अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअन्तरसाध्यायः ७ ]
सूत्रस्थानम्
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वराह (सूअर) का मांस साही (सेह या सौल) के मांस के साथ मिलाकर न खायें। चितकबरा हरिण तथा मुर्गा का मांस दही के साथ नहीं खाना चाहिए। कल्चे मांसों को प्राणियों के पित्तद्रव के साथ न खायें, उड़द की दाल के साथ मूली न खायें, भेड़ के मांस को कुसुम्भ के शाक के साथ न खायें। बिस (भैंसीडा) के साथ अंकुरित धान्यों को, बड़हर के फल को उड़द की दाल, गुड़, दूध, दही तथा घी के साथ नहीं खाना चाहिए। केले के पके फल को मठा, दही अथवा ताड़ के फल के साथ, मकोय को पीपल तथा मरिच के साथ, मधु अथवा गुड़ के साथ नहीं खाना चाहिए। जिस पात्र में मछली पकायी गयी हो अथवा सोठ पकायी गयी हो उसी पात्र में पकाया गया मकोय का शाक न खायें। यदि दूसरे पात्र में मकोय का शाक पकाया गया हो किन्तु रातभर का बासी शाक हो, उसे भी भरपेट न खायें॥ ३३-३६॥
मत्स्यनिस्तलनस्तेह साधिताः पिप्पलीत्यजेत्। कांस्ये दशाहमुषितं सर्पिहणं त्वरुच्छरे॥ ३७॥
जिस स्नेह (तैल या घी) में मछली का मांस तला गया हो, उसी स्नेह में तली गयी पिप्पली का सेवन न करें। काँसा के पात्र में दस दिन तक रखे हुए घी (यह घी देखने में हरा या नीला हो जाता है और खा लेने पर इससे वमन होने लगते हैं, अतः इस) को न खायें। भिलावा के सेवन काल में उष्णताकारक आहार-विहारों का सेवन न करें॥ ३७॥
भासो विरुध्यते शून्यः कम्पिलस्तक्रसाधितः।
भास (गोध) का मांस शुल (लोहे की छड़) पर लपेट कर अंगारों में पकाया गया विरुद्ध होता है। मठा के साथ पकाया गया कम्पिल (कबीला) विरुद्ध होता है।
एकध्वं पायससुराकुशराः परिवर्जयेत्॥ ३८॥
पायस (खीर, खोया या मलाई) आदि पदार्थों को सुरा (मद्यभेद) एवं खिचड़ी के साथ नहीं खाना चाहिए॥ ३८॥
मधुसर्पर्वसातैलपानीयानि द्विशस्त्रिभः। एकत्र वा समांशानि विरुध्यन्ते परस्परम्॥ ३९॥
समान भाग मधु-घृत, वसा (प्राणिज स्नेह), तैल, जल—इन द्रव्यों को दो-दो करके अथवा तीन-तीन को एक साथ मिलाकर सेवन करना विरुद्ध होता है॥ ३९॥
वक्तव्य— केवल इन्हीं द्रव्यों का परस्पर संयोग विरुद्ध होता है, इनके साथ और भी द्रव्य मिलाये गये हों तो कोई हानि नहीं होती। जैसे—अगस्त्यलेह। यह दो-दो या तीन-तीन का जो योग कहा गया है यह उपलक्षण मात्र है। यह संयोग चार-पाँच द्रव्यों का भी हो सकता है।
भिन्नांशे अपि मध्वाज्ये दिव्यवार्थनुपानतः। मधुपुष्करबीजं च, मधुमैर्यशार्करम्॥ ४०॥
मध्यानुपानतः क्षैर्यो, हारिद्रः कटुतैलवान्।
कम-ज्यादा परिमाण में भी मिलाये गये मधु-घृत वर्षाजल के अनुपान से विरुद्ध हो जाते हैं। मधु तथा कमलबीज (कमलगट्टा), मधु तथा मैर्य (धान्यासव—चन्द्रनन्दन के अनुसार, खजूर्रासव—अरुणदत्त एवं इन्द्रु के अनुसार) तथा शर्करासव ये भी परस्पर विरुद्ध होते हैं। खीर, मठा या सत्तू के घोल के साथ और हारिद्रक (पीले रंग वाला छत्राक नामक कन्द-विशेष, इसको संवेदज शाक कहा है) को सरसों के तैल में तलकर नहीं खाना चाहिए॥ ४०॥
उपोदकाऽतिसाराय तिलकल्केन साधिता॥ ४१॥
तिल की चटनी के साथ पकाया गया पोई (उपोदिक्का या उपोदका) का शाक विरुद्ध होता है। इसका सेवन करने से अतिसार होने लगता है॥ ४१॥
बलाका वारुणीयुक्ता कुल्मायैश्च विरुध्यते। भृष्टा वराहवसया सैव सद्यो निहृत्यसूत्॥ ४२॥