भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अक्षरसाध्यायः ७ ]

सूत्रस्थानम्

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मुख में विष का प्रभाव—यदि मुख के भीतरी प्रदेश में किसी विष का प्रभाव हो गया हो तो उसमें ये लक्षण होते हैं—मुख से बार-बार लार निकलना, जीभ तथा होठों में जड़ता, जलन का होना, चुनचुनाहट का होना, दन्तहर्ष, रसों का ज्ञान न होना (यह जिह्वा की जड़ता है) तथा हनुस्तम्भ। इनकी चिकित्सा—बीसवें श्लोक में कहे गये खस आदि द्रव्यों के क्वाथ बनवाकर उनके गण्डूष (कुल्ले) करें और भी जो विषनाशक चिकित्सा हो, उसे करें, ये सब हितकर होती हैं॥ २१॥

आमाशयगते स्वेदमूच्छीर्ध्यानमद्व्रमाः ॥ २२ ॥

रोमहर्षो बमिर्दाहश्चक्षुहृदयरोधनम्। बिन्दुभिश्चाच्योऽङ्गानां, पक्वाशयगते पुनः ॥ २३ ॥ अनेकवर्णं वसति मूत्रयत्यतिसार्यते। तन्ना कुशलं पाण्डुत्वमुदरं बलसह्ययः ॥ २४ ॥ तयोर्वात्तविरक्तस्य हरिद्रे कटभीं गुडम्। सिन्दुवारितनिष्पावबाष्पिकाशतपर्विकाः ॥ २५ ॥ तपडुलीयकमूलानि कुक्कुटाण्डमवलजुजम्। नावनाञ्जनपानेषु योजयेद्विषशान्तये ॥ २६ ॥

आमाशयगत विष के लक्षण—पसीना का आना, मूच्छी, आध्यान (अफरा), मद (नशा का होना), चक्कर आना, रोंगटे खड़े होना, वमन, जलन, आँखों के सामने अंधेरा छा जाना, हृदय की गति में रूकावट का होना तथा शरीर के अवयवों पर पानी के फफोलों जैसे बिन्दुओं का उभड़ आना।

पक्वाशयगत विष के लक्षण—अनेक रंग के वमनों का होना, मूत्र का अधिक होना, अतिसार का होना, तन्ना (उधार्ड का आना), कुशता, शरीर में पीलापन का होना, उदररोग तथा बल का क्रमशः क्षय होना।

उक्त दोनों की चिकित्सा—ऊपर वर्णित लक्षणों में वमन तथा अतिसार का वर्णन है, उस स्थिति में आप देखें कि यदि वमन-विरक्त आवश्यकता के अनुसार हो गये हैं, तो आगे की चिकित्सा इस प्रकार करें—हल्दी, दाहहल्दी की छाल, कटभी (अपराजिता), गुड, सिन्दुवार (मेवड़ी) के पत्ते, निष्पाव (मटर), हिंगुपत्री, बाल्लव, चौलाई की जड़, मुर्गी के अण्डे का रस तथा बाकुची—इनका प्रयोग नस्य, अञ्जन तथा क्वाथ बनाकर पीने के रूप में करें, इससे विषविकार शान्त हो जाते हैं॥ २२-२६॥

बक्तव्य—आमाशयगत विष प्रारम्भ में वमनों द्वारा और पक्वाशयगत विष विरेचनों द्वारा निकल जाता है, शेष उक्तनिर्दिष्ट औषधयोग से शान्त हो जाता है। विष में घृतपान अत्यन्त लाभकारी होता है, उसमें भी गाय का घृत और भी उत्तम होता है।

विषभुक्ताय दद्यान्व शुद्रायोर्ध्वमधस्तथा। सूक्ष्मं ताघ्ररजः काले सखीन्द्रं हृदिशोधनम् ॥ २७ ॥

शुद्धे हृदि ततः शाणं हेमचूर्णस्य दापयेत्।

ताघ्र एवं स्वर्ण भस्म-प्रयोग—जिस व्यक्ति ने विष खाया है, उसे वमन-विरक्त विधियों से नीचे-ऊपर शुद्ध हो जाने पर प्रतिदिन १ रत्ती ताघ्रभस्म १ तोला मधु के साथ प्रातः-सायं सेवन करने के लिए देना चाहिए। इससे विशेषरूप से हृदय का शोधन हो जाता है। जब हृदय शुद्ध हो जाय तब इस रोगी को १ शाण स्वर्णभस्म का सेवन करने के लिए दें॥ २७॥

वक्तव्य—४ माषा = १ शाण, ६ रत्ती = १ माषा, ६ × ४ = २४ रत्ती अर्थात् १-१ रत्ती की मात्रा में मधु के साथ विषभुक्त रोगी को २४ दिनों तक इसका सेवन कराना चाहिए।

न सज्जते हेमपाङ्के पद्यपत्रेऽन्बुवद्विषम् ॥ २८ ॥

जायते विपुलं चायुर्गिरऽप्येष विधिः स्मृतः।

स्वर्णभस्म का प्रभाव—जो सदा इस प्रकार स्वर्णभस्म का सेवन करता है उसके शरीर में विष का प्रभाव उस प्रकार नहीं होता, जिस प्रकार कमलपत्र पर जल का स्पर्श नहीं हो पाता। स्वर्ण का सेवन करने से आयु बढ़ती है। गरवियों तथा मूलविषों की चिकित्सा भी इसी प्रकार की जाती है॥ २८॥