यान्मात्रा ह्यग्रेः प्रवर्तिका । मात्रां द्रव्याण्यपेक्षन्ते गुरुण्यपि लघून्यपि ॥ १ ॥

आहार-मात्रा का वर्णन —मनुष्य को सदा मात्रा के अनुसार आहार (भोजन) करना चाहिए, क्योंकि उचित मात्रा में किया गया भोजन जठराग्नि को प्रदीप्त करता है। मात्रा का निर्धारण गुरु तथा लघु द्रव्यों को देखकर करना चाहिए, जैसा आगे कहा जायेगा ॥ १ ॥

वक्तव्य —मात्रा का विचार च.सू. ५।४ में संक्षेप से नेपे-तुले शब्दों में किया गया है। इसके आगे च.वि. २।३ में कुछ विशेष ढंग से इसे कहा है—‘आहार करते समय पुरुष को आमाशय की खाली जगह को तीन भागों में इस प्रकार बाँट देना चाहिए; यथा—एक भाग को ठोस आहार-द्रव्यों के लिए, एक भाग द्रव द्रव्यों के लिए और एक भाग वात, पित्त तथा कफ के लिए रखें’। वामभट ने इसी विषय को प्रकारान्तर से आगे कहा है—‘अग्नेन कुक्षेर्द्विषी पानेनैकं प्रपूरयेत् । आश्रयं पवनादीनां चतुर्यमवशेषयेत्’। (अ.हृ.सू. ८।४६) अर्थात् ‘भोजन करते समय आमाशय के दो भागों को रोटी, दाल, भात आदि से भर ले, तीसरे भाग को पेय पदार्थों से भर ले और शेष चौथे भाग को वात-पित्त-कफ की क्रिया के लिए सुरक्षित रखें’। इसके पहले भी श्रीवृद्धावभट ने मात्रा का विचार करते हुए कहा है—‘मात्रा’...‘चाहारराशिः’। (अ.सं.सू. १०।९) अर्थात् ‘मात्रा वह है, जो आहार के सभी पदार्थों के परिमाण से तथा प्रत्येक द्रव्य के गुरु-लघु आदि गुणों के समुदाय से ‘आहारराशि’ कही जाती है’। इसके आगे फिर वृद्धावभट ने अ.सं.सू. ११।३-५ में आहार-मात्रा का विस्तृत वर्णन किया है। सु.सू. ४६ के उत्तरार्ध में इस विषय को सूत्र रूप में कहा गया है।

गुरुणामर्धसौहित्यं लघूनां नातिवृत्तता । मात्राप्रमाणं निर्दिष्टं सुखं यावद्भिजीर्यति ॥ २ ॥

मात्रा में गुरु-लघु विचार —गुरु भोजन-पदार्थों को आधी तृप्ति हो जाने पर खाना छोड़ दें और लघु भोजन-पदार्थों को भी अधिक तृप्त होने तक न खायें। वास्तव में भोजन की उचित मात्रा वही है, जो सुखपूर्वक पच जाय ॥ २ ॥

भोजनं हीनमात्रं तु न बलोपचयीजसे । सर्वेषां वातरोगाणां हेतुतां च प्रपद्यते ॥ ३ ॥

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अष्टाङ्गहृदये

हीन मात्रा वाले आहार से हानि—हीन ( कम ) मात्रा वाला भोजन बल, शरीरपुष्टि तथा ओजस् को नहीं बढ़ाता है और इस प्रकार का भोजन सभी प्रकार की वातव्याधियों की उत्पत्ति का कारण होता है॥ ३॥

अतिमात्रं पुनः सर्वांनाशु दोषान् प्रकोपयेत्।

अधिक मात्रा वाले आहार से हानि—मात्रा से अधिक किया गया आहार वात आदि सभी प्रकार के दोषों को शीघ्र ही प्रकृपित कर देता है।

पीड्यमाना हि वाताद्या युगपत्तेन कोपिताः॥ ४॥

आमेनात्रेन दुष्टेन तदेवाविश्य कुर्वते। विष्टम्भयन्तोऽलसकं च्यावयन्तो विसूचिकाम्॥ ५॥

अधरोत्तरमार्गाभ्यां सहस्रैवाजितात्मनः।

विसूचिका के लक्षण—ऊपर कहे गये अतिमात्रा वाले आहार का सेवन कर लेने से पीड़ित वात आदि दोष उस आम ( न पचे हुए ) तथा दूषित आहार से एक साथ कृपित होकर एवं उसी आहार में मिलकर आमाशय की गति को रोककर 'अलसक' नामक रोग को पैदा कर देते हैं। उस अजितात्मा पुरुष के ऊपर तथा नीचे के मार्ग से अर्थात् मुख एवं गुद मार्ग से क्रमशः वमन तथा अतिसार के रूप में आहार पदार्थ को निकालते हुए 'विसूचिका' नामक रोग को पैदा कर देते हैं॥ ४-५॥

प्रयाति नोर्ध्वं नाधस्तादाहारो न च पच्यते॥ ६॥

आमाशयेऽलसीभूतस्तेन सोऽलसकः स्मृतः।

अलसक की परिभाषा—अलसक रोग होने के पहले जो आहार खाया गया था, वह न तो ऊपर ( मुख ) की ओर से निकलता है और न नीचे ( गुदमार्ग ) से निकलता है, न वह पचता ही है। वह आमाशय में आलसी की भाँति पड़ा रहता है, अतएव इस रोग को 'अलसक' कहा जाता है॥ ६॥

विविधैर्वेदनोद्भेदाभ्याद्विभुशकोपतः॥ ७॥

सूचीभिरिव गात्राणि विध्यतीति विसूचिका।

विसूचिका की परिभाषा—वात आदि दोषों के अत्यन्त प्रकृपित हो जाने के कारण अनेक प्रकार की वेदनाओं की उत्पत्ति होने से जो बार-बार सूर्य की भाँति शरीरावय को बंधती रहती है, उसे 'विसूचिका' कहते हैं॥ ७॥

वक्तव्य—'विसूचिका' शब्द में श, ष, स इन तीनों का प्रयोग यत्र-तत्र देखा जाता है। जैसे—कलश, कलस आदि। विसूचिका—इसमें आम आहार वमन एवं विरेचन के रूप में बार-बार निकलता रहता है। अलसक—इसमें आम आहार आमाशय में पड़ा ही रहता है और वह पचता भी नहीं। इसका उक्त नाम इसके लक्षणों के अनुरूप है।

तत्र शूलप्रमानाहकम्पस्तम्भादयोऽनिलात्॥ ८॥

पिताञ्च्वरातिसारान्दर्हातृष्टुप्रलयायः। कफाच्छर्द्वज्जगुरुतावाक्सङ्घोषिनादयः॥ ९॥

विसूचिका के लक्षण—वातदोष से शूल, चक्करों का आना, आनाह, कैंपकैपी का होना तथा स्तम्भ ( जड़ता ) ये लक्षण होते हैं। पित्तदोष से ज्वर, अतिसार, भीतर से जलन, बार-बार प्यास का लगना एवं प्रलाप ( अंत-संत बकाना ) ये लक्षण होते हैं। कफदोष से छर्दि ( वमन ), शरीर के अवयवों में भारीपन, बोलने में रुकावट तथा लार का चूना ये लक्षण होते हैं॥ ८-९॥

विशेषादुर्बलस्याल्पवहेर्वगविधारिणः। पीडितं मारुतेनात्रं श्लेष्मणा रुद्धमन्तरा॥ १०॥

अलसं क्षोभितं दोषैः शल्यत्वेनैव संस्थितम्। शूलादीन् कुस्ते तीव्रांश्चर्द्वतीसारवर्जितान्॥ ११॥

सोऽलसः—

मात्राशिलीयाध्यायः ८ ]

सूत्रस्थानम्

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अलसक का वर्णन—यह रोग विशेष करके दुर्बल, मन्द अग्निवाले, वात, मूत्र तथा मल के वेगों को रोकने वाले पुरुष को होता है। इसमें खाया गया आहार वात द्वारा पीड़ित एवं कफ के कारण आमाशय में रोका गया स्वयं वह गतिहीन हो जाता है। वात आदि दोषों द्वारा हिलाया-डुलाया जाने पर भी वह आमाशय में शल्य के रूप में स्थित रहता है तथा कष्टकारक शूल आदि विकारों को तो करता है, किन्तु इसमें वमन-विरेचन नहीं होते, अतः इस रोग को अलस या अलसक कहते हैं॥ १०-११॥

—अत्यर्थदुष्प्रास्तु दोषा दुष्प्रामबद्धाः। यान्तस्तियर्क्तुं सर्वं दण्डवत्तस्मभ्यन्ति चेत्॥ १२॥ दण्डकालसकं नाम तं त्यजेदाशुकारिणम्।

दण्डालसक का वर्णन—ऊपर कहे गये कारणों से वात आदि दोष अत्यन्त कुपित तथा दूषित होकर आम (अपचय) अन्न द्वारा मुख एवं गुद मार्ग के रुक जाने के कारण ये तिर्यग्वाही अर्थात् रसवाही प्रोटों द्वारा समस्त शरीर में फैलकर सम्पूर्ण शरीर को दण्ड (डण्डा) के समान जड़ कर देते हैं। अतः इस रोग को दण्डालसक कहते हैं। यह रोग शीघ्र मारक होता है, इसकी चिकित्सा करना छोड़ देनी चाहिए॥ १२॥

वक्तव्य—अ.सं.सू. ११५१ में विस्चिका के असाध्य लक्षणों का वर्णन किया है। इनका अवलोकन कर लें।

विरुद्धाध्यशनाजीर्णशीलिनो विषलक्षणम्॥ १३॥

आमदोषं महाघोरं वज्येद्विषसंज्ञकम्। विषरूपाशुकारित्वाद्विरुद्धोपक्रमत्वतः॥ १४॥

आमविष का वर्णन—विरुद्धअशन (अ.हृ.सू.७।३१), अध्यशन (इसी अध्याय का ३४वाँ पद्य) तथा अजीर्ण अवस्था में भी आहार करने वाले पुरुष का आमदोष अत्यन्त कष्टदायक होता है, इसीलिए इसे 'आमविष' कहते हैं। यह विष के समान अपना शीघ्र प्रभाव दिखलाता है और इसकी यदि चिकित्सा की जाती है तो उसका प्रभाव भी विपरीत ही होता है॥ १३-१४॥

वक्तव्य—'विरुद्धोपक्रमत्व'—यह आमविष विष के समान गुणों वाला होता है, अतः विष की शीत प्रधान चिकित्सा की जाती है और आमदोष में उष्ण उपचार करने का विधान है, अतएव यह विरुद्धोपक्रम होता है, जिससे सफलता नहीं मिल पाती। चरक ने भी उक्त विषय का प्रतिपादन इस प्रकार किया है—'विरुद्धाध्यशनाजीर्णशनीलिनाः पुनरामदोषमामविषमित्यावक्ष्यते भिषजः'। (च.वि. १।१२) ठीक इसी का पद्यानुवाद श्रीवामट ने किया है। यद्यपि विषरोगी की चिकित्सा की जाती है, वह नीरोग भी होता है, किन्तु यहाँ (आमविष में) परिस्थिति का भेद है, अतएव यह विरुद्धोपक्रम होता है। इस आमविष का जब प्रकोप होता है तो ऐंठन या मरोड़ के साथ चावल के धोअन का जैसा वमन या विरेचन होता देखा जाता है। प्रायः इसका स्वरूप 'आमालिसार' जैसा होता है।

अथाममलसोभूतं साध्यं त्वरितमृलिल्लेखेत्। पीत्वा सोप्रापदुर्फलं वार्युष्णं योजयेत्ततः॥ १५॥

