अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
वक्तव्य—अष्टांगहृदय-उत्तरस्थान अध्याय ३५ से ३८ तक विविध प्रकार के विषों की चिकित्साओं का वर्णन विस्तार से किया गया है।
विरुद्धमपि चाहारं विद्याद्विषगरोपमम् ॥ २९ ॥
विरोधी आहार—विरुद्ध अथवा परस्पर विरोधी आहार भी विष (स्थान, जंगम) तथा गरविष (कृत्रिम विष) के समान होता है ॥ २९ ॥
वक्तव्य—विरुद्ध अन्नपानों के सेवन का निषेध तो वाग्भट ने किया है, किन्तु उनका शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है, स्पष्टरूप से उसका निर्देश नहीं किया है। इसे चरक के अनुसार इस प्रकार समझें—‘षण्डधान्येः...हेतुम्’ ॥ (च.सू. २६।१०२-१०३) अर्थात् विरुद्ध आहारों के सेवन से होने वाले रोग—नपुंसकता, अन्धापन, विसर्प, जलोदर, विस्फोट, उत्साद, भ्रान्दर, मूच्छा, मदरोग, आध्मान, गले के रोग, पाण्डुरोग, अलसक (गुमहेजा), विस्मृत्तिका, किलास (श्वेत कुष्ठ), कूष्ठ, ग्रहणीरोग, शोथ, रक्तपित्त, ज्वर, प्रतिशय, सन्तानदोष (गर्भावस्था में माता द्वारा सेवन करने से भ्रूण का गर्भ में मर जाना या पैदा होकर मर जाना आदि) तथा मृत्यु—ये कारण होते हैं। इसी प्रकार के निर्देश अ.स.सू. १।२९ में भी देखें।
आनूपमामिषं माषक्षीद्रक्षीरविरुद्धैः। विरुध्यते सह बिसैर्मूलकेन गुडेन वा ॥ ३० ॥ विशेषात्मयसा मत्स्या मत्स्येष्णपि चिलीचिमः।
आनूपदेशीय (सुअर आदि का) मांस—उड़द, मधु, दूध, अंकुरित धान्यों (चना, गेहूँ, मूंग, मोठ, मटर आदि) के साथ परस्पर गुणों में विपरीत होता है तथा बिस (भैंसीड़ा), मूली एवं गुड़ के साथ भी विरुद्ध होता है। विशेष करके दूध के साथ मछलियों का सेवन न करें, उनमें भी चिलीचिम नामक मछली का तो कभी भी दूध के साथ सेवन नहीं करना चाहिए ॥ ३० ॥
वक्तव्य—विरुद्ध आहार इस प्रकारण में जिन-जिन को कहा जायेगा, उनमें से कौन क्या विकार करता है, यह निश्चित रूप से नहीं कहा गया है; तथापि इनसे रक्त दूषित होकर अनेक विस्फोट आदि विकृतियाँ होती हैं। ये सभी खाद्य पदार्थ हैं, इनका एक ही समय में एक साथ खाना ही विरुद्ध कहा गया है। स्वतन्त्र रूप से क्रमशः इनका सेवन किया ही जाता है, तब कोई दोष भी नहीं होता है। यही मत चरक, सुश्रुत आदि का भी है।
विरुद्धमम्लं पयसा सह सर्वं फलं तथा ॥ ३१ ॥
तद्रक्तुलत्थवरककङ्गुवल्लमकुष्ठाः ।
दुग्धपान-विचार—अम्लरस-प्रधान सभी पदार्थ तथा फल दूध के साथ नहीं खाने चाहिए, क्योंकि ये परस्पर विरुद्ध होते हैं। इसी प्रकार कुलथी, वरक (उद्गलक), कंगुनी (कौंगी), मटर, मोठ आदि भी दूध के साथ नहीं खाने चाहिए ॥ ३१ ॥
वक्तव्य—‘सर्वं फलं’—ऐसा नहीं है कि दूध के साथ कोई फल नहीं खाया जाता हो। बादाम, छूहारा, किसमिश आदि के साथ दूध का प्रयोग किया ही जाता है, दूध के साथ किन फलों को नहीं खाना चाहिए, देखें—‘आम्रातकः’...‘चान्यानि’ (च.सू. २६।८४) इसी प्रकार सु.सू. २०।८ का भी अवलोकन करें।
भक्षयित्वा हूरितकं मूलकादि पयस्यजेतु ॥ ३२ ॥
विरुद्ध आहार के लक्षण—मूली आदि हरे पदार्थों को खाकर उनके तत्काल बाद भी दूध नहीं पीना चाहिए ॥ ३२ ॥
बाराहं श्वाविधा नाद्याद्वाध्ना पृषतकुक्कुटी । आममांसानि पितेन, माषसूपेन मूलकम् ॥ ३३ ॥
अर्वि कुसुमशकाकेन, बिसैः सह विरुद्धकम् । माषसूपगुडक्षीरदध्याज्येलीकुचं फलम् ॥ ३४ ॥
फलं कदल्यास्तक्रेण दध्ना तालफलंन वा । कणोपणाम्बां मधुना काकमाचीं गुडेन वा ॥ ३५ ॥
सिद्धां वा मत्स्यपचने पचने नागरस्य वा । सिद्धामन्त्र्य वा पात्रे कामात्तामृपितां निशाम् ॥ ३६ ॥