भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अष्टाङ्गहृदये

प्राप्यान्नं सविषं त्वशिरैकावर्तः स्फुटत्यति ॥१३॥ शिखिकण्ठाभधुमाचिरन्तर्बिर्गप्रगन्धवान् ।

बिपैले अन्न की अग्नि-परीक्षा—यदि विपैला अन्न आग में डाला जाता है, तो उसकी लौ किसी एक ओर ही होती है। वह अन्न अत्यन्त फूटने ( चट-चटाने ) लगता है, मोर के गले के सदृश नीली लौ तथा ऐसा ही धुआँ निकलता है अथवा आग की लौ नहीं भी उठती और उसमें से अत्यन्त तीव्र दुर्गन्ध आती है ॥ १३ ॥

वक्तव्य—हमारे प्राचीन धर्माचार्यों ने भोजन करने के पहले कुछ ग्रास गाय, कुत्ता, कौआ आदि को देने का और कुछ अंश अग्नि में डालने का जो निर्देश दिया था, उसमें धार्मिक दृष्टिकोण के साथ-ही-साथ एक रहस्य यह भी अवश्य रहा होगा। इसी से सम्बन्धित वर्णन आगे भी है।

प्रियन्ते मक्षिकाः प्राशय काकः क्षामस्वरो भवेत् ॥१४॥

उल्लोशन्ति च वृष्ट्वैतच्छुकदात्यूहसारिकाः । हंसः प्रस्खलति, ग्लानिर्जीवज्जीवस्य जायते ॥ चकोरस्याऽक्षिवैराग्यं, क्रौञ्चस्य स्यान्मदोदयः । कपोतपरभूदक्षचक्रवाका जहत्यसून ॥१६॥ उद्देगं याति माज्जरः, शकुन्मूञ्चति वानरः । हृष्येन्मयूरस्तद्वृष्ट्या मन्दतेजो भवेद्विषम् ॥१७॥ इत्यन्नं विषवज्जात्वा त्यजेदेवं प्रयत्नतः । यथा तेन विषचोरन्नपि न क्षुद्रजन्तवः ॥१८॥

विपैले अन्न का प्रभाव—विपैले अन्न ( आहार ) को खाकर मक्षिष्यो मर जाती हैं, कौए का स्वर क्षीण हो जाता है और ऐसे अन्न को देखते ही सुग्गा, दाल्युह ( जलमूर्गा या कौआ या चातक पक्षी ) तथा मैना—ये पक्षी चिल्लाने लगते हैं। हंस लड़बड़ाने लगते हैं, जीवजीव ( कोषकार कहते हैं कि इसे देखने मात्र से विष का नाश हो जाता है ) पक्षी विष को देखकर दुःखी हो जाता है, चकोर की आँखों का रंग बिगड़ जाता है, क्रौञ्च को नशा चढ़ जाता है; कबूतर, कोयल, मूर्गा, चक्का ये मर जाते हैं, बिलव घबड़ा जाता है, बन्दर देखते ही मल्लयाग कर देता है तथा मोर विष को देखकर प्रसन्न हो जाता है और इसके देखने मात्र से विष का प्रभाव कम हो जाता है ( अतएव यह जहरीले साँपों को भी खा जाता है )। इन परीक्षाओं से उस अन्न को विष के समान समझ कर छोड़ दे और उस अन्न को ऐसे स्थान पर डाल दे, जिससे क्षुद्र प्राणी भी उसे खाकर न मरें ॥ १४-१८ ॥

वक्तव्य—‘प्रमादो धीमतामपि’ अर्थात् सूक्ष्म-बूझसम्पन्न लोग भी जब भूल कर बैठते हैं तो श्रीमान् पुरुषों की तो बात ही क्या कहना है! यदि किसी प्रकार विष-प्रयोग हो ही गया हो तो उसका निराकरण इस प्रकार करें।

सृष्टे तु कण्ठ्वाहोषाज्वरातिस्फोटसुत्तयः । नखरोमच्युतिः शोफः, सेकाद्या विषनाशनाः ॥१९॥ शस्तास्तत्र प्रलेपाश्च सेव्यचन्दनपद्यकैः । ससोमवलकतालीसपत्रकुष्ठामृतानतैः ॥२०॥

स्पर्शज विष-चिकित्सा—विपैले पदार्थों ( माला, वस्त्र आदि ) का स्पर्श हो जाने पर खुजली, जलन, ऊष्मा ( गरम-गरम भाप जैसी निकलना ), ज्वर हो जाना, पीड़ा, उस स्थान पर फफोलों का निकलना, सूत्र पड़ जाना, नख तथा रोमों का उखड़ जाना, सूजन हो जाना आदि लक्षण हो जाते हैं। इस स्थिति में शीघ्र ही विषनाशक स्नान, अभ्यंग, अवगाहन तथा लेपों-प्रलेपों की व्यवस्था करें। यथा—खस, सफेद चन्दन, पद्मकाष्ठ ( पद्माव ), कायफल का छिलका ( इसकी नस्म भी बनायी जाती है ), तालीसपत्र, कूठ ( यह सुगन्धित द्रव्य है ), गिलोय तथा तगर के कल्क का लेप करें और क्वाथ को पिलायें अथवा इनके क्वाथों का उन अवयवों में सेचन करें ॥ १९-२० ॥

लाला जिह्वाच्छयोर्जाडघमूषा चिमिचिमायनम् । दन्तहर्षो रसाज्ज्वं हनुतस्मश्च वक्त्रग्रे ॥२१॥ सेव्याद्यैस्तत्र गण्डूपाः सर्वे च विषजिह्वितम् ।