स्वेदनं फलवर्ति च मलवातानुलोमनीम्। नाम्यमानानि चाङ्गानि भृशं स्विन्नानि वेष्टयेत्॥ १६॥

आमदोष की चिकित्सा—जब आमदोष अलसक के रूप में परिणत हो गया हो और साध्यता के लक्षणों से युक्त हो, तब उसे बाल्यवच, पटु (नमक) एवं फल (मैनफल) को गरम पानी में मिलाकर पिलायें, जिससे शीघ्र ही वमन हो अर्थात् उस रोगी को यह वमनकारक पेय पिलाकर शीघ्र वमन करायें। उसके बाद उसे स्वेदन करायें और फिर उसे मल तथा अपानवायु को अनुलोम कराने वाली फलवर्ति का प्रयोग करायें। यदि इस समय आमदोष की विकृति के कारण उसके अंगों में सिकुड़न आ रही हो तो उन्हें पर्याप्त स्वेदन कराकर वस्त्र आदि से कसकर बाँध दें॥ १५-१६॥

वक्तव्य—'फलवर्ति' नामक जिस योग की चर्चा खारणदि ने यहाँ की है, वह इस प्रकार है—'शूले तु स्तिमिते सामे स्वेदः शस्तो मुद्गर्मुहुः। ह्युष्णोः कटुकैः पांशुकीरषिकतादिभिः॥ पिपल्योऽगारधूमश्र मदनं

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अष्टाङ्गहृदये

सर्पपास्त्रिवृत् । हेमक्षीरी वचा किण्वं कुण्डं दन्ती यवाग्रजः ॥ समूत्रलवणाभ्यक्ता फलवर्तिरियं हिता । संसेद्यालसके शूलविबन्धानाहनाशिनी ॥ अर्थ प्रायः स्पष्ट है। दूसरी फलवर्ति का योग श्रीचक्रमाणि ने 'उदावर्तचिकित्सा' श्लोक १३ चन्द्रदत्त में दिया है। श्रीअरुणदत्त ने अपनी व्याख्या में एक फलवर्ति का योग इस प्रकार दिया है—'विपाच्च मुत्राम्लमधुनि दन्तीपिण्डीतकुष्णाविडधूमकुष्ठैः । वर्ति कराङ्गुष्ठनिभां घृतात्कां गुदे रूजानाहहरीं विदध्यात् ॥ यदि ये वर्तियां समय पर उपलब्ध न हों तो किसी अन्य मूल तथा वात को अनुलोमन करने वाली वर्ति का प्रयोग किया जा सकता है।

विसूच्यामतित्वद्वयां पाण्योर्दाहः प्रशस्यते। तदहश्चोपवास्येनं विरिक्तवदुपाचरेत् ॥ १७ ॥

पार्णिदाह-प्रयोग—यदि विसूची (हैजा) रोग का वेग अधिक बढ़ गया हो तो दोनों एडियों में दाहकर्म करना चाहिए, इसकी प्रशंसा की गयी है। उस दिन इस रोगी को उपवास कराकर विरिक्त की भांति इसका उपचार करें ॥ १७ ॥

वक्तव्य—विसूची के वेग के अधिक बढ़ जाने पर जो ऊपर पार्णिदाह की चर्चा की गयी है, वह वास्तव में रोगी की बेहोशी को दूर करने के लिए है। इसका उल्लेख सुश्रुत में भी है। देखें—सू.उ. ५६।१२। ध्यान दें—सुश्रुत ने कहा है कि यह दाह कर्म तभी करे जब रोगी साध्य हो। विरिक्तवदुपाचरेत्—वमन कराने के बाद रोगी को संसर्जन क्रम में रखा जाता है, इसे बाद में पेया, विलेपी देकर स्वस्थ होने पर भोजन दिया जाता है। इसकी विस्तृत विधि देखें—अ.हृ.सू. १८।

तीव्रार्तिरपि नाजीर्णो पिबेच्छूलज्जनमौषधम्। आमसन्नाऽन्तले नालं पक्तुं दोषौषधाशनम् ॥ १८ ॥ निहत्यादपि चैतौषां विभ्रमः सहसाऽऽतुरम्।

अन्य उपचार—अत्यन्त वेदना होने पर भी जीर्णों का रोगी शूलनाशक औषध का पान न करे, क्योंकि आमदोष के कारण मन्द जठराग्नि वात आदि दोषों, औषध तथा अशन (पहले खाये गये आहार) को पचाने में समर्थ नहीं होता है। कभी ऐसा भी होता है कि दोष, औषध एवं आहार का विभ्रम (समुचित प्रयोग न हो पाना) रोगी को सहसा मार सकता है ॥ १८ ॥

वक्तव्य—च.वि. २।१३ का यह गद्य वाग्भट के उक्त पद्यरचना का मूल स्रोत रहा है।

जीर्णाशने तु भेषज्यं युज्य्यात् स्तब्धगुरुदरे ॥ १९ ॥

दोषशेषस्य पाकार्थमग्नेः सन्धुक्षणाय च।

भोजन के पच जाने पर भी यदि पेट में स्तब्धता एवं भारीपन प्रतीत होता है, तो शेष दोष को पचाने के लिए और जठराग्नि को मुल्लगाने अर्थात् तीव्र करने के लिए औषध-योगों का प्रयोग करें ॥ १९ ॥

शान्तिरामविकाराणां भवति त्वपतर्पणात् ॥ २० ॥

त्रिविधं त्रिविधे दोषे तत्समीक्ष्य प्रयोजयेत्।

अपतर्पण-प्रयोग—आमदोषजनित विकारों की शान्ति करने के लिए अपतर्पण (तर्पण = चकाचक भोजन करना, इसके विपरीत उपवास-लंघन = अपतर्पण) का प्रयोग करना चाहिए और उस अपतर्पण का प्रयोग तीन प्रकार के दोषों में तीन प्रकार (अल्प, मध्य, प्रधान भेद) से विचार करके करना चाहिए ॥ २० ॥

तत्रालपे लङ्घनं पथ्यं, मध्ये लङ्घनपाचनम् ॥ २१ ॥

प्रभूते शोधनं, तद्वि मूलादुमूलयेन्मलात्।

यदि आमदोष अल्पमात्रा में हो तो लंघन (उपवास) करना ही हितकर होता है। मध्यम श्रेणी का आमदोष हो तो इसमें लंघन के साथ-साथ दोष को पचाने वाले औषध-द्रव्यों का भी प्रयोग करना चाहिए। यदि आमदोष अधिक मात्रा में हो तो वमन तथा विरंजन करायें, क्योंकि यह शोधन कर्म उक्त आमदोष को जड़ से उखाड़ देता है ॥ २१ ॥

मात्राशितौषध्यायः ८ ]

सूत्रस्थानम्

१३९

एवमन्यानिप व्याधीन् स्वनिदानविपर्ययात् ॥ २२ ॥

चिकित्सेदनुबन्धे तु सति हेतुविपर्ययम् । त्यक्त्वा यथायथं वैद्यो युज्यादव्याधिविपर्ययम् ॥ २३ ॥

हेतुविपरीत आदि चिकित्सा—इसी प्रकार ज्वर आदि अन्य रोगों की भी अपने-अपने निदान ( हेतु ) के विपरीत चिकित्सा करे । यदि ऐसा करने पर भी रोग शान्त न हो तो उसे छोड़कर चिकित्सक यथोचित अवसर देखकर व्याधिविपरीत औषध-योगों का प्रयोग करे ॥ २२-२३ ॥

तदर्थकारि वा, पक्वे दोषे त्विद्धे च पावके । हितमभ्यञ्जनस्नेहपानबस्त्यादि युक्तितः ॥ २४ ॥

विपरीतार्थकारी चिकित्सा—अथवा विपरीतार्थकारी चिकित्सा-विधि का प्रयोग करना चाहिए । जब इस प्रकार दोष का पावन हो जाता है और जठराग्नि प्रदीप्त हो जाती है, तो विधिपूर्वक अभ्यञ्जन ( तैलमर्दन ), स्नेहपान तथा बस्ति आदि का प्रयोग करना चाहिए ॥ २४ ॥

बक्तव्य—‘तदर्थकारि’—तत् अर्थात् निदान, व्याधिविपर्यय द्वारा साध्य, जो ‘अर्थ’ रोगशान्तिरूप लक्षण को करने का स्वभाव है, जिसका इस प्रकार की चिकित्सा अथवा जैसे मदात्यय रोग में पुनः मद्यपान कराना, अतिसार में विरेचन कराना आदि । ‘बस्त्यादि’—यहाँ आदि शब्द से रसायन आदि चिकित्सा-विधियों की ओर संकेत है ।

अजीर्णं च कफादामं तत्र शोफोऽक्षिगण्डयोः । सद्योभुक्त इबोद्गारः प्रसेकोक्त्तलेशगौरवम् ॥ २५ ॥

आमाजीर्ण के लक्षण—कफदोष के प्रकोप से आमाजीर्ण होता है । इसके लक्षण—आँखें तथा गालों पर शोथ, तत्काल खाये हुए आहार के अनुरूप उद्गारों ( डकारों ) का आना, लालाझाव, जो मिचलाना तथा शरीर में भारीपन—ये लक्षण होते हैं ॥ २५ ॥

विष्टब्धमनिलाच्चूलविबन्धाधमानसादकृत ।

विष्टब्धाजीर्ण के लक्षण—वातदोष के प्रकोप से विष्टब्धाजीर्ण होता है । इसमें पेट में शूल, मल-मूत्र एवं अपानवायु के निकलने में रुकावट, अफरा एवं शरीर में दीलापन—ये लक्षण होते हैं ।

पिताद् विदग्धं तुण्मोहभ्रमाम्लोद्गारदाहवत् ॥ २६ ॥

विदग्धाजीर्ण के लक्षण—पित्तदोष के प्रकोप से विदग्धाजीर्ण होता है । इसमें बार-बार प्यास लगना, मोह ( बेहोशी ), चक्करों का आना, खट्टे डकारों का आना एवं जलन का होना—ये लक्षण होते हैं ॥ २६ ॥

लङ्घनं कार्यमामे तु, विष्टब्धे स्वेदनं भृशम् । विदग्धे वमनं, यद्वा यथावस्थं हितं भवेत् ॥ २७ ॥

चिकित्सा-सूत्र—आमाजीर्ण में रोग के अनुसार पूर्ण लंघन ( उपवास ) करे या लघुभोजन करे । विष्टब्धाजीर्ण में बार-बार पेट के ऊपर स्वेदन करे, इससे वातदोष का अनुलोमन होता है । विष्टब्धाजीर्ण में तब तक वमन कराना चाहिए जब तक वमन में पित्त का दर्शन न हो जाय । अन्य लक्षणों की शान्ति के लिए परिस्थिति के अनुसार समयोचित चिकित्सा करनी चाहिए ॥ २७ ॥

गरीयसो भवेल्लीनादामादेव विलम्बिका । कफवातानुबद्धाऽऽमलिङ्ग तत्समसाधना ॥ २८ ॥

विलम्बिका के लक्षण—भयावह आमदोष जो लीन ( छिपा ) रहता है, उसी से यह विलम्बिका रोग हो जाता है । इसमें कफ एवं वात दोष युक्त आमाजीर्ण के लक्षण होते हैं और ऊपर कहे गये कफ-वात-दोष सम्बन्धित अजीर्णों के समान ही इसकी भी चिकित्सा होती है ॥ २८ ॥

