भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अन्तरक्षाध्यायः ७ ]

सूत्रस्थानम्

१२३

व्यञ्जान्याशु शृण्यन्ति ध्यामक्वायानि तत्र च । हीनाऽतिरिक्ता विकृता छाया दृश्यते नैव वा ॥ फेनोध्वराजीसीमन्ततन्तुबुद्धसम्भवः । विच्छिन्नविरसा रागाः खाण्डवाः शाकमाभिषम् ॥ ६ ॥

विषैले व्यञ्जनो के लक्षण—विष युक्त व्यंजन ( शाक-तरकारी आदि ) जल्दी सूख जाते हैं और उनके रस मलिन पड़ जाते हैं। उन रसों में यदि छाया दिखलायी भी पड़ती है, तो वह हीन अंगों वाली या अतिरिक्त अंगों वाली अथवा विकृत छाया दिखती है अथवा छाया नहीं दिखायी देती। उन व्यंजनों में विष के कारण ऊपर की ओर को झग उठने लगती है, रेखाएँ दिखलायी देती हैं, बीच में फटा हुआ-सा, तन्तु ( तौत ) जैसा, बुलबुले जैसे उठना—ये लक्षण दृष्टिगोचर होते हैं। राग ( रायते ), खांडव ( खट्टे रस वाली सन्निधियाँ ), शाक तथा मांसरसों के आकार कटे-फटे से दिखलायी देते हैं और खाने पर उनका रस विकृत जान पड़ता है ॥ ५-६ ॥

नीला राजी रसे, ताम्रा क्षीरे, दधनि दृश्यते । श्यावाऽऽपीतासिता तक्त्रे, घृते पानीयसन्निभा ॥ मस्तुनि स्यात्कपोताभा, राजी कृष्णा तुषोदके । काली मद्याम्भसोः, क्षोदे हरितैलेऽरण्यपमा ॥ पाकः फलानामासानां पक्वानां परिकोथनम् । द्रव्याणामार्द्रशुष्काणां स्यातां म्लानिविवर्णते ॥ मृदूनां कठिनानां च भवेत्स्पर्शविपर्ययः । माल्यस्य स्फुटिताग्रत्वं म्लानिर्गन्धान्तरोद्भवः ॥ १० ॥ ध्याममण्डलता वस्त्रे, शदनं तन्तुपक्षमणाम् । धातुभौक्तिककाष्ठाश्मरत्नादिषु मलाक्तता ॥ ११ ॥ स्नेहस्पश्रप्रभाहानिः, सप्रभत्वं तु मुग्धमे ।

विषैली वस्तुओं के विशिष्ट लक्षण—विषैले मांसरस में नीली रेखाएँ, दूध में लाल, दही में काली, पीली या सफेद मठा में, घी में पानी की जैसी, मस्तु ( दही के पानी आदि ) में कबूतर के वर्ण जैसी, तुषोदक ( काँजी ) में काली रेखाएँ, मद्य में तथा जल में काली रेखाएँ, मधु में हरे वर्ण वाली, तेल में अरुण वर्ण ( ईट के रंग जैसी ) रेखाएँ दिखलायी देती हैं।

विष के प्रभाव से कच्चे फल शीघ्र पक जाते हैं, पके हुए फलों से सड़न पैदा हो जाती है। गीले अथवा सूखे पदार्थ विषप्रयोग से मलिन तथा विकृत वर्ण के हो जाते हैं। कोमल एवं कठोर द्रव्यों के स्पर्श में अन्तर पड़ जाता है। अथवा इसे इस प्रकार समझें—विष-प्रयोग से मुदु द्रव्य कठोर और कठोर द्रव्य मुदु स्पर्श वाले हो जाते हैं। माला में फूलों के अगले हिस्से फूट जाते हैं, वे मलिन पड़ जाते हैं और उनकी गन्ध विकृत हो जाती है। वस्त्रों पर सूखापन, चकते पड़ जाना, उनके धागे या रोएँ ढीले पड़ जाते हैं या टूटने लगते हैं। सोना आदि धातुओं के आभूषणों, मोती आदि में; लकड़ी से बने हुए कुर्सी, टेबुल, चौकी, छड़ी आदि में; पत्थर से गढ़े गये पात्रों पर, हीरे आदि उत्तम रत्नों में मेलापन आ जाता है। उनमें से चिकनापन, स्पर्शप्रियता, प्रभा की हानि हो जाती है और मिट्टी के पात्रों में चमकीलापन आ जाता है ॥ ७-११ ॥

विषदः श्यावशुष्कास्यो विलक्षो वीक्षते दिशः ॥ १२ ॥

स्वेदवेपथुमांश्रस्तो भीतः स्वलति जूम्भते ।

विषदाता के लक्षण—इसका मुख गेरा होने पर भी काली छाया युक्त, चेहरा सूखा हुआ-सा कान्तिहीन हो जाता है। वह लज्जित होकर इधर-उधर दूर तक दिशाओं की ओर देखता रहता है अर्थात् वह अपराधी होने के कारण किसी से नजर मिला नहीं पाता। उसके शरीर में पसीना तथा कम्पन होने लगता है, वह घबड़ा जाता है, डर जाता है, चलने में उसके पैर लड़बड़ाने लगते हैं और बार-बार जँभाइयाँ लेता रहता है ॥ १२ ॥

बक्तव्य—विषदाता के कुछ और भी लक्षण होते हैं उन्हें चरक, सुश्रुत आदि में देखें। कभी-कभी पुलिस की धर-पकड़ से निरपराधी भी फँस जाते हैं और वे भी वैसी चेष्टा करने लगते हैं। अतः सावधानी से निर्णय करना चाहिए।