भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अन्नसाध्यायः ७ ]

सूत्रस्थानम्

१२९

बक्तव्य —उक्त उदाहरण व्यक्ति-विशेष तथा परिस्थिति-विशेष का है। इस पद्य का सन्निवेश यहाँ इसलिए किया गया है कि कोई मनचला व्यक्ति आयुर्वेद के प्रति आक्षेप न करे कि अमुक व्यक्ति ने विरुद्ध आहार का सेवन किया, वह स्वस्थ है। वास्तव में विरुद्ध आहारों का सेवन न करें।

पादेनापथ्यमभ्यस्तं पादपादेन वा त्यजेत्। निषेवेत हितं तद्वेदकडिध्यन्तरीकृतम्॥४८॥

अपथ्य का त्याग, पथ्य का सेवन —प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा सेवन करने के कारण अभ्यास किये गये अपथ्य ( विरुद्ध आहार-विहार ) को भी एक-एक चौथाई क्रम से छोड़ने जाना चाहिए। यदि इतनी मात्रा में छोड़ने पर भी हानि होने की सम्भावना हो तो उसे सोलहवें हिस्से से छोड़ना आरम्भ करें और उसी क्रम से एक, दो, तीन दिन का अन्तर देकर उन्हें छोड़ देना चाहिए। इसी क्रम से हितकर आहार-विहार का सेवन प्रारम्भ करना चाहिए॥४८॥

अपथ्यमपि हि त्यक्तं शीलितं पथ्यमेव वा। सात्स्यासात्स्यविकाराय जायते सहसाऽन्यथा॥४९॥

सहसा त्याग का निषेध —यदि उक्त प्रकार से व्यवहार न करके अपने सहसा अपथ्य का परित्याग कर दिया और पथ्य का सेवन प्रारम्भ कर दिया तो सहसा सात्स्य पदार्थों के छोड़ने और असात्स्य पदार्थों के सेवन करने के कारण अनेक प्रकार के विकार ( रोग ) उत्पन्न हो सकते हैं॥४९॥

क्रमेणापचित्ता दोषाः क्रमेणोपचित्ता गुणाः। सन्तो यान्त्यपुनर्भावमप्रकम्प्या भवन्ति च॥५०॥

दोषों का ह्रास, गुणों की वृद्धि —क्रमशः घटाये गये वात आदि दोष पुनः बढ़ने नहीं पाते तथा क्रमशः संचित किये गये गुण चिर-स्थिर होते हैं अर्थात् उन्हें कोई डिगा नहीं पाता॥५०॥

अत्यन्तसन्निधानानां दोषाणां दूषणात्सनाम्। अहितैर्दूषणं भूयो न विद्वान् कर्तुमर्हति॥५१॥

दोषों को दूषित न करें —शरीर में वात आदि दोष सदा रहा करते हैं, उनका स्वभाव है, वे शरीर को दूषित किया करते हैं। अतएव पथ्य तथा अपथ्य को जानकर विद्वान् वैद्य अहितकर आहार एवं विहार द्वारा उन दोषों को दूषित न होने दें अर्थात् चिकित्सा की आज्ञा के अनुकूल मनुष्य आहार-विहार करें॥५१॥

आहारशयनाब्रह्मचर्ययुक्त्या प्रयोजितैः। शरीरं धारयते नित्यमागारमिव धारणेः॥५२॥

तीन उपस्तम्भ —शरीर के तीन उपस्तम्भ हैं—१. आहार, २. शयन ( निद्रा ) तथा ३. ब्रह्मचर्य। इन तीनों का शास्त्रीय निर्देशों के अनुसार युक्तिपूर्वक उपयोग करने से शरीर का उस प्रकार धारण होता है जिस प्रकार खम्भों से मकान स्थिर रहता है॥५२॥

बक्तव्य —इस विषय का प्रतिपादन चरक में भी किया गया है—‘त्रयः...’देश्यते। ( च.सू. ११।३५ ) अर्थात् ‘आहार, स्वप्न, ब्रह्मचर्य’ इन तीन उपस्तम्भों के विधिवत् प्रयोग करने से शरीर जीवनभर बल, कान्ति तथा पुष्टि से युक्त रहता है; किन्तु इस बीच में अहितकर आहार-विहारों का यदि सेवन किया जाता है, तो उक्त लाभ नहीं मिलते। इन विषयों का वर्णन हम इसी अध्याय में आगे करेंगे।

आहारो वर्णितस्तत्र तत्र च वक्ष्यते।

आहार नामक उपस्तम्भ —शरीर को धारण करने में जिन तीन उपस्तम्भों का वर्णन किया गया है, उनमें पहला उपस्तम्भ आहार है। इसके पहले अ.हू.सू. ३ में तथा अ.हू.सू. ५,६ और ७वें अध्याय में भी इसका वर्णन कर दिया गया है, इसके आगे भी यथास्थान किया जायेगा।

बक्तव्य —‘अन्नं वै प्राणिनां प्राणः’; ‘जगदन्ने प्रतिष्ठितम्’ तथा ‘अन्नं वृत्तिकराणां श्रेष्ठम्’ ( च.सू. २५।४० ) और ‘इष्टवर्णनघरसत्सर्षि विधिर्विहितमन्नपानं प्राणिनां प्राणिसंज्ञकानां प्राणमाचक्षते कुशलाः प्रत्यक्षफलदर्शनात्’। ( च.सू. २७।३ ) इसके आगे च.सू. २८।३ भी देखें। वास्तव में जीवन की रक्षा करने वाले भावों में अन्न सर्वश्रेष्ठ भाव है। इसी विषय का समर्थन सुश्रुत में भगवान् धन्वन्तरि ने इस प्रकार किया है—‘प्राणिनां पुनर्मूलमाहारो बलवर्णजिसां च’। ( सु.सू. ४६।३ )

९ अ० हू०