बक्तव्य—‘लीन’ शब्द की चरितार्थता—वमन-विरेचन से सामान्य आमदोष निकल जाता है, ऐसा ऊपर कहा गया है, किन्तु यह आमदोष उक्त उपायों से भी नहीं निकल पाता, अतएव इसे लीन ( सटा हुआ ) कहा गया है । सूश्रुत ने इसका वर्णन इस प्रकार किया है—‘दुष्टं तु भुक्तं कफमाक्षताभ्यां प्रवर्तते नोर्ध्वमध्य यस्य । विलम्बिकां तां भृशदुश्चिकित्सामाचक्षते शास्त्रविदः पुराणाः’ ॥ ( मु. उ. ५६९ ) सुश्रुत

१४०

अष्टाङ्गहृदये

ने इसे अन्य आमदोषों से अतिकष्टसाध्य कहा है। अतएव इसका नाम भी विलम्बिका (लीचड़ रोग) रखा है। महर्षि वामदेव ने इस आमदोष के लिए 'लीन' शब्द (सट जाने वाला) का युक्तियुक्त प्रयोग किया है।

अश्रद्धा हृद्व्यथा शुद्धेऽप्युद्गारे रसशेषतः । शयीत किञ्चिदेवात्र सर्वश्रानाशितो दिवा ॥ २९ ॥

स्वप्यादजीर्णी, सज्जातबुभुक्षोऽद्यान्मिन्तं लघु।

रसशेषाजीर्ण-चिकित्सा—रसशेषाजीर्ण में आहार के पच जाने पर भी जब रस का परिपाक नहीं हो पाता है, तब ये लक्षण होते हैं—उद्गारों (डकारों) के शुद्ध आने पर भी रस के अपक्व रह जाने से भोजन के प्रति असन्धि तथा हृदय में पीड़ा होती रहती है।

उपचार—इस दशा में दिन में कुछ खाये-पीये बिना थोड़ा सो जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त अन्य अजीर्णरोगी भी दिन में सो जायें और भलीभाँति भूख लगने पर थोड़ी मात्रा में लघु (सुपच) आहार का सेवन करें ॥ २९ ॥

विवग्धोऽतिप्रवृत्तिर्वा ग्लानिर्माश्रुतमूकता ॥ ३० ॥

अजीर्णलिङ्गं सामान्यं विष्टम्भो गौरवं भ्रमः ।

अजीर्ण का सामान्य लक्षण—अजीर्ण के सामान्य लक्षण इस प्रकार हैं—मल का खुलकर न होना अथवा अधिक (अतिसार के रूप में) निकलना, ग्लानि (मन का मलिन रहना), वायु का अनुलोम न होना अर्थात् ठीक ढंग से डकार एवं अपानवायु के रूप में न निकल पाना, विष्टम्भ (आमाशय में स्वाभाविक गति का न होना), पेट तथा सम्पूर्ण शरीर में भारीपन का होना एवं चक्करों का आना ॥ ३० ॥

न चातिमात्रमेवात्रामादोपाय केवलम् ॥ ३१ ॥

द्विष्टविष्टम्भिदग्धामगुरुक्षहिमाशुचि । विदाहि शुष्कमत्यम्बुलुप्तं चात्रं न जीर्यति ॥ ३२ ॥

उपतप्तेन भुक्तं च शोकक्रोधक्षुदादिभिः ।

अजीर्ण के विविध कारण—केवल अधिक मात्रा में खाया हुआ आहार ही आमदोष का कारण नहीं होता है, अपितु इसके अन्य अनेक कारण हैं। यथा—द्विष्ट (जिसे खाने की इच्छा न हो), विष्टम्भकारक, जला हुआ, आम (भलीभाँति न पका हुआ), गुरु (देर में पचने वाला), रूक्ष (स्नेह रहित), शीत (बासी), अपवित्र, विदाहकारक, अत्यन्त सूखा, अधिक पानी पीने से अथवा थोड़ा भी जल न पीने से खाया हुआ भोजन नहीं पचता। बड़ी देर से भूख लगने के बाद में खाया हुआ भोजन भी नहीं पचता तथा शोक, क्रोध आदि से पीड़ित होने के बाद में खाया हुआ भोजन भी ठीक प्रकार से नहीं पचता ॥ ३१-३२ ॥

वक्तव्य—'क्षुदादिभिः'—यहाँ प्रयुक्त आदि शब्द से काम, क्रोध, लोभ, मोह, लज्जा, अपमान, तिरस्कार, भय और घबड़ाहट की स्थिति में खाया गया आहार समुचित प्रकार से नहीं पचता है। ऊपर की चतुर्थ पंक्ति का अर्थ इस प्रकार करना चाहिए—'शोकक्रोधक्षुदादिभिः उपतप्तेन (पुंसा) भुक्तम्'। शोक, क्रोध आदि मानसिक विकृतियाँ भोजन करते समय जो तन्मयता होती चाहिए, उसमें बाधा पहुँचाती हैं, क्योंकि चरक का आदेश है—'तन्मना भुज्यते' (च.वि. १।२५)। इसके अतिरिक्त इस अध्ययन में भोजन कैसे करना चाहिए, इसका विधिपूर्वक वर्णन किया है, इसे पढ़कर तब भोजन करें। आज भी जो अनशन किया करते हैं, उन्हें पहले फलों का रस ही दिया जाता है, न कि पूर्ण भोजन।

मिश्रं पथ्यमपथ्यं च भुक्तं समशनं मतम् ॥ ३३ ॥

विद्यादध्यशतं भूयो भुक्तस्योपरि भोजनम् । अकाले बहु चाल्यं वा भुक्तं तु विषमाशनम् ॥ ३४ ॥

त्रीण्यप्येतानि मृत्युं वा घोरान् व्याधीन् सुजन्ति वा ।

समशन आदि के लक्षण—पथ्य (हितकर) तथा अपथ्य (अहितकर) प्रकार के भोजनों को मिलाकर जो खाया जाता है, उसे 'समशन' कहते हैं। अभी भोजन किया है, वह पचा नहीं तब तक जो पुनः

मात्राशितौप्याध्यायः ८ ]

सूत्रस्थानम्

१४१

भोजन कर लिया जाता है, उसे 'अध्याशन' कहते हैं। असमय में अधिक या थोड़ा जो भोजन किया जाता है, उसे 'विषमाशन' कहते हैं। ये तीनों प्रकार के 'अशन' घोर (कष्टकारक) रोगों को उत्पन्न कर देते हैं अथवा मृत्युकारक होते हैं ॥ ३३-३४ ॥

बक्तव्य— चरक-विमानस्थान १।२५ में निर्दिष्ट विधियों के विपरीत ये तीनों अशन हैं; अतएव ये हानिकारक होते हैं। 'समशन' शब्द उक्त अर्थ में आयुर्वेद ने स्वीकार किया है, अन्यत्र इसका अर्थ—'सम्यक् अशन' भी हो सकता है। आहार जीवन को धारण करने वाले उपस्तम्भों में सर्वप्रथम है, अतः इसका विधिवत् सेवन करना ही चाहिए। उक्त तीनों प्रकार के अशन आहार की विकृतियाँ हैं। सुश्रुत में आहार-विधि का उत्तम वर्णन किया है। आप भी देखें, पढ़ें तथा इसे व्यवहार में लायें—सु.सू. ४६।४४ से ४९५ तक और देखें—अ.सं.सू. ११।६३।

काले सात्त्व्यं शुचि हितं स्निग्धोष्णं लघु तन्मनाः ॥ ३५ ॥

षड्रसं मधुरप्रायं नातिद्रुतबिलम्बितम्। स्नातः भुद्धान् विविक्तस्थो धीतपादकरानतः ॥ ३६ ॥

तर्पयित्वा पितॄन् देवानतिथीन् बालकान् गुरुन्। प्रत्यवेक्ष्य तिरश्चोऽपि प्रतिपन्नपरिग्रहान् ॥

समीक्ष्य सम्यगात्मानमतिन्द्रव्रवन् द्रवम्। इष्टमिष्टैः सहशनीयाच्छुचिभक्तजनहृतम् ॥ ३८ ॥

शास्त्रीय भोजन-विधि— उचित समय पर, सात्त्व्य (प्रकृति के अनुकूल), पवित्र, स्वास्थ्यवर्धक, स्निग्ध, गरमागरम, लघु (सुपाच्य), मन लगाकर, छः रसों से युक्त, जिसमें मधुररस वाले पदार्थ अधिक हों; इस प्रकार के भोज्य पदार्थों को न बहुत जल्दी और न बहुत देर करके खाना चाहिए। स्नान करके, भूख लग जाने पर, एकान्त में बैठकर, हाथ, मुख तथा पैरों को धोकर, पितरों, देवताओं, अतिथियों, बच्चों तथा बूढ़ों को तृप्त करकर, पशु-पक्षियों का ध्यान देकर, अतिथियों एवं परिवारजनों के भोजन की व्यवस्था करके; अपने शरीर की वर्तमान स्थिति का विचार करता हुआ, भोजन की निन्दा न करता हुआ मौन होकर मित्रों के साथ बैठकर, पवित्र सेवकों द्वारा परोसा गया रुचिकर एवं द्रवप्राय भोजन का सेवन करे ॥ ३५-३८ ॥

बक्तव्य— श्लोक की रचना में पदों को व्यवस्थित करने की एक समस्या होती है, उन्हें व्यवस्थित करने के लिए अन्यत्र का सहारा लेना पड़ता है। इस दृष्टिकोण से आप उक्त पद्यों को देखें—'स्नातः विविक्तस्थः देवान् (ऋषीन्) पितॄन् तर्पयित्वा, अतिथीन् बालकान् गुरुन् च तर्पयित्वा, प्रतिपन्नपरिग्रहान् तिरश्चोऽपि प्रत्यवेक्ष्य सम्यक् आत्मानं समीक्ष्य'... 'धीतपादकरानतः इष्टैः सह शुचिभक्तजनहृतं इष्टं, द्रवं च अशनीयात्'।

भोजनं तुणैकेशादिजुष्टमुष्णीकृतं पुनः। शाकावराश्रभूयिष्ठन्त्युष्णलवणं त्यजेत् ॥ ३९ ॥

त्याज्य भोजन— जिस भोजन में तिनके, केश (बाल), मक्खी आदि पड़े हों, जो फिर से गरम किया गया हो अर्थात् जो एक बार ठण्डा हो चुका हो, जिसमें शाक अथवा कुत्सित (निर्वीर्य) अन्न अधिक मात्रा में डाले गये हों, जो अत्यन्त गरम हो या उष्णवीर्य हो या जिसमें अधिक नमक पड़ा हो, ऐसे भोजन-पदार्थों का परित्याग कर देना चाहिए ॥ ३९ ॥

किलाटवधिकूर्चकाक्षारशुक्ताममूलकम्। कृशशुष्कवराहविगोमत्सम्यमहिषामिषम् ॥ ४० ॥

माषनिष्पावशालूकबिसपिष्टबिरुद्धकम्। शुष्कशाकानि यवकान् फाणितं च न शीलयेत् ॥

असेवनीय आहार— किलाट, दही, कूर्चका, क्षार, शुक्त, कच्छी मूली, कृश प्राणी का मांस, सुखाया गया मांस, सूअर, गाय, मछली तथा भैंस का मांस, उड़द, निष्पाव (उबले हुए धान्य), शालुककन्द, विसकन्द, पीठी के द्वारा निर्मित पदार्थ, अंकुरित अन्न, सुखाये गये शाक, यवक (जई) नामक अन्न एवं राब—इनका अधिक मात्रा में निरन्तर सेवन न करे ॥ ४०-४१ ॥

