भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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पृष्ठ 158

सप्तमोऽध्यायः

अथातोऽन्नरक्षाध्यायं व्याख्यास्यामः ।

इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।

अब हम यहाँ से अन्नरक्षा नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। जैसा कि इस विषय में आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।

निरुक्ति —इस प्रकरण में 'अन्न' शब्द पकाकर तैयार किये गये तथा खाये जाने योग्य पदार्थों का वाचक है। यथा—'अन्नं भक्ते च भुक्ते स्यात्'। इति मेदिनी। अन्यत्र इसके और भी अर्थ होते हैं। इसी अन्न की किस प्रकार और किसलिए रक्षा करनी चाहिए, यही इस अध्याय का प्रधान विषय है। यद्यपि आगे कहा जा रहा है कि राजा या महाराजा अपने घर के पास चिकित्सक के रहने की व्यवस्था करे।

संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत —च.सू. ११, २१, २६; च.शा. ८; च.सि. १२; सु.सू. २०, २४; सु.शा. ४; सु.चि. २४; सु.क. १ तथा अ.सं.सू. ८-९ में देखें।

राजा राजगृहासत्रे प्राणाचार्य निवेशयेत्। सर्वदा स भवत्येवं सर्वत्र प्रतिजागृविः ॥१॥

प्राणाचार्य की नियुक्ति —राजा का कर्तव्य है कि वह अपने राजभवन के समीप शास्त्रज्ञ कुशल चिकित्सक को सदा रखे, उसकी नियुक्ति करे अथवा उसके रहने की व्यवस्था करे। ऐसा करने पर वह चिकित्सक राजा के आहार-विहार आदि के प्रति सदैव जागरूक (सचेष्ट) रहेगा ॥१॥

अन्नपानं विषादक्षेत्रिष्टिषेण महीपतेः। योगक्षेमौ तदायतौ धर्माद्या यन्निवन्धनाः ॥२॥

चिकित्सक का कर्तव्य —राजा या श्रीमान् पुरुष जिस अन्न-पान का सेवन करें, उसमें कहीं से किसी प्रकार विष का प्रयोग तो नहीं हुआ है, इसकी परीक्षा कर उनकी रक्षा चिकित्सक करता रहे। क्योंकि राजा की विधिपूर्वक रक्षा होने पर ही उससे योगक्षेम (जीविका एवं कुशलता) तथा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष का लाभ प्राप्त हो सकता है ॥२॥

बन्धन्य —उक्त श्लोक में 'अन्नपान' एक प्रधान विषय कह दिया है, इसके अतिरिक्त वस्त्र, माला, गुलदस्ता, रूमाल, प्रसाधन-सामग्री आदि पर भी चिकित्सक को ध्यान रखना चाहिए। विषकन्याओं का प्रयोग होता था, आज भी उसके प्रकारान्तर हैं, इनसे सावधान रहें। वैसे शत्रुओं से सभी को सदा सावधान रहना चाहिए। महर्षि चाणक्य ने तो इससे भी एक कदम आगे बढ़कर कहा है—'न विश्वसेत् कुमित्रे च मित्रे चापि न विश्वसेत्। कदाचित् कुपितं मित्रं सर्वं गृहं प्रकाशयेत्' ॥ (चा.नी. २।६)

ओदनो विषवान् सान्द्रो यात्यविद्याव्यतामिव। चिरेण पच्यते पक्वो भवेत्सर्पुषितोपमः ॥३॥

मयूरकण्ठतुल्योष्मा मोहमूर्च्छाप्रसेककृत। हीयते वर्णगन्धाद्यैः क्लिद्यते चन्द्रिकाचितः ॥४॥

विषैले भात के लक्षण —विष मिला हुआ भात कुछ गीला-सा रहता है, ऐसा लगता है, मानो उसमें से मीठ न निकाला गया हो। यदि पकते समय ही विष डाल दिया गया हो तो बावल देर से पकते हैं। यदि पके हुए भात में विष मिला दिया हो तो वह बासी भात जैसा दिखलायी देता है, उसमें से जो भाप निकलती है वह मोर के कण्ठ के समान वर्ण वाली (नीली) होती है। उस भाप के लगने से अथवा उस भात को खोलने से मोह, मूर्च्छा होती है तथा मुख से लार निकलने लगती है। वह विषैला भात अपने स्वाभाविक रूप तथा गन्ध वाला नहीं रह जाता है, उसमें गलन या सड़न-सी पैदा हो जाती है और उसमें चन्द्रिकाएँ जैसी दिखलायी पड़ती हैं ॥३-४॥

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