शीलयेच्छालिगोधूमवषष्ठिकजाङ्गलम्। सुनिषण्णकजीवन्तीबालमूलकवास्तुकम् ॥ ४२ ॥

पथ्यामलकमृद्वीकापटोलीमुद्गशर्कराः। घृतद्विष्योदकक्षीरसौद्रवादिसैन्धवम् ॥ ४३ ॥

१४२

अष्टाङ्गहृदये

सेवनीय आहार—शालिधान्य, गेहूँ, जौ, साँठी, जांगल देश के प्राणियों के मांस, सुनिषण्णक, जीवन्ती, मुलायम मूली, बथुआ, हरीतकी, आँवला, मुनक्ता, परबल, मूँग, चीनी, घृत, दिव्योदक ( गंगा का जल ), दूध, मधु, दाडिम ( अनार ) तथा संधानमक—इन द्रव्यों का सदा सेवन करें ॥ ४२-४३ ॥

त्रिफलां मधुसर्पिभ्यां निशि तैत्रबलाय च । स्वास्थ्यानुवृत्तिकृद्यच्च रोगोच्छेदकरं च यत् ॥ ४४ ॥

रात में सेवनीय पदार्थ—द्रुष्टि की शक्ति को बढ़ाने के लिए रात में मधु तथा घी में मिलाकर त्रिफला का सेवन करें। जो-जो द्रव्य स्वास्थ्य की रक्षा करने वाला तथा रोगनाशक हो उस-उस का भी निरन्तर सेवन करें ॥ ४४ ॥

बिसेक्षुमोचचोचाग्रमोदकोत्कारिकादिकम् । अद्यादव्यं गुरु स्निग्धं स्वादु मन्दं स्थिरं पुरः ॥

विपरीतमतश्रान्ते मध्येऽम्ललवणोत्कटम्।

अन्य पदार्थों को खाने की विधि—विस ( कमलकन्द ), ईब, केला, चोच ( नारियल, तालफल, बड़हर या कटहर ), आम, लड्डू, उत्कारिका ( लपसी या हलुआ ) तथा अन्य गुरु, स्निग्ध, स्वादु, मन्द एवं स्थिर पदार्थों को भोजन के आरम्भ में खाना चाहिए। उक्त द्रव्यों के विपरीत गुण वाले आहार-द्रव्यों को अन्त में खाये और बीच में अम्ल तथा लवण रस-प्रधान द्रव्यों का सेवन करें ॥ ४५ ॥

बक्तव्य—उक्त विवेचन का निष्कर्ष यह निकला कि वातशामक भोजन-द्रव्यों का प्रयोग प्रारम्भ में, कफशामक द्रव्यों का अन्त में और अग्निवर्धक द्रव्यों का प्रयोग भोजन के मध्य में करना चाहिए। अर्थात् लवण आदि रसों के अन्त में 'मधुरेण समापयेत्' सूक्ति का अनुसरण करें और मधुररस-प्रधान आहार द्रव्यों के अन्त में 'भोजनान्ते पिबेत् तक्रम्' का स्मरण अवश्य कर लेना चाहिए, क्योंकि 'न तक्रसेवी व्यथते कदाचित्'।

अत्रेन कुक्षेद्वीवंशो पानेनैकं प्रूरयेत् ॥ ४६ ॥

आश्रयं पवनादीनां चतुर्थमवशेषयेत्।

आमाशय के चार भाग—कुक्षि ( आमाशय ) को चार भागों में बाँटकर उसके दो भागों को अन्न ( दाल, भात, रोटी, तरकारी आदि ) से भर लें, एक अर्थात् तीसरे भाग को पेश पदार्थों ( दूध, काँजी, जल आदि ) से भर लें और शेष चौथे भाग में वात-पित्त-कफ दोष अपनी क्रिया कर सकें, इसके लिए खाली छोड़ दें ॥ ४६ ॥

बक्तव्य—यह पद्य अविकलरूप से अ.सं.सू. १०।५५ में भी आया है। चरक में कुक्षि के तीन भाग करने को कहा है, यह अपनी व्यवस्था है। देखें—च.वि. २।३। इनके अनुसार भक्ष्य एवं पेश आदि को दो भागों में और एक भाग दोषों की गति के लिए छोड़ना चाहिए। इस विधि से अजीर्ण आदि रोग नहीं हो पाते। उक्त पद्य अन्यत्र इस प्रकार देखा जाता है—'द्वौ भागौ पूरयेदत्र तोयमेकेन पूरयेत्। माहृतस्य प्रचाराथं चतुर्थमवशेषयेत्' ॥ आशय दोनों का समान है। उक्त प्रकार के कुक्षि-विभाजन से 'अर्धसौहित्यं' तथा 'नातितुप्तता' का अनुमान सुखपूर्वक लगाया जा सकता है।

अनुपानं हिमं वारि यवगोधूमयोर्हितम् ॥ ४७ ॥

दन्ति मद्ये विषे क्षौद्रे, कोष्णं पिष्टमयेषु तु। शाकमुद्गादिविकृतो मस्तुतक्राम्लकाजिकम् ॥ ४८ ॥

सुरा कृशानां पुष्टचर्यं स्थूलानां तु मधूदकम्। शोषे मांसरसो, मद्यं मासे स्वल्पे च पावके ॥ ४९ ॥

व्याध्यापिधाध्वभाष्यस्त्रीलङ्घनातपकर्मभिः। क्षीणे वृद्धे च बाले च पयः पथ्यं यथाऽमृतम् ॥

विविध प्रकार के अनुपान—गेहूँ तथा जौ का, दही, मद्य, विष या विषयुक्त औषध-द्रव्यों तथा मधु का अनुपान शीतल जल है। पीठी आदि से बने हुए ( कलौडी आदि ) भक्ष्य पदार्थों का अनुपान गुनगुना जल है। विविध प्रकार के शाकों, मूँग, उड़द आदि द्वारा बनाये गये बड़ा आदि पदार्थों का अनुपान मस्तु

मात्राशितौषध्यायः ८ ]

सूत्रस्थानम्

१४३

(दही का पानी), मठा, खट्टी काँजी है। कुश (दुबले) पुरुषों को पूए करने के लिए सुरा अनुपान के रूप में दें। स्थूल पुरुषों को कुश करने के लिए मधु मिला हुआ जल पीने के लिए दें। शोष (क्षय) रोग में मांसरस (शोरवा) पीने के लिए दें। मांस खाने के बाद तथा अग्नि के मन्द पड़ जाने पर अनुपान के रूप में मद्य पीने को दें। रोग, औषधसेवन, रास्ता चलने से थकने पर, भाषण, मैथुन (स्त्रीसहवास), लंघन, धूप लगाना, काम करने से क्षीण, बालक तथा वृद्ध—इत सबको अनुपान में दूध दें। यह इनके लिए अमृत के समान हितकर होता है ॥४७-५०॥

विपरीतं यदत्रस्य गुणैः स्यादविरोधि च। अनुपानं समासेन, सर्वदा तत्प्रशस्यते ॥५१॥

उत्तम अनुपान —संक्षेप में उत्तम अनुपान का यह सूत्र है—जो अन्न (आहार) के गुणों से विपरीत गुणों वाला हो, किन्तु उन आहार-द्रव्यों का विरोधी न हो, वह अनुपान सदा प्रशंसनीय माना जाता है ॥५१॥

वक्तव्य —विपरीत तथा विरोधी का अन्तर आप इस प्रकार समझें—शीतल आहारों के साथ उष्ण और उष्ण आहारों के साथ शीत अनुपान उत्तम होता है। इसी प्रकार रूक्ष आहार-द्रव्यों के साथ स्निग्ध और स्निग्ध के साथ रूक्ष पेय अनुपान में हितकर होते हैं।

अनुपानं करोत्यूर्जां तृप्तिं व्याप्तिं दृढाङ्गताम्। अन्नसङ्घातशैथिल्यविकिल्तिजरणानि च ॥५२॥

अनुपान-सेवन का फल —उचित अनुपान का सेवन ऊर्जा (बल एवं दीर्घ जीवन), तृप्ति, आहाररस को फैलाना, अंगों को दृढ़ करना, खाने गये अन्नसमूह को ढीला करना, उसे गीला करना तथा उसे पचाना—इन कार्यों को करता है ॥५२॥

वक्तव्य —सुश्रुत-सूत्रस्थान अध्याय ४६।४३४ से ४४५ में एक अनुपानवर्ग दिया गया है। इसका परिशीलन अवश्य कर लें और इस श्लोक को याद कर लें—‘सर्वेषामनुपानानां मोहेन्द्रं तोयमुत्तमम्। सात्यं वा यस्य यतोयं तत् तस्मै हितमुच्यते ॥ उष्णं वाते कफे तोयं पित्रे रक्ते च शीतलम् ॥ (सु.सू. ४६।४३४)

नोर्ध्वजत्रगदग्धासकासोरःक्षतपीनसे। गीतभाष्यप्रसङ्गे च स्वरभेदे च तद्वितम ॥५३॥

१. अनुपान का निषेध —जत्रु (ग्रीवास्थि या हंसुली) के ऊपरी भाग में होने वाले रोगों (मुख, कर्ण, नेत्र तथा शिर के रोगों) में, श्वास, कास, उरःक्षत, पीनस (नासारोग) में, गाने, भाषण आदि में तथा स्वरभेद में अनुपान (पेय पदार्थ) हितकर नहीं होते हैं ॥५३॥

प्रकिलन्नदेहेमहाक्षिगलरोगब्रणातुराः। पानं त्यजेयुः—

२. अनुपान का निषेध —जिनके शरीर में क्लिन्नता (कहीं भी गलन या सङ्ग) हो, जो प्रमेहरोग, नेत्ररोग, गलरोग तथा व्रणरोग से पीड़ित हों, ये भी उक्त अनुपानों का सेवन न करें।

—सर्वश्च भाष्याध्वशयनं त्यजेत् ॥५४॥

पीत्वा, भुक्त्वाऽऽतपं वहिं यानं फलवनबाहनम्।

३. अनुपान का निषेध —सभी स्वस्थ अथवा रोगी अनुपान (पेय पदार्थ) का सेवन करके भाषण, रास्ता चलना तथा दिन में सोना छोड़ दें। खाना खाकर एवं पानी पीकर धूप सेंकना, आग सेंकना, यान (सवारी द्वारा यात्रा करना), कुदना-फाँदना तथा घोड़ा आदि की सवारी न करें ॥५४॥

वक्तव्य —चरक ने (सूत्रस्थान २७।३२७-३२८ में) उक्त विषय का इस प्रकार वर्णन किया है—‘भोजन के बाद पिया हुआ जल कण्ठ तथा उरःप्रदेश में स्थित आहार के स्नेह को वहीं रोक कर उसके न पचने से दोष को बढ़ाने में समर्थ हो जाता है। यहाँ ‘हत्वा’ का अर्थ ‘प्राप्त होकर’ यह भी हो सकता है, क्योंकि ‘हल घातु’ का अर्थ हिंसा और गति भी है। अर्थात् अनुपान के रूप में पिया गया जल आहार के स्नेह को प्राप्त होकर तथा आमाशय को दूषित कर दोष को बढ़ा देता है। इस सन्दर्भ में सु.सू. ४६ का अनुपानवर्ग भी देखें।

१४४

अष्टाङ्गहृदये

प्रसृष्टे विष्णून्ने हृदि सुविमले दोषे स्वपथगे विशुद्धे चोद्भारे क्षुद्रपगमने वातेऽनुसरति।

तथाऽग्रावुद्व्रित्ते विशदकरणे देहे च सुलघौ

प्रयुज्जीताहारं विधिनियमितं, कालः स हि मतः ॥ ५५ ॥

इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्भागवतविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां

प्रथमे सूत्रस्थाने मात्राशित्तौयो नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥


भोजन-समय का निर्देश —मल-मूत्र के भलीभाँति निकल जाने पर, हृदय के शुद्ध अतएव विमल हो जाने पर, वात आदि दोषों के अपने-अपने मार्ग की ओर प्रवृत्त हो जाने पर, शुद्ध ( दोषरहित ) डकार के आने पर, भूख के लगने पर, अपानवायु के अनुकूल ढंग से निकलने पर, जठराग्नि के प्रदीप्त हो जाने पर, इन्द्रियों के निर्मल हो जाने पर तथा शरीर के हलका हो जाने पर विधिपूर्वक आहार ( भोजन ) करें। यही आहार करने का उचित समय है ॥ ५५ ॥

वक्तव्य —इसी अध्याय के ३५वें श्लोक में ‘काले सात्स्यं शुचि हितं’ का यह उत्तर है। ऐसे समय में किया गया भोजन सम्पूर्ण इन्द्रियों सहित शरीर को तृप्त कर देता है। इस समय किये गये भोजन से जठराग्नि प्रदीप्त हो जाती है, लोभ आदि कारणों से इसके आगे-पीछे किया गया भोजन हानिकारक होता है। इस विषय में महर्षि पुनर्वसु के उपदेशों पर ध्यान दें। देखें—च.सू. २७।३४५ से ३५० तक।

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित

निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में

मात्राशित्तौय नामक आठवाँ अध्याय समाप्त ॥ ८ ॥


नवमोऽध्यायः

अथातो द्रव्यादिविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ।

इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।

अब हम यहाँ से द्रव्यादिविज्ञानीय अर्थात् द्रव्य, रस, गुण, वीर्य, विपाक तथा प्रभाव का वर्णन इस अध्याय में करेंगे। ऐसा प्राचीन आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।

उपक्रम —इससे पहले अध्याय में अन्न-पान के उपयोगी द्रव्यों का सामान्य रूप से वर्णन तथा आहार-विधि का उपदेश किया गया था। अब इस अध्याय द्वारा द्रव्य और उसमें आश्रित रहने वाले रस, गुण, वीर्य, विपाक, प्रभाव का इसलिए वर्णन किया जायेगा कि इनकी परीक्षा करके ही अन्न-पान के उपयोग का उपदेश दिया जायेगा। अतएव प्रस्तुत अध्याय की उपस्थापना की जा रही है।

संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—च.सू. २६; सु.सू. ४०-४१ तथा अ.सं.सू. १७ में देखें।

द्रव्यमेव रसादीनां श्रेष्ठं, ते हि तदाश्रयाः ।

द्रव्य की प्रधानता —रस, गुण, वीर्य, विपाक एवं प्रभाव द्रव्य में रहने वाले इन धर्मों में हीरतकी आदि द्रव्यों को ही श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि ये रस आदि द्रव्य में ही आश्रित होते हैं। अर्थात् ये रस आदि भाव द्रव्य में प्राप्त होते हैं।

बलव्य —चरक ने द्रव्य की परिभाषा इस प्रकार की है—'यत्राश्रिताः कर्मगुणाः कारणं समवायि यत्'। तद् द्रव्यम्'। (च.सू. १।५१) अर्थात् जिसमें कर्म एवं गुण आश्रित हैं और जो द्रव्य गुण-कर्म का समवायिकारण है, वह द्रव्य है। इसका विस्तृत व्याख्यान सुरभारती प्रकाशन चौखम्बा, वाराणसी से प्रकाशित 'चरकसंहिता' प्रथम भाग में यथास्थान देखें।

पञ्चभूतात्मकं तत्तु—

द्रव्य का स्वरूप —वह द्रव्य पृथिवी, जल, तेज (अग्नि), वायु एवं आकाश—इन पाँच महाभूतों के संयोग वाला है।

—क्षमामधिष्ठाय जायते ॥ १ ॥

द्रव्य की उत्पत्ति —वह द्रव्य पृथिवी का आश्रय पाकर उस प्रकार उत्पन्न होता है, जैसे मिट्टी से घड़ा उत्पन्न होता है ॥ १ ॥

अन्बुद्योन्मयिपवननभसां समवायतः । तन्निर्वृत्तिर्विशेषश्च—

उत्पत्ति के कारण —द्रव्य की उत्पत्ति का प्रमुख कारण जल है, तथापि इसकी उत्पत्ति में अग्नि, वायु तथा आकाश के समवाय सम्बन्ध से उसकी उत्पत्ति होती है। उक्त पदार्थों (महाभूतों) के संयोग-भेद से द्रव्यों में भिन्नता भी होती है।

—व्यपदेशस्तु भूयसा ॥ २ ॥

नामकरण में कारण —जिस द्रव्य में जिस महाभूत तत्त्व की विशेषता होती है, वह उसी नाम से कहा जाता है। जैसे—पार्थिव, आग्नेय, वायव्य, नामस आदि व्यवहार के लिए उस-उसकी संज्ञाएँ होती हैं ॥ २ ॥

१० अ० ४०

१४६

अष्टाङ्गहृदये

तस्मात्रैकरसं द्रव्यं भूतसङ्कातसम्भवात्।

द्रव्य / अनेक -पृथिवी आदि महाभूतों के समवाय से उत्पन्न होने के कारण कोई भी द्रव्य किसी एक रसवाला नहीं होता है।

नैकदोषास्ततो रोगास्तत्र व्यक्तो रसः स्मृतः ॥ ३ ॥

अव्यक्तोऽनुरसः किञ्चिदन्ते व्यक्तोऽपि चैष्यते।

अनेकदोषज रोग—यही कारण है कि उस द्रव्य का सेवन करने से उत्पन्न होने वाले ज्वर आदि रोग भी किसी एक ही दोष वाले नहीं होते हैं, उस द्रव्य में जो रस व्यक्त (प्रतीत) होता है, वही उसका प्रधान रस कहा जाता है। जो रस प्रधान रस का अनुभव होने के बाद प्रतीत होता है अथवा जिसका बहुत कम अनुभव हो पाता है, उसे 'अनुरस' कहा जाता है ॥ ३ ॥

वक्तव्य—महर्षि पुनर्वसु के समय में रस तथा आहार विषय सम्बन्धी एक सम्भाषा परिषद् हुई थी, जिसका विशद विवेचन च.सू. २६ में किया गया है। अन्त में भगवान् आत्रेय पुनर्वसु ने सिद्धान्त पक्ष की स्थापना की तथा द्रव्य, देश, काल के प्रभाव से ६३ प्रकार के रसभेदों की त्रचा की गयी। इसका परिशीलन करें। इस प्रसंग में सु.सू. ४० का भी अवलोकन कर लें।

गुर्वादयो गुणा द्रव्ये पृथिव्यादौ रसाश्रये ॥ ४ ॥

रसेषु व्यपदिश्यन्ते साहचर्योपचारतः।

द्रव्यगत गुरु आदि गुण—गुरु आदि बीस गुण (जिनका वर्णन अष्टांगहृदय-सूत्रस्थान १।१८ में किया जा चुका है) पार्थिव आदि द्रव्यों में रहते हैं। ये ही द्रव्य मधुर आदि रसों के आश्रय भी होते हैं, किन्तु साहचर्य (संगति) होने के कारण वे गुरु आदि गुण रसों में भी होते हैं, ऐसा कह दिया जाता है ॥ ४ ॥

वक्तव्य—'गुर्वादयो गुणाः'—इसका वर्णन पहले किया जा चुका है। 'पृथिव्यादौ' के स्थान पर 'पार्थिवादी' पद अधिक सुगम होता। ऐसा न होने के कारण श्री अरुणदत्त को उक्त पद की व्याख्या 'पृथिव्यादि महाभूतारब्धे द्रव्ये' इस प्रकार करनी पड़ी है। इसके पहले तीसरे पद्य में भी इन्होंने द्रव्य को 'भूतसङ्कातसम्भव' माना है और अगले पद्यों में भी द्रव्यों को क्रम से पार्थिव, आप्य, आश्रय आदि संज्ञा दी है। वास्तव में पृथिवी आदि भूत हैं, इनके संयोग से ही पञ्चभूतात्मक द्रव्य या द्रव्यों की उत्पत्ति होती है।

तत्र द्रव्यं गुरुस्थूलस्थिरगन्धगुणोल्बणम् ॥ ५ ॥

पार्थिवं गौरवस्थैर्यसङ्कातोपचयावहम्।

पार्थिव द्रव्य का वर्णन—उक्त पञ्चमहाभूतात्मक द्रव्यों में जो द्रव्य गुरु, स्थूल, स्थिर तथा गन्धगुण-प्रधान होता है, उसे पार्थिव द्रव्य कहते हैं। इन गुणों से युक्त पार्थिव द्रव्य गुरुता, स्थिरता, संयातता (ठोसपन) तथा उपचय (शरीरपुष्टि) कारक होता है ॥ ५ ॥

द्रवशीतगुरुस्तिग्धमन्दसान्द्रसोलब्णम् ॥ ६ ॥

आप्यं स्नेहनविष्यन्दक्लैदप्रह्लादबन्धकृतं।

आप्य द्रव्य का वर्णन—जो द्रव्य द्रव, शीत, गुरु, स्निग्ध, मन्द, सान्द्र तथा रसगुण-प्रधान होता है, उसे आप्य (अपू धातु-प्रधान) या जलीय द्रव्य कहते हैं। इन गुणों से युक्त आप्य द्रव्य स्नेहन, विष्यन्दन (अभिष्यन्दकारक), क्लैदन (ग्रीलापन), प्रह्लादन (आनन्द या तृप्तिकारक) तथा बन्धन (आटा आदि को बाँधने वाला) कारक होता है ॥ ६ ॥

रूक्षतीक्ष्णोष्णविशदसूक्ष्मरूपगुणोल्बणम् ॥ ७ ॥

आश्रये दाहभावर्णप्रकाशपचनात्मकम्।

द्रव्यादिविज्ञानीयाध्यायः ९ ]

सूत्रस्थानम्

१४७

आश्रय द्रव्य का वर्णन—जो द्रव्य रुक्ष, तीक्ष्ण, उष्ण, विशद, सूक्ष्म तथा रूपगुण-प्रधान होता है, उसे आश्रय द्रव्य कहते हैं। इन गुणों से युक्त आश्रय द्रव्य दाह, कान्ति, वर्ण, प्रकाश तथा पाचन करने वाला होता है ॥७॥

वायव्यं रुक्षविशदलघुस्पर्शगुणोल्बणम् ॥८॥ रौक्षलाघववैशद्विचारलग्निकारकम् ।

वायव्य द्रव्य का वर्णन—जो द्रव्य रुक्ष, विशद, लघु तथा स्पर्शगुण-प्रधान होता है, वह वायव्य द्रव्य कहा जाता है। वह रुक्षता, लघुता, विशदता, विचरणशीलता एवं लग्निक ( हर्षक्षय ) कारक होता है ॥८॥

नाभसं सूक्ष्मविशदलघुशब्दगुणोल्बणम् ॥९॥

सौषिर्प्यलाघवकरम्—

नाभस द्रव्य का वर्णन—जो द्रव्य सूक्ष्म, विशद, लघु तथा शब्दगुण-प्रधान होता है वह नाभस ( आकाशीय ) कहा जाता है। वह सौषिर्प्य ( खोललापन ) तथा लघुता कारक होता है ॥९॥

—जगत्येवमनौषधम्। न किञ्चिद्विद्यते द्रव्यं वशात्रानार्थयोगयोः ॥१०॥

औषधमय द्रव्य—इस प्रकार सम्पूर्ण संसार में कोई भी द्रव्य ऐसा नहीं है जो औषध न हो, क्योंकि सभी द्रव्य अनेक अर्थों ( प्रयोजनों ) में एवं विविध प्रकार के योगों में प्रयुक्त होते हैं ॥१०॥

बक्तव्य—इसी विषय का जीवातु भगवानु पुनर्वसु का यह उपदेश है—'नानौषधिभूतं जगति किञ्चिद् द्रव्यमुपलभ्यते'। ( च.सू. २६।१२ ) तथा इसी का समर्थक गद्य देखें—सु.सू. ४१।५। गुरु आदि २० गुणों का वर्णन इसके प्रथम अध्याय में महर्षि वाग्भट ने किया है। इनके अतिरिक्त पाँच ज्ञानेन्द्रियों के विषय—शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध इन्हें भी गुण कहा गया है। ऊपर श्लोक ५ से ९ तक में देखें। महर्षि कणाद ने २४ गुणों का वर्णन इस प्रकार किया है—१. रूप, २. रस, ३. गन्ध, ४. स्पर्श, ५. संख्या, ६. परिमाण, ७. पुष्कल्य, ८. संयोग, ९. विभाग, १०. परत्व, ११. अपरत्व, १२. गुरुत्व, १३. द्रवत्व, १४. स्नेह, १५. शब्द, १६. बुद्धि, १७. सुख, १८. दुःख, १९. इच्छा, २०. द्वेष, २१. प्रयत्न, २२. धर्म, २३. अधर्म और २४. संस्कार। साथ ही च.सू. १।४९ भी देखें। इन गुण-धर्मों वाले द्रव्य स्वयं तथा दूसरे के संयोग से औषध-कार्य का निर्वह करते हैं। ये औषध द्रव्य स्थावर-जंगम भेद से दो प्रकार के होते हैं।

द्रव्यमूर्ध्वगमं तत्र प्रायोऽरिषपबनोक्तम्। अधोगामि च भूमिच्छं भूमितोयगुणाधिकम् ॥११॥

द्रव्यों की विशेषता—जो द्रव्य ऊर्ध्वगामी अर्थात् वमनकारक होता है, उसमें प्रायः अग्नि तथा वायु तत्त्व के गुण अधिक होते हैं और जो द्रव्य अधोगामी अर्थात् विरेचनकारक होता है, उसमें प्रायः पृथिवी तथा जल तत्त्व के गुण अधिक पाये जाते हैं ॥११॥

बक्तव्य—एक 'नाभस' गुण-प्रधान द्रव्य का वर्णन ऊपर के श्लोक में छूट गया है। इसका गुण है—संशमनकारकत्व। प्रायः शब्द कभी-कभी इसके विपरीत प्रभाव की भी सूचना देता है। कभी ऐसा भी देखा जाता है कि एक ही द्रव्य वमन तथा विरेचन कारक होता है, तो उसमें उक्त बारों भूतों के गुण पर्याप्त मात्रा में पाये जाते हैं, फलतः वे दोनों कार्य में समर्थ हैं। इस विषय का निस्तुत वर्णन मुश्रुत में इस प्रकार प्राप्त है—'तत्र...साधयेत्' ( सु.सू. ४१।६ ) अर्थात् विरेचक द्रव्यों में पृथिवी एवं जल तत्त्व के गुणों की अधिकता रहती है, क्योंकि ये दोनों तत्त्व भारी होने के कारण अधोगामी होते हैं। वामक द्रव्यों में अग्नि एवं वायु के गुणों की अधिकता होती है। ये दोनों तत्त्व लघु होने के कारण ऊर्ध्वगामी होते हैं। आकाश गुण अधिकता वाले द्रव्य संशमन होते हैं। इसी प्रकार यहाँ दीपन, लेखन तथा वृंहण द्रव्यों का भी वर्णन किया गया है।

१४८

अष्टाङ्गहृदये

इति द्रव्यम्—

द्रव्य-वर्णन की समाप्ति—यहाँ तक पाञ्चभौतिक द्रव्य के सम्बन्ध में जो वर्णन करना था, उसका व्याख्यान समाप्त हो गया है।

—रसान् भेदेष्टतरत्रोपदेश्यते।

रसवर्णन-प्रस्ताव—द्रव्यों का वर्णन करने के बाद अब अगले (११वें) अध्याय में रसों के भेदों का वर्णन किया जायेगा।

वीर्य पुनर्वदत्येके गुरु स्निग्धं हिमं मृदुं॥१२॥

लघु रूक्षोष्णतीक्ष्णं च तदेवं मतमष्टधा।

द्रव्यगत वीर्य-वर्णन—कुछ आचार्यों का कथन है कि द्रव्यगत वीर्य आठ प्रकार का होता है। यथा—१. गुरु, २. स्निग्ध, ३. हिम, ४. मृदु, ५. लघु, ६. रूक्ष, ७. उष्ण एवं ८. तीक्ष्ण॥१२॥

चरकस्त्वाह वीर्यं तत् क्रियते येन या क्रिया॥१३॥

नावीर्यं कृते किञ्चित्सर्वं वीर्यकृता हि सा।

चरकसम्मत वीर्य—महर्षि चरक का कथन है कि वीर्य उसे कहते हैं जिससे जो क्रिया की जाती है। कोई भी द्रव्य वीर्य के बिना किसी कार्य को नहीं कर सकता, अतः सभी क्रियाएँ वीर्य से ही सम्पन्न होती हैं॥१३॥

गुर्वादिव्वेव वीर्याख्या तेनान्वर्थेति वण्यते॥१४॥

समग्रगुणसारेषु शक्त्युत्कर्षविरतिषु। व्यवहाराय मुख्यत्वाद् बहुप्रग्रहणादपि॥१५॥

वाग्भट का मत—थीवाग्भटाचार्य का कथन है कि ऊपर कहे गये गुरु आदि आठ गुणों में ही वीर्य संज्ञा सार्थक है, अतएव उक्त आठ गुणों को वीर्य कहा जाता है, क्योंकि उक्त आठ गुण ही पहले कहे गये बीस गुणों में प्रमुख होते हैं और अपनी शक्ति की श्रेष्ठता के कारण ही विविध प्रकार से क्रिया करते हैं। यह (वीर्य) सभी गुणों में चिरस्थायी होने के कारण तथा शक्ति की अधिकता के कारण चिकित्सा-व्यवहार में प्रमुख होता है। सभी गुणों में प्रमुख होने के कारण उसी की गणना (उल्लेख) होती है॥१४-१५॥

अतश्च विपरीतत्वात्मभ्रमवत्यपि नैव सा। विवक्ष्यते रसाद्येषु, वीर्यं गुर्वादयो हृतः॥१६॥

रस आदि में वीर्य की श्रेष्ठता—इसीलिए उक्त विशेषताओं से विपरीत होने के कारण रस, विपाक, प्रभाव को 'वीर्य' संज्ञा नहीं दी गयी है। यद्यपि उक्त रस आदि को भी वीर्य कहा जा सकता था, पर कहा नहीं गया। अतएव गुरु आदि आठ गुणों का नाम ही 'वीर्य' है॥१६॥

उष्णं शीतं द्विधैवान्ये वीर्यमाचक्षते—

वीर्य सम्बन्धी अन्य मत—कुछ दूसरे आचार्यों का मत है कि 'वीर्य' केवल दो प्रकार का होता है—१. उष्ण एवं २. शीत। यहाँ 'एवं' शब्द निश्चयात्मक है अर्थात् वीर्य दो ही प्रकार का होता है।

—अपि च। नानात्मकमपि द्रव्यमश्रीषोमो महाबली॥१७॥

व्यक्ताव्यक्तं जगदिव नातिक्रामति जातुचित्।

वाग्भट का समर्थन—वाग्भटाचार्य का कथन है कि यह मत भी ठीक ही है, क्योंकि अनेक प्रकार के शक्तिशाली द्रव्य भी अग्नि तथा सोम (जल) तत्त्वों का कभी भी उस प्रकार अतिक्रमण नहीं कर पाते, जिस प्रकार व्यक्त एवं अव्यक्त कारण वाला जगत् (संसार) अग्नि एवं सोम का अतिक्रमण नहीं कर सकता॥१७॥

वक्तव्य—ऊपर वीर्य की मान्यता के सम्बन्ध में मत-मतान्तरों की चर्चा की गयी है। चरक का मत है कि 'वीर्य' वह है जिसकी शक्ति से द्रव्य कर्म को पूर्ण करता है और उन्होंने 'कर्म' की परिभाषा

द्रव्यादिविज्ञानीयाध्यायः ९ ]

सूत्रस्थानम्

१४९

इस प्रकार दो हैं—'प्रयत्नादि कर्म त्रेष्टितमुच्यते'। (च.सू. १४९) वीर्य की परिभाषा—'वीर्य तु क्रियते येन या क्रिया। नावीर्यं कुलते किञ्चित्, सर्वा वीर्यकृता क्रिया' ॥ (च.सू. २६६५) इस प्रसंग में सुश्रुतोक्त गद्य का भी अवलोकन करें—सु.सू. ४०१५।

तत्रोष्णं भ्रमतृङ्गलानिस्वेददाहाशुपाकितः ॥ १८ ॥

शर्मं च वातकफयोः करोति, शिशिरं पुनः। ह्लादनं जीवनं स्तम्भं प्रसादं रक्तपित्तयोः ॥ १९ ॥

वीर्य के लक्षण—वारभट के अनुसार वीर्य दो प्रकार का होता है। उन दोनों में प्रथम उष्णवीर्य के लक्षण—भ्रम, प्यास का लगना, ग्लानि (हर्षशय), स्वेद, दाह, आशुपाकित (शीघ्र पचना—भोजन का तथा व्रण आदि का) एवं वात तथा कफ दोषों का शमन करता है।

शीतवीर्य—ह्लादन (मन को प्रसन्न करने वाला), जीवन, स्तम्भनकारक और रक्त एवं पित्त को निर्मल करने वाला होता है ॥ १८-१९ ॥

जाठरेणाग्निना योगाद्यदुदेति रसान्तरम्। रसानां परिणामान्ते स विपाक इति स्मृतः ॥ २० ॥

विपाक का वर्णन—जठराग्नि के संयोग से जब खाये हुए मधुर आदि रस युक्त आहार का पाक होने लगता है, उसके बाद जो आहाररस से अलग रस उत्पन्न होता है, उसे 'विपाक' कहते हैं ॥ २० ॥

वक्तव्य—थीमानों का भोजन प्रायः षड् रस युक्त होता है। इसको समझाने के लिए उक्त श्लोक में 'रसानां' पद दिया है। उसके बाद उस खाये हुए आहार का जब जठराग्नि से पुनः पाक होकर जो दूसरा रस पैदा होता है, उसे 'विपाक' अर्थात् विशिष्ट पाक कहते हैं।

स्वादुः पटुश्च मधुरमम्लोऽम्लं पच्यते रसः। तित्तोषणकघायाणां विपाकः प्रायशः कटुः ॥ २१ ॥

विपाकज रस-भेद—प्रायः मधुर तथा लवण रस वाले पदार्थों का विपाक मधुर होता है, अम्ल पदार्थों का विपाक अम्ल ही होता है और तित्त, कटु एवं कषाय रसों का विपाक कटु होता है ॥ २१ ॥

वक्तव्य—उक्त दृष्टि से छः रसों का त्रिविध (मधुर, अम्ल तथा कटु) विपाक होता है, किन्तु सुश्रुत ने दो प्रकार का विपाक माना है। देखें—सु.सू. ४०१०-१२। वे दो विपाक हैं—१. मधुर तथा २. कटु। श्रीवारभट ने 'प्रायः' पद का प्रयोग करके प्राचीन मत को स्वीकार कर अपने मत को भी प्रदर्शित कर दिया है।

कटु-तित्तरस विवाद—प्रायः समाज में देखा जाता है कि मिर्च तीती है एवं नीम कड़वी है, इस प्रकार प्रयोग करते हैं, यह उचित नहीं है। आप ध्यान दें—कटुरस के लक्षण—'जो रस जीभ में रखने मात्र में घबराहट उत्पन्न करे, जीभ में चुभे या उसे कष्ट दे, जो दाह करता हुआ मुख, नासिका तथा आँखों से स्राव कराने वाला हो, उसे कटुरस कहते हैं'। (शा.सं.पू.खं. २।२०) जैसे—सोंठ, काली मिर्च, पिप्पली को 'त्रिकटु' या 'कटुत्रय' कहते हैं। इन्हों के गुण लाल मिर्चा में भरपूर पाये जाते हैं, अतः ये सभी द्रव्य कटु कहे जाते हैं। तित्तरस के लक्षण—'जो रस जीभ में रखने मात्र से कष्ट दे अर्थात् अप्रिय लगे और जो दूसरे रसों के स्वाद को प्रतीत न होने दे, उसे तित्तरस कहते हैं। यह मुख की तित्त्ता को दूर करके लार को सुखाकर मन को प्रसन्न कर देता है'। (शा.सं.पू.खं. २।२१) तित्त रस युक्त द्रव्यों में नीम, कुटकी आदि प्रमुख हैं।

रसैरसौ तुल्यफलस्तत्र द्रव्यं शुभाशुभम्। किञ्चिद्वत्सेन कुस्ते कर्म पाकेन चापरम् ॥ २२ ॥

गुणान्तरेण वीर्येण प्रभावेणैव किञ्चन।

रस-वीर्य-विपाक-प्रभाव—विपाक का फल मूल (आहार) रस के समान ही फलदायक होता है, किन्तु उसमें भी द्रव्य के अपने विशिष्ट लक्षण इस प्रकार होते हैं—कोई द्रव्य दोषशमन रूप कर्म करने के कारण शुभ होता है और कोई द्रव्य दोषप्रकोपन रूप कर्म करने के कारण अशुभ होता है। उसमें भी

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अष्टाङ्गहृदय

कोई द्रव्य मधुर आदि रस से कर्म करता है, तो कोई पाक ( विपाक ) से, कोई गुण से, कोई वीर्य से और कोई प्रभाव से ही कर्म करता है ॥ २२ ॥

यद्यद्व्यर्थे रसादीनां बलवत्त्वेन वर्तते ॥ २३ ॥

अभिभूयेतरांस्तत्कारणत्वं प्रपद्यते। विरुद्धगुणसंयोगे भूयसाऽल्पं हि जीयते ॥ २४ ॥

द्रव्य का स्वाभाविक बल—द्रव्य में रस, गुण, वीर्य, विपाक, प्रभाव इनमें से जो बलवान् होकर रहता है, वही अपना कर्म करता है और वह दूसरों को दबाकर ( पराजित कर ) शुभ अथवा अशुभ कार्य करने में कारण होता है। परस्पर विपरीत गुणों का संयोग होने के कारण अधिकांश यह देखा जाता है कि बलवान् द्वारा अल्प बल वाला जीत लिया जाता है ॥ २३-२४ ॥

रसं विपाकस्तौ वीर्यं प्रभावस्तान्यपोहति। बलसाम्ये रसादीनामिति नैसर्गिकं बलम् ॥ २५ ॥

रस आदि का स्वाभाविक बल—रस की समानता होने पर कभी-कभी रस को विपाक जीत लेता है, रस और विपाक को वीर्य जीत लेता है तथा रस-विपाक-वीर्य को प्रभाव जीत लेता है। यह द्रव्यों का अथवा रस आदि का स्वाभाविक बल कहा जाता है ॥ २५ ॥

रसादिसाम्ये यत् कर्म विशिष्टं तत् प्रभावजम्। दन्ती रसादौस्तुत्याऽपि चित्रकस्य विरेचनी ॥

मधुकस्य च मृद्वीका, घृत्तं क्षीरस्य दीपनम्।

प्रभाव का वर्णन—रस एवं विपाक आदि की समानता होने पर भी उन-उन द्रव्यों का जो प्रमुख कर्म होता है, उसमें प्रभाव ही कारण है। जैसे—दन्ती ( जमाल्मोटा नामक ) द्रव्य रस तथा विपाक में चित्रक ( चीता ) द्रव्य के समान होती है, फिर भी यह विरेचक ही होता है। इसी प्रकार मुनक्का द्रव्य के रस आदि महूआ के समान होते हैं, तथापि मुनक्का मधुर एवं विरेचक होता है। घृत्त के रस, गुण आदि दूध के समान होते हैं, फिर भी दूध अग्निदीपन होता है ॥ २६ ॥

बक्तव्य—इस विषय को विस्तारपूर्वक समझने के लिए आप च.सू. २६।६७ से ७२ तक के पद्यों का अवलोकन करें। शाङ्कधराचार्य ने भी इस विषय में प्रकाश डाला है अर्थात् द्रव्य में रस, गुण, वीर्य, विपाक तथा प्रभाव रहते हैं, जो प्रयोगानुसार अपना-अपना कार्य करते हैं।

इति सामान्यतः कर्म द्रव्यादीनां, पुनश्च तत् ॥ २७ ॥

विविचित्रप्रत्ययारब्धद्रव्यभेदेन भिद्यते।

द्रव्य आदि के कर्म—इस प्रकार इस अध्याय में द्रव्यों तथा द्रव्यगत रस, गुण, वीर्य, विपाक तथा प्रभाव के कर्मों का सामान्य रूप से वर्णन कर दिया गया है। फिर भी द्रव्यों के कर्मों में अनेक प्रकार के भेद देखे जाते हैं, क्योंकि प्रत्येक द्रव्य में पञ्चमहाभूतों के लक्षण ही उसमें मूल कारण होते हैं। प्रत्येक द्रव्य की रचना में पञ्चमहाभूतों का संयोग होता है, किन्तु यह संयोग सबमें भिन्न-भिन्न प्रकार से होता है; अतएव प्रत्येक द्रव्य एक-दूसरे द्रव्य से भिन्न होता है ॥ २७ ॥

स्वादुगुरुश्च गोधूतोऽवातजिदवातकृद्यवः ॥ २८ ॥

उष्ण मत्स्याः पयः शीतं कदुः सिंहो न शूकरः।

इति श्रीवेद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्भागवतविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां

प्रथमे सूत्रस्थाने द्रव्यादिविज्ञानीयो नाम नवमोऽध्यायः ॥ १ ॥

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भिन्नता के उदाहरण—गोहूँ तथा जौ ये दोनों द्रव्य स्वाद में मधुर तथा गुरु होने पर भी गोहूँ वातविकार का शमन करता है और जौ वातकारक होता है। मत्स्यमांस स्वादु रसयुक्त तथा गुरु गुणयुक्त होने पर भी

द्रव्यादिविज्ञानीयाध्यायः ९ ]

सूत्रस्थानम्

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उष्ण कहा गया है और उसी के समान रस तथा गुण से युक्त दूध शीतवीर्य होता है। इसी प्रकार सिंह तथा सूअर का मांस मधुर एवं गुरु होता है, परन्तु विपाक की दृष्टि से सिंह का मांस कटु तथा सूअर का मांस मधुर होता है॥ २८॥

वक्तव्य —उक्त उदाहरणों का तात्पर्य यह है कि प्रत्येक द्रव्य भले ही वह स्थावर अथवा जंगम भेद से किसी प्रकार का भी हो, वह विचित्र कारणों के विचित्र संयोग से उत्पन्न होता है। फलतः प्रत्येक के रस-गुण आदि समान होने पर भी उस-उस के वीर्य, विपाक तथा प्रभाव परस्पर भिन्न-भिन्न देखे जाते हैं। फिर भी हम यह कहने के लिए बाध्य हैं कि सभी द्रव्य पाञ्चभौतिक होते हैं। यही कारण है कि ‘प्रभाव’ को अचिन्त्य शक्ति वाला कहा एवं माना गया है।

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारावत त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में द्रव्यादिविज्ञानीय नामक नवौ अध्याय समाप्त ॥ ९ ॥

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दशमोऽध्यायः

अथातो रसभेदीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ।

इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ॥

अब यहाँ से हम रसभेदीय नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे। जैसा कि इस विषय में आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।

उपक्रम —इसके पहले नवें अध्याय के १२वें श्लोक में 'रसान् भेदरुत्तरत्रोपदेश्यते' ऐसा कहा गया था, तदनुसार प्रस्तुत अध्याय में रसभेदों का वर्णन किया जा रहा है। जीभ द्वारा ग्रहण किये जाने वाले विषय का नाम ही रस है अर्थात् रस की उत्पत्ति का मूल आधार जल एवं पृथिवी है। देखें—च.सू. १।६४। वास्तव में रस के मूलभूत कारण हैं—जल तथा पृथिवी, परन्तु उसकी अभिव्यक्ति का कारण पृथिवी तत्त्व है। इसी का समर्थन हमें उपनिषद् तथा वैशेषिक दर्शन में मिलता है। यथा—'रसो रसनेन्द्रियग्राहः, पृथिव्युदकवृत्तिः'। इति। और भी देखें—'आपो स्मृताः'। (च.सू. २५।१३) अर्थात् यह पुरुष रसज है, क्योंकि इसकी पुष्टि गर्भकाल में गर्भिणी के आहाररस से होती है और जल रस वाले होते हैं। अष्टांगहृदय में भी कहा गया है—'रसाः स्वाद्वम्ललवणतितोषणकषायकाः। षड्व्रव्यमाश्रितास्ते च यथापूर्वं बलावहाः' ॥ (अ.हृ.सू.१।१४) अर्थात् रस छः होते हैं—१. मधुर, २. अम्ल, ३. लवण, ४. तित्त, ५. कटु तथा ६. कषाय। इनका आधार द्रव्य होता है। ये स्वतन्त्र रूप से नहीं पाये जाते। ये यथापूर्वं बलवान् होते हैं। जैसे—कषाय रस से कटुरस बलवान् होता है आदि।

संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत —च.सू. २६; च.वि. ८; सु.सू. ४२; सु.उ. ६३ तथा अ.सं.सू. १७ एवं १८ में देखें।

क्षमास्मोऽशिक्षमास्मृतेजःखवाव्यमन्यनिलगोनिर्लेः। द्वयोल्बणैः क्रमादूर्तैर्मधुरादिरसोद्भवः ॥ १ ॥

मधुर आदि रसों की उत्पत्ति —दो-दो महाभूतों की प्रधानता के कारण मधुर आदि रसों की उत्पत्ति होती है। यथा—पृथिवी एवं जल तत्त्वों की प्रधानता से मधुररस , अग्नि एवं पृथिवी तत्त्वों की प्रधानता से अम्लरस , जल एवं अग्नि तत्त्वों की प्रधानता से लवणरस , आकाश एवं वायु तत्त्वों की प्रधानता से तित्तरस , अग्नि एवं वायु तत्त्वों की प्रधानता से कटुरस तथा पृथिवी एवं वायु तत्त्वों की प्रधानता से कषायरस की उत्पत्ति होती है ॥ १ ॥

बक्तव्य —इसी का समर्थन चरक ने भी किया है। देखें—च.सू. २६।४०।

तेषां विद्याद्वसं स्वादुं यो वक्तवमनुलिप्सति। आस्वाद्यमानो देहस्य ह्लादनोऽक्षप्रसादनः ॥ २ ॥

प्रियः पिपीलिकादीनाम्—

मधुररस के लक्षण —उक्त छः रसों में मधुररस वह है, जो मुख को चारों ओर से लीप देता है। उसका स्वाद मिलते ही सम्पूर्ण शरीर का अधिष्ठाता मन प्रसन्न हो जाता है तथा सभी इन्द्रियाँ प्रसन्न हो जाती हैं। यह रस चिउँती तथा मक्खियों का भी प्रिय होता है ॥ २ ॥

—अम्लः क्षालयते मुखम्। हर्षणो रोमदन्तानामक्षिभ्रुवनिकोचनः ॥ ३ ॥

अम्लरस के लक्षण —अम्ल (खट्टा) रस मुख को भीतर की ओर से मानो घों डालता है। इसे खाने से रोमांच तथा दन्तहर्ष हो जाता है। यह आँखों तथा भौंहों को संकुचित कर देता है ॥ ३ ॥

लवणः स्यन्दयत्यास्यं कपोलगलदाहकृत्।

रसभेदीयाध्यायः १० ]

सूत्रस्थानम्

१५३

लवणरस के लक्षण—लवणरस का सेवन करने से मुख से लालझाब होने लगता है और कपोल तथा गले के भीतरी भाग में जलन पैदा होने लगती है।

तिक्तो विशदयत्यास्यं रसनं प्रतिहन्ति च॥४॥

तिक्तरस के लक्षण—तिक्तरस का सेवन करने से मुख का भीतरी भाग विशद (स्वच्छ) हो जाता है तथा जीभ को कुछ समय के लिए यह अन्य रस ग्रहण करने के अयोग्य कर देता है॥४॥

उद्रेजयति जिह्वायां कूर्वश्चिमिचिमां कटुः। द्रावयत्यक्षिनासास्यं कपोलो दहतीव च॥५॥

कटुरस के लक्षण—कटुरस (सौंठ, मरिच, पीपल या लाल मिर्चा) का सेवन जीभ के अगले भाग को उद्विग्न कर देता है अर्थात् जीभ इसके स्वाद से घबड़ा जाती है। इससे जीभ में चिमचिमाहट होने लगती है। इसका सेवन करने से आँख, नाक तथा मुख से द्राव निकलने लगता है और कपोलों (गालों) में दाह होने लगता है॥५॥

कषायो जडयेज्जिह्वां कण्ठघ्रोतोविबन्धकृत।

कषायरस के लक्षण—कषायरस (हरीतकी, आँवला आदि) का सेवन जीभ को जड़ (अन्य रस के सेवन में कुछ देर के लिए असमर्थ) कर देता है और कण्ठ (गला) के घ्रोतस् को अवरुद्ध कर देता है अर्थात् उसमें ऐंठन पैदा कर देता है।

रसानामिति रूपाणि—

रसों के स्वरूप—यहाँ तक छहों रसों के परिचायक स्वरूपों का वर्णन कर दिया गया है।

—कर्माणि—

रसों के कर्म—अब इसके आगे उक्त रसों के कर्मों का वर्णन किया जायेगा।

—मधुरो रसः॥६॥

आजन्मसात्प्यात् कुरुते धातूनां प्रबलं बलम्। बालवृद्धक्षतक्षीणवर्णकेशेन्द्रियोजसाम्॥७॥

प्रशस्तो बृंहणः कण्ठघः स्तन्यसन्धानकटुहः। आयुष्यो जीवनः स्निग्धः पित्तानिलविषापहः॥

कुरुतेऽत्युपयोगेन स मेदः श्लेष्मजान् गदान्। स्थौल्याग्निसादसन्त्यासभेहगण्डार्बुदादिकात्॥९॥

मधुररस के कर्म—मधुररस माता के दूध के रूप में जन्मकाल से सात्त्व्य (प्रकृति के अनुकूल) होने के कारण रस आदि धातुओं को अत्यन्त बलदायक होता है। यह बालक, वृद्ध, क्षत (उरःक्षत आदि), क्षीण (धातुक्षीण), वर्ण, केश, इन्द्रियों तथा ओजस् के लिए हितकारक होता है। यह शरीर को पुष्ट करता है, स्वरयन्त्र के लिए हितकर है, दूध को बढ़ाता है, टूटी अस्थियों को जोड़ता है तथा मध्यसन्धानकारक भी है; गृह (देर में पचने वाला) है, आयुवर्धक है, जीवन है, स्निग्ध है, पित्त, वात तथा विष का नाशक है। इसका अधिक उपयोग करने से यह मेदोरोग तथा कफज रोगों को उत्पन्न करता है। यथा—स्थूलता, मन्दाग्नि, सन्त्यास, प्रमेह, गलगण्ड तथा अर्बुद आदि रोग हो जाते हैं॥६-९॥

अम्लोऽग्निदीपिकृतु स्निग्धो हृद्यः पाचनरोचनः। उष्णवीर्यो हिमस्पर्शः प्रीणनः क्लेदनो लघुः॥

करोति कफपिताम् मृदवातानुलोमनः। सोऽत्यभ्यस्तस्तनोः कुर्याच्छैथिल्यं तिमिरं भ्रमम्॥

कण्डुपाण्डुत्ववीसर्पशोफविस्फोटतुड्वज्जरन् ।

अम्लरस के कर्म—अम्लरस का सेवन अप्रिवर्धक, स्निग्ध, हृदय के लिए हितकर, पाचन, रोचन (रुचिकारक), उष्णवीर्य, स्पर्श में शीतल, प्रीणन (तृप्तिकारक), क्लेदकारक तथा लघुपाकी है। यह कफ, पित्त तथा रक्त वर्धक है; प्रतिलोम या मृदु वातदोष का अनुलोमन करता है। इसका अधिक सेवन करने से शरीर में शिथिलता, तिमिर नामक नेत्ररोग, चक्करों का आना, खुजली, पाण्डुरोग, वीसर्प, शोफ (सूजन), विस्फोट (फोड़े, शीतलारोग), प्यास का लगना तथा ज्वररोग को उत्पन्न करता है॥१०-११॥

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अष्टाङ्गहृदये

लवणः स्तम्भसङ्गतबन्धविधमापनोऽग्रियुक्तं ॥ १२ ॥

स्नेहनः स्वेदनस्तीक्ष्णो रोचनश्छेदभेदकृतं । सोऽतियुक्तोऽग्रपवनं खलितं पलितं बलिम् ॥ १३ ॥

तृप्त्युक्तविषवीसर्पान् जनयेत् क्षपयेद्बलम् ।

लवणरस के कर्म—लवणरस का सेवन स्तम्भ ( जकड़न ) तथा संघातबन्ध ( मल-मूत्र की रूकावट ) विधमापक अर्थात् विनाशक है तथा अग्नि ( जठराग्नि ) की वृद्धि करता है। यह स्नेहन तथा स्वेदन है, तीक्ष्ण गुणयुक्त है, रुचिकारक, मांस का छेदक एवं मल का भेदक है। इसे अधिक खाने से वातरक्त, खलित तथा पलित नामक कपालरोगों, बली ( सुरियों ), प्यास, कुष्ठ, विष एवं वीसर्प रोगों को पैदा करता है और बल को क्षीण करता है ॥ १२-१३ ॥

बन्धव्य—चरक ने लवण के अधिक उपयोग का निषेध किया है। देखें—च.वि. १।१५। रक्तविकारों में इसको सेवन करने का निषेध है। यह बदे हुए मांस का छेदक है और व्रणशोथ का भेदक भी है तथा सभी रसों को उजागर ( प्रकट ) करने वाला भी है।

तिक्तः स्वयमरोचिष्णुररुचिं कुमितुद्बिषम् ॥ १४ ॥

कुष्ठमूच्छाज्वरोत्प्लेशदाहपित्तकफान् जयेत् । क्लेदमेदोवसामज्जशकृन्मूत्रोपशोषणः ॥ १५ ॥

लघुर्मध्यो हिमो रूक्षः स्तन्यकण्ठविशोधनः । धातुक्षयानिलव्याधीनतियोगात्करोति सः ॥ १६ ॥

तिक्तरस के कर्म—तिक्तरस यद्यपि स्वयं अरुचिकर होता है, परन्तु यह ज्वर आदि के कारण उत्पन्न अरुचि को दूर करता है। यह कुमिरोग, तुष्णा, विष, कुष्ठ, मूच्छा, ज्वर, उत्प्लेश ( जी मिचलाना ), दाह ( जलन ), पित्तज तथा कफज विकारों का विनाश करता है। क्लेद ( सड़न ), मेदस, वसा, पुरीष ( मल ) और मूत्र को सुखाता है। यह पाक में लघु, वृद्धिवर्धक, शीतवीर्य, रूक्ष, दूध को शुद्ध करने वाला तथा गले के विकारों का शोधक है। इसका अधिक सेवन करने से धातुक्षय तथा वातव्याधियों की उत्पत्ति हो जाती है ॥ १४-१६ ॥

कटूर्णलामयोर्यदकृष्णालसकशोफजित् । व्रणावसादनः स्नेहमेदःक्लेदोपशोषणः ॥ १७ ॥

दीपनः पाचनो रूच्यः शोधनोऽग्रस्य शोषणः । छिन्नति बन्धान् द्रोतांसि विवृणोति कफापहः ॥

कुस्ते सोऽतियोगेन तुष्णां शुक्लबलक्षयम् । मूच्छामाकुञ्जन् कम्पं कटिपृष्ठादिवु ब्यथाम् ॥ १९ ॥

कटूरस के कर्म—कटूरस ग्लरोग, उदर ( कोठ, शीतपित्त ), कुष्ठ, असलक ( आमविकार ) एवं शोथरोग का विनाश करता है। व्रणशोथ की कठोरता को शिथिल ( ढीला ) कर देता है; स्नेह, मेदस एवं क्लेद ( सड़न ) को सुखाता है। यह जठराग्नि को प्रदीप्त करता है, भोजन को पचाता है, भोजन के प्रति रुचि को बढ़ाता है; मुख, नासिका, नेत्र एवं शिर का स्नावण एवं रेचन विधियों से शोधन करता है, खाये हुए अन्न को सुखाता है अतएव खाने के बाद प्यास लगती है, अतिसारनाशक है, मल के बन्धन को काटता है, द्रोतों को फैलाता है तथा कफ का नाशक है। इस रस का अधिक प्रयोग करने से प्यास अधिक लगती है, शुक्ल एवं बल का क्षय करता है। मूच्छा ( बेहोशी ), शरीर के अवयवों तथा सिराओं में सिकुड़न, कैंपकैपी, कमर तथा पीठ में पीड़ा पैदा करता है ॥ १७-१९ ॥

कषायः पित्तकफहा गुरुप्रविशोधनः । पीडनो रोपणः शीतः क्लेदमेदोविशोषणः ॥ २० ॥

आमसस्तम्भनो ग्राही रूक्षोऽति त्वषप्रसादनः । करोति शीलितः सोऽति विष्टम्ब्याध्यानहृदुजः ॥

तृट्काश्यपौरुषप्रशस्रोतोरोधमलग्रहान् ।

कषायरस के कर्म—कषायरस पित्त तथा कफ को शान्त करता है, गुरु है, रक्त को शुद्ध करता है। कषायरस-प्रधान द्रव्यों का लेप लगाने से यह पके फोड़े का पीडन करता है और पूय निकल जाने पर रोपण करता है। यह शीतीवीर्य है, सड़न तथा मेदोधातु को सुखाता है, आमदोष को रोकता है तथा